मैं अब और आजादी के तराने नहीं लिखूँगा, हिंसा में मारे निर्दोषों की कहानी लिखूँगा।
आजादी के बदले जिन्हें विभाजन का दर्द मिला, मैं वक्त के मारे उन लोगों की दास्तान लिखूँगा।
रक्त से रंगी धरती का हर निशान लिखूँगा, आँखों से बहते आंसुओं का सैलाब लिखूँगा।
जिनके घर उजड़े, जिनके अपने बिछड़ गए, उन बेघर लोगों का दर्द और अरमान लिखूँगा।
जिन बेटियों की अस्मत लूटी हैवानों ने, उनकी चीखों की अनकही जुबान लिखूँगा।
जिन्होंने इंसानियत का खून बहाया था, उन दरिंदों का काला इतिहास लिखूँगा।
माँ की गोद उजड़ी, बच्चे राहों में खोए, उन टूटे परिवारों का हर दर्द लिखूँगा।
नफ़रत ने जिन्हें एक-दूजे का दुश्मन बनाया, उस जहरीली सोच का अंजाम लिखूँगा।
विभाजन केवल सरहद का बंटवारा नहीं था, बंटे रिश्तों का भी दर्दनाक इतिहास लिखूँगा।
आजादी के जश्न में जो दर्द दबा रह गया, उस भूले हुए दर्द का हर राज लिखूँगा।
इतिहास के पन्नों पर ये चेतावनी लिखूँगा, फिर कभी न हो ऐसा – यह पैग़ाम लिखूँगा।
धर्म नहीं सिखाता किसी निर्दोष को मारना, मैं इंसानियत को सबसे महान लिखूँगा।

लेखक – धर्मपाल गाँधी
सामाजिक चिंतक, दार्शनिक, राजनीतिक विश्लेषक एवं स्वतंत्रता आंदोलन के शोधकर्ता

