भूमिका
सदियों के शोषण और प्रताड़ना की आग में झुलसा बहुजन-वंचित समाज आज भी हक-हिस्सेदारी के लिए छटपटा रहा है। संसाधनों पर तथाकथित उच्च वर्ग के कब्जे ने उन्हें अपनी ही माटी पर पराया बना दिया। मुख्यधारा में आने की तड़प और संघर्ष की इस महागाथा की यह एक मर्मस्पर्शी पड़ताल है।
- विरासत में क्या मिला?
टूटी खटिया या आत्मसम्मान की सुलगती आग?
गाँव की गोधूलि वेला में जब ढोर-डंगर (पशु) चरकर लौटते हैं, तो धूल उड़ती है। वह धूल सबके आंगन में एक जैसी गिरती है, लेकिन उस धूल की कीमत हर आंगन के लिए अलग होती है। सदियों से हमारे देश के बहुजन, वंचित वर्ग के लोगों को विरासत में जायदाद, ऊंचे पक्के मकान या सोने-चांदी के सिक्के नहीं मिले। उन्हें विरासत में मिली—पीढ़ियों की थकान, देह तोड़ देने वाली मजूरी (मजदूरी), और समाज के तथाकथित ऊंचे तबके के लोगों की तीखी कड़वी बातें।
देखा जाए तो इन वंचित समाजों को विरासत में सिर्फ एक चीज कूट-कूट कर मिली, और वह है अथाह धीरज और भीतर ही भीतर सुलगती आत्मसम्मान की आग। जब पुरखों के पास न जमीन थी, न दस्तखत करने के लिए कलम, तब भी उन्होंने अपनी छाती पर हल चलाकर इस देश की माटी को सींचा। लेकिन विडंबना देखिए, जिस हाथ ने अन्न उगाया, उसी हाथ को अन्न के दो दानों के लिए ‘बाबू साहब’ या ‘ठाकुर’ की ड्योढ़ी पर हाथ फैलाना पड़ा। संसाधनों पर कुछ खास लोगों ने ऐसा कब्जा जमाया कि बहुजन समाज अपने ही देश में अपनी ही माटी से ‘मरहूम’ (वंचित) कर दिया गया।
- हकीकत का आईना: आज क्या बदल गया और क्या बाकी है?
आज हम चौबीसवीं सदी की दहलीज पर खड़े होने की बातें करते हैं। इंटरनेट का जमाना है, हाथ में मोबाइल है। लेकिन गाँव की पगडंडियों पर आज भी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। आज भी जब बहुजन समाज का कोई नौजवान पढ़-लिखकर टाई लगाता है या घोड़ी पर चढ़ने की कोशिश करता है, तो तथाकथित उच्च वर्ग की त्योरियां चढ़ जाती हैं। शहरों में भले ही रूप बदल गया हो, लेकिन गाँव-देहात की ‘हैसियत’ आज भी इस बात से तय होती है कि आप किस टोले (मोहल्ले) में रहते हैं।
मुख्यधारा में आने के लिए इस समाज ने जी-तोड़ कोशिश की है। बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के दिए संविधान ने ताकत दी, तो लोगों ने ‘पढ़ो और संघर्ष करो’ के नारे को अपनी जिंदगी का मंत्र बना लिया। पर हकीकत यही है कि जब भी यह समाज दो कदम आगे बढ़ाता है, जातिवाद के अदृश्य पैर उसे पीछे खींचने की ताक में रहते हैं। नौकरियों में बैकलॉग, शिक्षा में भेदभाव और संसाधनों का असमान बंटवारा आज भी इस समाज के पैरों की बेड़ी बना हुआ है।
- जनसाधारण की नजर में बहुजन समाज की ‘हैसियत’
अगर हम आज के जनसाधारण यानी आम जनता के मानस को टटोलें, तो बहुजन और वंचित समाज को लेकर एक अजीब सी कशमकश दिखती है। एक तरफ तो उनकी मेहनत के बिना देश का चक्का नहीं चल सकता—चाहे वह खेत की बुवाई हो, मकान की चिनाई हो या साफ-सफाई का काम हो। लेकिन जब उन्हें उनके हक और हिस्सेदारी की बात आती है, तो जनसाधारण का एक बड़ा हिस्सा उन्हें ‘आरक्षण की बैसाखी’ पर चलने वाला कहकर उनका मजाक उड़ाने लगता है।
गाँव-जवार में आज भी दलित-पिछड़ों को ‘कमजोर’ या ‘आश्रित’ के रूप में देखने की मानसिकता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। उनकी हैसियत को सिर्फ वोटों की गिनती तक सीमित कर दिया गया है। चुनाव आते ही सब ‘भाई-भाई’ चिल्लाते हैं, पैर छूते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही वही पुरानी दूरियां, वही ‘ऊंच-नीच’ का चश्मा फिर से पहन लिया जाता है।
- लड़ाई किससे होनी चाहिए? सोचने वाली बात है!
अब सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह खड़ा होता है कि—हमारी असली लड़ाई आखिर किससे है?
अक्सर मंचों से बड़े-बड़े भाषण दिए जाते हैं। लोग कहते हैं कि हमें चीन से मुकाबला करना है, हमें अमेरिका से आगे निकलना है, हमें बाहरी ताकतों को धूल चटानी है। बेशक, देश की संप्रभुता के लिए वह जरूरी है। लेकिन जरा ठंडे दिमाग से सोचिए
“अगर हमारे पूर्वज सच में लड़ाकू थे, तो आज हमारी लड़ाई अपनों से क्यों है?”
हम देश के भीतर ही अपनों से क्यों लड़ रहे हैं? कुछ ताकतें ऐसी हैं जो समाज के भीतर ही नफरत के बीज बोती हैं। वे चीन और अमेरिका की बात तो करेंगी, लेकिन जब अपने ही समाज के भाई-बहन बहुजन और वंचित समाज को बराबरी का हक देने की बात आएगी, तो वे उनके सामने दीवार बनकर खड़ी हो जाएंगी। यह कैसी देशभक्ति है जहां देश का ही एक बहुत बड़ा हिस्सा बुनियादी अधिकारों के लिए तरस रहा हो?
- बहुजन वंचित को आगे बढ़ाना समाज की मजबूती है, कमजोरी नहीं
हमें यह बात जन-जन तक पहुंचानी होगी कि समाज के कमजोर, शोषित और वंचित वर्गों को आगे बढ़ने का अवसर देना इस देश की कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी मजबूती है।
एक पुरानी कहावत है कि अगर घर का एक भी कमरा कमजोर हो, तो पूरा मकान ढह सकता है। उसी तरह, अगर देश की बहुसंख्यक आबादी (बहुजन और वंचित) पिछड़ी रहेगी, अशिक्षित रहेगी या संसाधनों से मरहूम रहेगी, तो यह देश कभी भी दुनिया का सिरमौर नहीं बन सकता। जब हमारे बहुजन वंचित के भाई-बहन अफसर बनेंगे, वैज्ञानिक बनेंगे, डॉक्टर बनेंगे और राजनीति की मुख्यधारा में नीति-निर्धारक बनेंगे, तो वह ताकत पूरे समाज की होगी, किसी एक जाति की नहीं।
लड़ाई किसी इंसान से नहीं है, लड़ाई उस जातिवादी सोच से है जो इंसानों के बीच भेद करती है। लड़ाई उस व्यवस्था से है जो सदियों से एक बड़े तबके को आगे बढ़ने से रोकती आई है।
6.शिक्षा और आरक्षण: हक और तरक्की के दो मजबूत पहिए
शिक्षा वह अचूक हथियार है जो बहुजन और वंचित समाज को अंधकार से निकालकर आत्मसम्मान की रोशनी में खड़ा करता है। कलम की ताकत से ही सदियों की बेड़ियां टूटती हैं। वहीं, आरक्षण कोई खैरात या भीख नहीं है, बल्कि संसाधनों से मरहूम (वंचित) रहे लोगों को बराबरी पर लाने का संवैधानिक हक है। यह उस ड्योढ़ी पर पिछड़ों का अधिकार सुरक्षित करता है, जहां तथाकथित उच्च वर्ग सदियों से कुंडली मारकर बैठा था। जब तक हर वंचित हाथ में शिक्षा की मशाल और व्यवस्था में आरक्षण का मजबूत सहारा रहेगा, तब तक समाज को मुख्यधारा में आने से कोई ताकत नहीं रोक सकती।
- प्रेरणा और संकल्प: अब जागने का वक्त है
ऐ मेरे बहुजन और वंचित समाज के वीरों! अब मायूस होने का या अपनी किस्मत को कोसने का वक्त चला गया। पुरखों ने जो प्रताड़ना झेली, वह उनका दौर था। उन्होंने उस दंश को सहकर भी हमें जिंदा रखा और संघर्ष की मशाल हमारे हाथों में सौंपी। आज हमारे पास संविधान की ताकत है, हमारे पास शिक्षा का हथियार है।
गले शिकवे भुलाकर, आपस के छोटे-मोटे मतभेदों को दरकिनार कर, अब एक होने का समय है। जब तक हम बिखरे रहेंगे, तब तक तथाकथित उच्च वर्ग हमारी कमजोरी का फायदा उठाता रहेगा। हमें शिक्षा को अपना सबसे अचूक हथियार बनाना होगा। अपनी संतानों को पढ़ाना होगा, उन्हें जागरूक बनाना होगा ताकि वे अपनी हिस्सेदारी छीन सकें, मांगें नहीं।
उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक कि संसाधनों पर, शिक्षा पर और सत्ता पर तुम्हारा वाजिब हक तुम्हें न मिल जाए। यह लड़ाई अपनों को गिराने की नहीं, बल्कि खुद को उनके बराबर खड़ा करने की है। यही हमारे पुरखों का सपना था और यही हमारी असली जीत होगी।
शेर
कबीर तूं काहे डरे, सिर पर सिरजनहार।
हक की खातिर जो लड़े, ताका बेड़ा पार॥”

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)
स्रोत और संदर्भ :
अजीत कोरी की थ्रेड्सपोस्ट से प्रेरित एवंभारतीय संविधान (अनुच्छेद 15-16), मंडल आयोग रिपोर्ट, बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर वाङ्मय, तथा ग्रामीण अंचलों के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण।
8 अक्टूबर 2026
