देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर वर्षों से लोकतांत्रिक आंदोलनों का प्रमुख केंद्र रहा है। जब भी किसी वर्ग को अपनी आवाज सरकार तक पहुँचानी होती है, तो जंतर-मंतर जनभावनाओं का मंच बन जाता है। हाल के दिनों में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर हुए विरोध-प्रदर्शनों ने देश का ध्यान आकर्षित किया है। इन आंदोलनों के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी उठी, जिसने राजनीतिक और सामाजिक बहस को और तेज कर दिया।
आंदोलनकारियों का कहना है कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए। उनका आरोप है कि विभिन्न परीक्षाओं में अनियमितताओं, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी तथा छात्रों की समस्याओं के समाधान में अपेक्षित गति नहीं दिखाई गई। इसी कारण कई छात्र संगठन, अभिभावक और सामाजिक संगठन सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग कर रहे हैं।
वहीं सरकार का पक्ष है कि शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और आधुनिक बनाने के लिए लगातार सुधार किए जा रहे हैं। सरकार का कहना है कि परीक्षा प्रणाली को मजबूत करने, तकनीकी सुधार लागू करने तथा दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई करने के प्रयास जारी हैं।
लोकतंत्र में आंदोलन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन किसी भी आंदोलन का उद्देश्य केवल विरोध नहीं, बल्कि सकारात्मक समाधान होना चाहिए। इसी प्रकार सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वह जनभावनाओं को गंभीरता से सुने और समयबद्ध समाधान प्रस्तुत करे।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का विषय हो सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संवैधानिक व्यवस्था के तहत ही होता है। आखिर धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। महत्वपूर्ण यह है कि शिक्षा व्यवस्था में छात्रों का विश्वास बना रहे और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति न हो।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, विपक्ष, छात्र संगठन और समाज मिलकर ऐसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करें जो पारदर्शी, जवाबदेह और गुणवत्तापूर्ण हो। क्योंकि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी शिक्षा प्रणाली पर ही निर्भर करता है। यदि शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी, तो देश का भविष्य भी मजबूत होगा।
धर्मपाल चंदेल सम्पादक जागो हुक्मरान न्यूज

