रामपुरा-कंवरपुरा का स्कूल: सवाल सिर्फ एक जर्जर इमारत का नहीं, गरीब बच्चों के भविष्य का है,जयपुर के बगरू क्षेत्र के रामपुरा-कंवरपुरा गांव का सरकारी प्राथमिक स्कूल आज राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक असमानता और राजनीतिक जवाबदेही से जुड़े कई गंभीर सवाल एक साथ खड़े कर रहा है। स्कूल की जर्जर हालत सामने आने के बाद वहां निरीक्षण करने पहुंची कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी की टीम के साथ कथित मारपीट ने इस मामले को राजनीतिक विवाद में बदल दिया। लेकिन यदि हम राजनीति से थोड़ा ऊपर उठकर देखें तो इस पूरी कहानी के केंद्र में न सीजेपी है, न बीजेपी और न ही कोई दूसरा राजनीतिक दल—केंद्र में वे गरीब बच्चे हैं, जिनके लिए सरकारी स्कूल ही शिक्षा का सबसे बड़ा सहारा है।
बीबीसी हिंदी के पत्रकार मोहर सिंह मीणा ने इस स्कूल की जमीनी स्थिति पर रिपोर्ट की है। बीबीसी की रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि स्कूल की इमारत की स्थिति बेहद खराब है और बच्चों की पढ़ाई के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ी है। बीबीसी की रिपोर्टिंग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें केवल राजनीतिक आरोपों को नहीं, बल्कि स्कूल और वहां पढ़ने वाले बच्चों की वास्तविक परिस्थितियों को सामने लाने की कोशिश की गई है।
बताया गया है कि स्कूल का पुराना भवन इतना जर्जर हो चुका है कि उसमें बच्चों को बैठाना सुरक्षित नहीं माना गया। बाद में बच्चों की पढ़ाई के लिए वैकल्पिक स्थान की व्यवस्था की गई। दूसरी रिपोर्टों में यह स्थिति सामने आई कि बच्चे चारे और पशुओं से जुड़ी जगह के बीच पढ़ने को मजबूर थे। प्रशासन ने बाद में बच्चों को एक ग्रामीण के मकान में अस्थायी रूप से पढ़ाने की व्यवस्था की। सवाल यह है कि राजस्थान जैसे बड़े राज्य में सरकारी स्कूल के बच्चों को स्थायी और सम्मानजनक कक्षा-कक्ष के लिए इतना इंतजार क्यों करना पड़ा?
इस स्कूल की सामाजिक तस्वीर भी इस मामले को और गंभीर बना देती है। उपलब्ध स्थानीय जानकारी के अनुसार यहां करीब 18 बच्चे पढ़ते हैं और एक स्थानीय दावे के मुताबिक इनमें 12 बच्चे अनुसूचित जाति तथा 6 बच्चे अन्य पिछड़ा वर्ग से हैं। इस आंकड़े का सरकारी दस्तावेज भले ही उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसे प्रमाणित सरकारी आंकड़ा नहीं बल्कि स्थानीय रिपोर्ट/दावे के रूप में देखना चाहिए। लेकिन बीबीसी की रिपोर्ट भी यह बताती है कि यहां पढ़ने वाले बच्चे मुख्यतः गरीब परिवारों से आते हैं।
यही वह बिंदु है जहां इस घटना का सामाजिक अर्थ समझना जरूरी है। जिन परिवारों के पास पर्याप्त आर्थिक साधन हैं, वे अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेज सकते हैं। लेकिन गरीब परिवारों, विशेषकर दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों के अनेक परिवारों के लिए सरकारी स्कूल ही सबसे बड़ा सहारा है। इसलिए सरकारी स्कूल की खराब इमारत केवल सरकारी भवन की खराब हालत नहीं है। वह गरीब परिवार के बच्चे के भविष्य की खराब होती हुई नींव है।
अगर किसी गांव में सम्पन्न परिवारों के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं और सरकारी स्कूल में मुख्यतः आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे रह जाते हैं, तो सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। सरकारी स्कूल किसी गरीब की मजबूरी नहीं होना चाहिए। वह संविधान के समान अवसर के विचार को जमीन पर उतारने का माध्यम होना चाहिए।
इस बीच सीजेपी की टीम पर हुए हमले का मामला भी गंभीर है। सीजेपी की ओर से आरोप लगाया गया है कि टीम पर हमला करने वाले लोग सामान्य ग्रामीण नहीं थे, बल्कि राजनीतिक रूप से जुड़े लोग थे और उनके संबंध बीजेपी समर्थकों से थे। आशुतोष रांका ने तो इस मामले में सीधे बीजेपी और शिक्षा मंत्री मदन दिलावर पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने मारपीट, कपड़े फाड़ने और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार तक के आरोप लगाए हैं। इन आरोपों को कई समाचार रिपोर्टों ने दर्ज किया है। लेकिन इन आरोपों को अभी आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए; जांच के बाद ही यह तय होगा कि वास्तव में हमले में कौन लोग शामिल थे और उनकी राजनीतिक पहचान क्या थी।
यहां एक महत्वपूर्ण सवाल सरकार से भी है। भारत में सर्वप्रथम केवल राजस्थान सरकार ने 17 अगस्त को सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश, फोटो-वीडियो और मीडिया गतिविधियों के संबंध में अनुमति की व्यवस्था कड़ी की थी। सरकार का तर्क है कि बच्चों की सुरक्षा, निजता और पढ़ाई में व्यवधान को रोकना जरूरी है। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने भी इसी प्रकार का बचाव किया है।
बच्चों की निजता और सुरक्षा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। किसी भी व्यक्ति को बिना नियमों के स्कूल में जाकर बच्चों की तस्वीरें लेने या उनकी पढ़ाई में बाधा डालने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ यह भी लोकतंत्र का जरूरी सिद्धांत है कि सरकारी संस्थाओं में पारदर्शिता बनी रहे। यदि किसी सरकारी स्कूल की इमारत जर्जर है, बच्चे असुविधाजनक जगह पर पढ़ रहे हैं या बुनियादी सुविधाओं की कमी है, तो समाज और मीडिया उस समस्या को सामने कैसे लाएगा?
यहीं रामपुरा-कंवरपुरा का मामला एक बड़े सवाल में बदल जाता है। यदि सरकारी स्कूलों में प्रवेश और निरीक्षण के नियम इतने कठोर बना दिए जाएं कि सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और पत्रकारों के लिए वास्तविक स्थिति देखना कठिन हो जाए, तो सरकार की जवाबदेही कमजोर हो सकती है। दूसरी ओर, निरीक्षण के नाम पर कोई राजनीतिक संगठन भीड़ लेकर स्कूल में पहुंच जाए और स्कूल की व्यवस्था प्रभावित करे, तो वह भी उचित तरीका नहीं है। लेकिन दूसरा विकल्प क्या है? लोकतंत्र में दोनों पक्षों के लिए नियम समान होने चाहिए।
सरकार की ओर से यह भी बताया गया है कि राज्य में बड़ी संख्या में स्कूलों के भवन संबंधी समस्याएं हैं। हाल की रिपोर्टों में 611 ऐसे स्कूलों का उल्लेख है जिनकी अपनी इमारत नहीं है, जबकि हजारों स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी की बात भी सामने आई है। इससे स्पष्ट है कि रामपुरा-कंवरपुरा की समस्या अकेली नहीं है।
अब सवाल सरकार की मंशा पर आता है। क्या यह कहना उचित होगा कि सरकार जानबूझकर दलित और पिछड़े बच्चों को खराब स्कूलों में रखना चाहती है? बिना ठोस प्रमाण के ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। किसी सरकार की मंशा का फैसला उसके घोषित आदेशों, बजट, निर्माण कार्यों और वास्तविक परिणामों को देखकर होना चाहिए। लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि जिन सरकारी स्कूलों में मुख्यतः गरीब और सामाजिक रूप से वंचित परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं, उनके बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता क्यों नहीं मिलती?
राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल भी इसी जगह जुड़ता है। यदि किसी क्षेत्र के गरीब परिवार किसी राजनीतिक दल को वोट नहीं देते, तो लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व कम नहीं हो जाता। सरकार केवल अपने समर्थकों की सरकार नहीं होती। वह उन नागरिकों की भी सरकार होती है जिन्होंने उसे वोट नहीं दिया। संविधान किसी बच्चे से यह नहीं पूछता कि उसके माता-पिता किस राजनीतिक दल को वोट देते हैं। शिक्षा का अधिकार बच्चे का अधिकार है, उसके माता-पिता की राजनीतिक पसंद का पुरस्कार या दंड नहीं।
इसीलिए रामपुरा-कंवरपुरा के बच्चों को बीजेपी, कांग्रेस या सीजेपी की राजनीति में बांटना उनके साथ अन्याय होगा। अगर 18 बच्चों में बड़ी संख्या एससी और ओबीसी परिवारों के बच्चों की है, तो उन्हें बेहतर स्कूल देना सरकार की विशेष सामाजिक जिम्मेदारी बन जाती है। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि केवल दलित या ओबीसी बच्चे ही अच्छे स्कूल के हकदार हैं। हर गरीब बच्चा, चाहे वह किसी भी जाति का हो, समान शिक्षा और सम्मान का अधिकारी है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे दुखद बात यह है कि स्कूल की जर्जर इमारत से शुरू हुआ सवाल अब राजनीतिक लड़ाई बन गया है। एक तरफ सीजेपी कह रही है कि वह सरकारी स्कूलों की बदहाली जनता के सामने लाना चाहती है। दूसरी तरफ सरकार और उसके समर्थक यह कह सकते हैं कि स्कूलों में बिना अनुमति प्रवेश व्यवस्था और बच्चों की सुरक्षा के लिए उचित नहीं है। दोनों पक्ष अपनी बात रख सकते हैं। लेकिन हिंसा किसी भी पक्ष के लोकतांत्रिक अधिकार का हिस्सा नहीं हो सकती।
सरकार को अब सबसे सरल रास्ता अपनाना चाहिए। स्कूल का कुल नामांकन सार्वजनिक किया जाए। बच्चों की कक्षा-वार संख्या बताई जाए। एससी, एसटी, ओबीसी और अन्य वर्गों का आधिकारिक विवरण उपलब्ध कराया जाए। शिक्षकों की संख्या बताई जाए। भवन कब जर्जर घोषित हुआ, इसकी जानकारी दी जाए। नए भवन के लिए कितनी राशि स्वीकृत हुई, वह कब जारी हुई और निर्माण कब पूरा होगा—यह सब जनता के सामने रखा जाए।
ऐसी पारदर्शिता से राजनीतिक विवाद काफी हद तक समाप्त हो सकता है।
रामपुरा-कंवरपुरा का स्कूल हमें एक बहुत सरल लेकिन महत्वपूर्ण बात समझाता है—सरकारी स्कूल किसी सरकार की संपत्ति नहीं, जनता की संपत्ति हैं। वहां पढ़ने वाला बच्चा किसी पार्टी का समर्थक या विरोधी नहीं होता। वह राजस्थान का नागरिक और भारत का भविष्य है।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि सीजेपी को स्कूल में प्रवेश क्यों चाहिए था, ग्रामीणों ने क्या कहा, हमलावर किस पार्टी के समर्थक थे या किस नेता पर आरोप लगा। इन सबकी जांच होनी चाहिए। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि गरीब बच्चों को सुरक्षित स्कूल कब मिलेगा?
अगर सरकार सचमुच शिक्षा और बच्चों के भविष्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है तो उसे आलोचना से डरने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। जर्जर स्कूल की तस्वीर छिपाने से स्कूल ठीक नहीं होगा। स्कूल तभी ठीक होगा जब उसकी दीवारें मजबूत होंगी, बच्चों के लिए सुरक्षित कक्ष होंगे, शिक्षक पर्याप्त होंगे और हर बच्चे को यह विश्वास होगा कि वह गरीब है इसलिए उसके साथ शिक्षा में कोई समझौता नहीं होगा।
लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि वह अपने समर्थकों के लिए नहीं, बल्कि अपने आलोचकों और अपने विरोधियों के बच्चों के लिए भी उतनी ही अच्छी व्यवस्था करे। रामपुरा-कंवरपुरा के बच्चों का भविष्य इसी कसौटी पर राजस्थान सरकार की शिक्षा नीति को परखेगा।

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक. 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाडोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)
स्रोत-संदर्भ: बीबीसी
हिंदी की मोहर सिंह मीणा रिपोर्ट, नवभारत टाइम्स, स्थानीय समाचार रिपोर्टें तथा उपलब्ध प्रशासनिक जानकारी।

