भूमिका

बीजेपी आईटी सेल ने 2015 के बाद भारतीय राजनीति में अभूतपूर्व प्रभाव बनाया।समता (सबके प्रति समान भाव) का विचार पीछे धकेला गया।
सोशल मीडिया ने राजनीतिक संदेशों को करोड़ों नागरिकों तक पहुंचाया।विपक्षी नेताओं की आलोचना कई बार चरित्र-आरोपों में बदलती दिखाई दी।
सरकार की कमियों के बीच पाकिस्तान और राष्ट्रवाद चर्चा में आते रहे।नैरेटिव (कहानी या विचार की दिशा) ने तथ्य को पीछे छोड़ा।
इससे समाज में धार्मिक पहचानें राजनीतिक हथियार बनने लगीं।हिंदू और मुसलमान के बीच अविश्वास को लेकर चिंता बढ़ी।यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि पूरा तनाव इसी दौर में जन्मा।
लेकिन नफ़रत (घृणा) का डिजिटल विस्तार बेहद तेज जरूर हुआ।अब सवाल उठ रहा है कि क्या यह दौर बदल रहा है?जंतर-मंतर पर GEN – Z का प्रोटेस्ट ब्लॉकबस्टर साबित हुआ है, इसका मक़सद है मौजूदा सिस्टम में खामियों को ठीक करना, सरकार की जवाबदेही तय करवाना और युवाओं को मुनासिब हक दिलवाना क्योंकि आज के युवा ही कल के भविष्य हैं।
जनता के भीतर गांधीवादी रास्ते की उम्मीद फिर दिखाई दे रही है।

1 : नैरेटिव की राजनीति और समाज का बदलता मानस

ग्यारह वर्षों में बीजेपी आईटी सेल का डिजिटल प्रचार भारतीय राजनीतिक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।विवेक (सही-गलत पहचानने की क्षमता) कमजोर हो तो प्रचार भारी पड़ता।हर घटना को तत्काल किसी राजनीतिक खांचे में डालने की कोशिश हुई।कभी विपक्ष को राष्ट्रविरोधी बताया गया, कभी आलोचक संदिग्ध बने।
कभी सरकार की उपलब्धि को महागाथा बनाया गया, कमी दबाई गई।
ट्रेंड (सोशल मीडिया पर तेजी से फैलता विषय) राजनीति का हथियार बना।
पाकिस्तान का उल्लेख अनेक बहसों में अनिवार्य प्रतीक जैसा दिखाई दिया।
धर्म आधारित प्रतिक्रियाओं ने सामान्य नागरिक संवाद को भी प्रभावित किया।
इससे राजनीति मुद्दों से हटकर पहचान की लड़ाई बनती चली गई।तास्सुब (पक्षपात) बढ़े तो लोकतंत्र का संतुलन कमजोर होना स्वाभाविक है।
लेकिन हर प्रभाव की एक सीमा होती है, यह इतिहास बताता है।आज नागरिक पूछ रहा है कि वास्तविक मुद्दे आखिर कहां हैं।

2 : 20 जुलाई ने सवालों की राजनीति को उभारा

20 जुलाई 2026 का कॉकरोच जनता पार्टी का संसद मार्च इस बदलाव का प्रतीक बना। जिसमें गांधीवादी विचारधारा के अनुसार प्रदर्शन करने वाले जैन जी थे।सत्य (वास्तविकता और प्रमाण पर आधारित बात) आंदोलन की शक्ति बना।
जंतर-मंतर पर युवाओं ने परीक्षा और भविष्य के प्रश्न उठाए।
उनकी चिंता धर्म नहीं, शिक्षा और रोजगार की दिखाई दी।कई हजार प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर बढ़ने की कोशिश की।
कंटेंट (सोशल मीडिया के लिए तैयार सामग्री) से ज्यादा सड़क महत्वपूर्ण हुई।
यही कारण था कि पुरानी राजनीतिक भाषा उतनी प्रभावी नहीं लगी।जनता के एक वर्ग ने इसे डिजिटल प्रचार की सीमा माना।
किसी आंदोलन को निर्णायक विजय कहना अभी जल्दबाजी होगी।
अफ़वाह (झूठी या अपुष्ट खबर) और तथ्य में अंतर समझना जरूरी है।
फिर भी जनभावना में परिवर्तन का संकेत स्पष्ट दिखाई दिया।
सवालों ने पहली बार लंबे समय से चले आ रहे शोर को चुनौती दी।

3 : गांधी की प्रासंगिकता का लौटना

सबसे आश्चर्यजनक परिवर्तन कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थक जैन जी शांतिपूर्ण प्रतिरोध की प्रतिष्ठा में दिखाई दिया।अहिंसा (हिंसा से दूर शांतिपूर्ण प्रतिरोध) गांधी का सबसे बड़ा हथियार था।आज वही विचार युवा आंदोलनों की भाषा में फिर सुनाई देता है।गांधी को नकारने वाली बहसों के बीच उनका रास्ता याद आया।सत्ता से प्रश्न करना और विरोधी से घृणा नहीं करना महत्वपूर्ण है।
डिजिटल (इंटरनेट आधारित) राजनीति ने समाज को बहुत तेजी से बदला।
लेकिन गांधी का विचार तकनीक से नहीं, मनुष्य के विवेक से जुड़ा है।
शांतिपूर्ण आंदोलन ने इस पुराने सत्य को फिर सामने रखा।
यह कहना उचित नहीं कि किसी एक व्यक्ति ने गांधी लौटा दिए।
ज़मीर (अंतरात्मा) जागे तो गांधी किसी मूर्ति में सीमित नहीं रहते।वे नागरिक के आचरण और प्रतिरोध में दिखाई देने लगते हैं।
यही भावना आज जनता के एक हिस्से में मजबूत होती दिख रही है।

4 : बीजेपी आईटी सेल का संगठनात्मक बदलाव

17 अगस्त को बीजेपी ने अपनी राष्ट्रीय टीम में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया।
प्रज्ञा (ज्ञान से उत्पन्न समझ) राजनीति में नई रणनीति मांगती है।अमित मालवीय को लगभग ग्यारह वर्षों बाद आईटी प्रमुख पद से हटाया गया।उनकी जगह दीपक म्हस्के को नई जिम्मेदारी मिली है।
इसे सीधे 20 जुलाई की हार कहना प्रमाणित भले ही नहीं हो लेकिन भारत के जनता जनार्दन उसी को कारण मानती है।
काउंटर (विरोधी प्रचार का जवाब) रणनीति अब नए ढंग से बनेगी।मालवीय लंबे समय तक पार्टी की डिजिटल रणनीति के प्रमुख चेहरे रहे।
उनकी विदाई को लेकर राजनीतिक विश्लेषणअलग-अलग हो सकते हैं।
मगर बदलाव यह बताता है कि डिजिटल राजनीति स्थिर नहीं रहती।
सियासत (राजनीति) में संगठन अक्सर बदलते जनमूड के अनुसार ढलते हैं।
जनता के बदलते प्रश्न अब दलों से नई भाषा मांगते हैं।भविष्य में केवल प्रचार नहीं, विश्वास अर्जित करना अधिक जरूरी होगा।

5 : मीडिया, युवा और नागरिक विवेक की नई लड़ाई

मुख्यधारा मीडिया जैसे आजकल गोदी मीडिया कहा जाता है और बीजेपी आईटी सेल के सोशल मीडिया दोनों की भूमिका पर प्रश्न उठ रहे हैं।लोकहित (जनता के व्यापक हित) पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण आधार होना चाहिए।
यदि खबर केवल राजनीतिक पक्षधरता बन जाए तो विश्वास घटता है। जैन जी जो
युवा पीढ़ी अब टेलीविजन के साथ अनेक स्रोत देखती है।वह किसी दावे को तुरंत स्वीकार करने के बजाय जांचती भी है।फैक्ट (तथ्य) की मांग लोकतंत्र को मजबूत करने वाली आदत है।इसीलिए पुराने तरीके का एकतरफा प्रचार पहले जैसा प्रभाव नहीं डालता।
सोशल मीडिया ने हर नागरिक को संभावित संवाददाता बना दिया है।
इस शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी हो गई।
इसीलिए उम्मीद (आशा) केवल किसी पार्टी से नहीं, जनता से है।अगर नागरिक प्रमाण मांगेगा तो झूठ की उम्र छोटी होगी।
और अगर वह सवाल पूछेगा तो लोकतंत्र अधिक मजबूत होगा।

समापन

भारत के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न राजनीतिक जीत नहीं है।स्वराज्य (अपने विवेक से स्वयं निर्णय लेने की स्वतंत्रता) लोकतंत्र की आत्मा है।जनता को किसी राजनीतिक दल की सोच उधार नहीं लेनी चाहिए।उसे अपने अनुभव, संविधान और प्रमाण के आधार पर निर्णय करना चाहिए।
20 जुलाई ने इसी जागरूकता की एक महत्वपूर्ण झलक दिखाई।प्लेटफॉर्म (विचार व्यक्त करने का डिजिटल माध्यम) बदल सकते हैं, जनता स्थायी है।
नफरत का दौर चाहे कितना शक्तिशाली हो, वह अनंत नहीं होता।धर्म के नाम पर बनी दीवारें भी नागरिक चेतना से टूट सकती हैं। सावरकर और गोडसे की विचारधारा से
गांधी की वापसी का अर्थ किसी विचारधारा की पराजय नहीं है।
इंसाफ़ (न्याय) तभी मिलेगा जब सवाल पूछना अपराध नहीं समझा जाएगा।
आज सबसे बड़ी जरूरत एक-दूसरे को हराना नहीं, समझना है।यही जागरूक नागरिकता भारत को नफरत से निकालकर लोकतांत्रिक भविष्य दे सकती है।
शेर

नफ़रत के शोर में जो सच की आवाज़ दबाते रहे,
वक़्त बदला तो वही नैरेटिव अपने असर को तरसते रहे!

संकलन कर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।
98292 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर। (राजस्थान)

स्रोत और संदर्भ :
20 जुलाई आंदोलन संबंधी समाचार रिपोर्टें; 17 अगस्त बीजेपी संगठनात्मक बदलाव, अमित मालवीय–दीपक म्हस्के संबंधी रिपोर्टें; समकालीन,राजनीतिक विश्लेषण।

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