लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति) सोहन लाल सिंगारिया (सामाजिक-आर्थिक चिन्तक एवं विचारक, ब्यावर) संपर्क सूत्र: 94622-60179

संविधान, सामाजिक न्याय और शिक्षा का पावन उद्देश्य

भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समता, स्वतंत्रता, बंधुता और मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार प्रदान करता है।

बोधिसत्व बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने शिक्षा को शोषित, पीड़ित और वंचित वर्ग के उद्धार का सबसे सशक्त हथियार माना था।

आजादी के बाद से ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारी विद्यालयों की बुनियाद इसी उद्देश्य के साथ रखी गई थी ताकि सदियों से हाशिए पर धकेले गए गरीब, साधनहीन, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) एवं पिछड़े वर्ग (OBC) के बच्चे बिना किसी भेदभाव के ज्ञान अर्जित कर राष्ट्र निर्माण में अपनी भागीदारी निभा सकें।

आज राजस्थान के ग्रामीण एवं कस्बाई सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले लगभग 90% विद्यार्थी इन्हीं कमजोर और शोषित वर्गों से आते हैं।

परंतु, जब इसी व्यवस्था का सर्वोच्च प्रशासनिक स्तंभ—एक विद्यालय का प्रधानाचार्य—संविधान की मूल भावना को पैरों तले रौंदते हुए जातिगत अहंकार का घिनौना प्रदर्शन करने लगे, तो यह केवल एक अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि समूची मानवता, शिक्षा तंत्र और बाबा साहेब के सपनों पर सीधा कुठाराघात है।

घटना का क्रूर यथार्थ, चित्तौड़गढ़ के सोमी गांव की शर्मनाक दास्तान
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के राशमी उपखंड क्षेत्र अंतर्गत राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, सोमी से सामने आई अमानवीय घटना ने पूरे समाज और संवेदनशील नागरिकों के रोंगटे खड़े कर दिए हैं।

अखबार में प्रकाशित खबरों और पीड़ित छात्र की एसडीएम (उपखंड अधिकारी) को दी गई शिकायत के अनुसार, कीरखेड़ा निवासी अनुसूचित जाति (नट समाज) के कक्षा 10 के 15 वर्षीय छात्र भेरूलाल नट और उसके छोटे भाई दीपक नट (13 वर्ष, कक्षा 9) को विद्यालय के प्रधानाचार्य प्रभुदर्शन सेन द्वारा लगातार जातिगत रूप से जलील किया जा रहा था।

आरोप हैं कि संस्था प्रधान दोनों मासूम भाइयों को कक्षा के भीतर और पूरी प्रार्थना सभा के सामने सबके समक्ष “नट-बोल्ट” कहकर पुकारते और अपमानित करते थे।

इतना ही नहीं, छात्र के साथ डंडों से मारपीट की गई और यह कहकर विद्यालय से बाहर निकाल दिया गया कि— “तुम यहां क्यों आते हो? राशमी में जाकर क्यों नहीं पढ़ते?
तुम यहां आकर हमारा रिजल्ट खराब करोगे!

एक 15 वर्ष का अबोध बालक जब अपनी फटी आंखों में आंसू और सीने में अपमान का गहरा दर्द लिए उपखंड अधिकारी कार्यालय के दरवाजे पर पहुंचा, तो उसने न केवल अपने साथ हुए जुल्म की दास्तान सुनाई, बल्कि इस व्यवस्था के चेहरे पर लगा सभ्य होने का नकाब भी नोच डाला।

प्रशासनिक दोमुंहापन, जो मूल्यांकनकर्ता है, वही भक्षक बन बैठा

एक राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय का प्रधानाचार्य
केवल एक शिक्षक नहीं होता, वह पूरे परिक्षेत्र का प्रशासनिक मुखिया, आहरण एवं वितरण अधिकारी (DDO) और सामाजिक समरसता का संरक्षक होता है।

इस पद पर बैठे व्यक्ति के दोहरे चरित्र और ढोंग का
विश्लेषण करना अत्यंत आवश्यक है

वार्षिक कार्य मूल्यांकन प्रतिवेदन (APAR) का पाखंड

प्रत्येक वर्ष प्रधानाचार्य अपने विद्यालय तथा अपने अधीनस्थ विद्यालयों के सभी शिक्षकों एवं कार्मिकों के सेवा विवरण (APAR/ACR) का मूल्यांकन करता है। इस मूल्यांकन प्रपत्र में विशेष रूप से एक अनिवार्य कॉलम होता है— “अनुसूचित जाति/जनजाति के विद्यार्थियों व कमजोर वर्गों के प्रति शिक्षक का व्यवहार कैसा है?

जो प्रधानाचार्य अपनी कलम से दूसरों के समतावादी व्यवहार को प्रमाणित करता है, जब वह स्वयं जातिवादी कुंठा से ग्रस्त होकर नट जाति के बच्चों को “नट-बोल्ट” कहकर प्रताड़ित कर रहा हो, तो क्या उसके द्वारा किए गए पूर्व के सभी मूल्यांकन झूठे, फर्जी और ढकोसला साबित नहीं होते?

मिड-डे मील निरीक्षण का खोखला दिखावा

नियमों के अनुसार प्रधानाचार्य को वर्ष में कम से कम 10 से 12 बार अपने और अधीनस्थ विद्यालयों में पोषाहार (Mid-Day Meal) व्यवस्था का औचक निरीक्षण और पर्यवेक्षण करना होता है।

इस निरीक्षण का मूल उद्देश्य यह जांचना होता है कि कहीं दलित और वंचित समाज के बच्चों के साथ पंक्ति-भेद (अलग बैठाकर खिलाना) तो नहीं हो रहा, उनके बर्तन अलग तो नहीं रखे जा रहे, अथवा भोजन वितरण में कोई छुआछूत या भेदभाव तो नहीं पनप रहा।

जो संस्था प्रधान कागजों में सामाजिक समरसता की रिपोर्ट सरकार को भेजता रहा, वह असल जिंदगी में बच्चों को जाति के आधार पर स्कूल से बेदखल कर रहा है—यह उसकी घोर प्रशासनिक बेईमानी और कर्तव्यहीनता का जीता-जागता सबूत है।

डेढ़ से दो लाख का वेतन और कौड़ियों की मानसिकता

राजस्थान सरकार जनता के टैक्स के पैसे से एक प्रधानाचार्य को डेढ़ से दो लाख रुपये का भारी-भरकम मासिक वेतन और तमाम प्रशासनिक सुविधाएं देती है।

यह वेतन इसलिए दिया जाता है ताकि वह समाज की अंतिम पंक्ति के सबसे गरीब, मजदूर और शोषित परिवारों के बच्चों की उंगली पकड़कर उन्हें आगे बढ़ाए।

परंतु सरकारी खजाने से मोटी तनख्वाह डकारने वाला यह राजकीय कारिंदा यदि वंचित वर्ग के बच्चों को ही हीन समझकर प्रताड़ित करे, तो यह पद की गरिमा और राजकोष के साथ खुला आपराधिक विश्वासघात है।

“रिजल्ट खराब होगा” का कुतर्क, शिक्षक धर्म की हत्या

प्रधानाचार्य का यह कहना कि “तुम यहां क्यों पढ़ते हो, हमारा रिजल्ट खराब करोगे”, शिक्षा शास्त्र के मूल सिद्धांतों की हत्या है।

एक सच्चे और योग्य शिक्षक की पहचान ही इसमें है कि वह सबसे कमजोर, पिछड़े और पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी को तराशकर उसे अव्वल बनाए।

अगर संपन्न, साधनयुक्त और पहले से होशियार बच्चों को ही पढ़ाना है, तो फिर सरकारी तंत्र और लाखों रुपये के वेतन की क्या सार्थकता रह जाती है?

परीक्षा परिणामों का बहाना बनाकर नट समाज के बच्चों को विद्यालय से बाहर खदेड़ना यह साबित करता है कि यह संस्था प्रधान अपनी अकादमिक अक्षमता को छिपाने के लिए मासूम बच्चों पर जातिगत अत्याचार का सहारा ले रहा था।

गंभीर जांच और कठोरतम कानूनी दंडात्मक कार्रवाई की मांग
जब एक वरिष्ठ अधिकारी खुलेआम स्कूल में इस प्रकार की संवेदनहीनता और गुंडागर्दी कर सकता है, तो सहज ही समझा जा सकता है कि उसने अपने 25-30 वर्षों के सेवाकाल में न जाने कितने अनुसूचित जाति व गरीब तबके के बच्चों का भविष्य कुचला होगा और कितनों को विद्यालय छोड़ने पर मजबूर किया होगा।

अतः राज्य सरकार, शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन से निम्नलिखित कठोर कार्रवाई की पुरजोर मांग की जाती है

तत्काल निलंबन नहीं, सेवा से स्थायी बर्खास्तगी

ऐसे कलंकित प्रधानाचार्य को केवल औपचारिकता के लिए निलंबित कर किसी अन्य कार्यालय में बैठाने के बजाय, राजस्थान सिविल सेवाएं (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमों के तहत त्वरित विभागीय जांच पूरी कर सेवा से स्थायी रूप से बर्खास्त (Dismissal from Service) किया जाए।

गैर-जमानती धाराओं में तत्काल गिरफ्तारी व जेल

जातिसूचक शब्दों से सार्वजनिक रूप से अपमानित करने, मानसिक रूप से प्रताड़ित करने और मारपीट करने के जुर्म में एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम तथा किशोर न्याय अधिनियम (JJ Act) के तहत गैर-जमानती धाराओं में तत्काल प्रभाव से सलाखों के पीछे भेजा जाए।

संपूर्ण सेवाकाल की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच

आरोपी प्रधानाचार्य अपने पूरे सेवाकाल में जिन-जिन विद्यालयों में पदस्थापित रहा है, वहां वंचित वर्ग के विद्यार्थियों और शिक्षकों के साथ उसके व्यवहार व शिकायतों का पूरा रिकॉर्ड तलब कर एक स्वतंत्र कमेटी द्वारा व्यापक जांच कराई जाए।

प्रबुद्ध समाज के लिए आत्ममंथन का समय

यदि आज भी हमारे सरकारी विद्यालयों में नट समाज, मेघवाल समाज, भील समाज या अन्य किसी भी दलित-शोषित वर्ग के बच्चे के साथ जाति के नाम पर यह सुलूक होगा, तो यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे की विफलता है।

चुप्पी साधे रहना भी जुल्म का साथ देने के बराबर है।

शिक्षा के पावन प्रांगण को जातिवादी नफरत का अखाड़ा
नहीं बनने दिया जा सकता।

जब तक समाज की अंतिम पंक्ति में बैठे कमजोर एवं वंचित वर्ग के बच्चे को बराबरी, सम्मान और स्नेह का वातावरण नहीं मिलेगा, तब तक राष्ट्र के विकास के सारे दावे खोखले हैं।

लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक, ब्यावर- 94622-60179

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *