लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहनलाल सिंगारिया
प्रधानाचार्य (RES)
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक, ब्यावर

किस्मत सखी नहीं फिर भी रूठ जाती है, बुद्धि लोहा नहीं फिर भी जंग लग जाता है, आत्मसम्मान शरीर नहीं फिर भी घायल हो जाता है, और… इंसान मौसम नहीं फिर भी बदल जाता है।

मानव जीवन के गहनतम यथार्थ को उघाड़ती ये चार पंक्तियाँ महज़ कागज़ पर उकेरे गए शब्द नहीं हैं।

यह आधुनिक मानव की संवेदनहीनता, उसके खोखले अहंकार और आत्मघाती प्रवृत्तियों के विरुद्ध एक तीखा वैचारिक शंखनाद हैं।

आज का इंसान जब चाँद और सितारों को छूने का दावा कर रहा है, ठीक उसी वक्त वह भीतर से कितना बौना, स्वार्थी और खोखला हो चुका है, यह आलेख उसी कड़वे सच का एक आईना है।

यह आलेख किसी दूसरे की कमियाँ गिनने के लिए नहीं है, बल्कि यह पाठक को मजबूर करता है, कि वह किसी और की तरफ उंगली उठाने से पहले अपने खुद के गिरेबान में झांके।

चाहे कोई महलों में रहने वाला विशिष्ट (खास) व्यक्ति हो या अपनी नियति से लड़ता हुआ आम आदमी

—यह वैचारिक विमर्श हर उस व्यक्ति को झकझोरने के लिए है जो जाने-अनजाने अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, और अहंकार की अंधी गली का मुसाफिर बन चुका है।

  1. नियति की चंचलता और मानवीय भ्रम

‘किस्मत सखी नहीं फिर भी रूठ जाती है’

इंसान की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह अनुकूल समय को स्थायी मान लेता है।

जब पद, प्रतिष्ठा, पैसा और पावर हाथ में होते हैं, तो व्यक्ति भूल जाता है कि समय की रेत हाथ से फिसलने में देर नहीं लगाती।

किस्मत कोई तुम्हारी बचपन की सहेली या सखी नहीं है जिसे तुम मना लोगे।

यह तो वह अदृश्य चक्र है, जो पलक झपकते ही राजा को रंक और रंक को राजा बना देता है।

अहंकार का विनाश
जब इंसान सफलता के मद में अंधा होकर दूसरों को तुच्छ समझने लगता है, तब नियति एक ऐसा झटका देती है, कि उसका सारा भ्रम चकनाचूर हो जाता है।

जो लोग आज सत्ता या संपत्ति के नशे में चूर होकर आम आदमी को प्रताड़ित कर रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि किस्मत का रूठना किसी चेतावनी के साथ नहीं आता।

प्रेरणा और सुधार
भाग्य के इस अप्रत्याशित स्वभाव से हमें यह सीखना चाहिए कि विनम्रता ही जीवन का परम सत्य है।

यदि आज आपका समय अच्छा है, तो दूसरों की मदद कीजिए, न कि उनके पतन का कारण बनिए।

कर्म को प्रधान बनाइए, क्योंकि जब भाग्य रूठता है, तो केवल आपके द्वारा किए गए सत्कर्म और परोपकार ही आपकी ढाल बनते हैं।

  1. वैचारिक जड़ता का आत्मघाती अंधकार ‘बुद्धि लोहा नहीं फिर भी जंग लग जाता है

विज्ञान कहता है कि जब लोहा ऑक्सीजन और नमी के संपर्क में आता है, तो उसमें रासायनिक जंग लग जाता है,और वह धीरे-धीरे धूल में मिल जाता है।

लेकिन चेतना और तार्किकता की संवाहक ‘बुद्धि’ में जंग
कैसे लगता है?

बुद्धि में जंग तब लगता है जब इंसान तार्किकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को तिलांजलि दे देता है।

अंधविश्वास, पाखंड और रूढ़िवादिता के घने कोहरे में खुद को कैद कर लेता है।

21वीं सदी में जीकर भी सदियों पुरानी सड़ी-गली रूढ़ियों, जात-पात के भेदों और अमानवीय परंपराओं को ढोता रहता है।

जब व्यक्ति यह सोचना बंद कर देता है कि “क्या सही है और क्या गलत” और इसके बजाय “क्या रूढ़ि है और क्या भीड़ कर रही है” के पीछे भागने लगता है, तो उसकी बुद्धि पंगु हो जाती है।

जंग लगी बुद्धि वाला इंसान समाज के लिए एक अभिशाप बन जाता है।

वह अंधविश्वास के चक्कर में अपनों को ही प्रताड़ित करता है, तंत्र-मंत्र और ढोंग के जाल में फंसकर धन और मानसिक शांति गंवाता है।

सुधार की पुकार
अपनी बुद्धि को तार्किकता के सान पर चढ़ाइए।

शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्रियां बटोरना या सरकारी नौकरी पाना नहीं है, बल्कि विचारों को उदार और वैज्ञानिक बनाना है।

रूढ़ियों की बेड़ियों को तोड़िए, रूढ़िवादिता से बाहर निकलिए और सत्य को कसौटी पर कसना सीखिए।

  1. गरिमा की अदृश्य चीख, ‘आत्मसम्मान शरीर नहीं फिर भी घायल हो जाता है

हाथ-पैर पर लाठी लगे, तो चमड़ी छिलती है, खून बहता है और पट्टी बांधने से दर्द ठीक हो जाता है।

लेकिन जब किसी के ‘आत्मसम्मान’ पर चोट की जाती है,तो आत्मा लहूलुहान हो जाती है।

आत्मसम्मान का कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है, इसे छुआ नहीं जा सकता, लेकिन इसकी चोट सबसे गहरी और जानलेवा होती है।

आज समाज में लोग अपने पद, जाति, या आर्थिक रसूख के अहंकार में इतने पागल हो चुके हैं कि वे दूसरों को अपमानित करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझने लगे हैं।

एक अमीर आदमी द्वारा किसी गरीब श्रमिक का किया गया तिरस्कार,

एक अधिकारी द्वारा अपने अधीनस्थ कर्मचारी को मानसिक रूप से प्रताड़ित करना,

समाज के तथाकथित ठेकेदारों द्वारा किसी कमजोर वर्ग के व्यक्ति की गरिमा को कुचलना—यह सब आत्मसम्मान पर किए गए वे खंजर हैं, जिनके घाव कभी नहीं भरते।

याद रखिए
किसी भूखे को रोटी न देना शायद उतना बड़ा पाप नहीं है, जितना उसे रोटी देते समय उसके आत्मसम्मान को कुचल देना है।

हर इंसान, चाहे वह झाड़ू लगाने वाला हो या किसी संस्थान का सर्वोच्च अधिकारी, अपनी गरिमा के साथ जीता है।

आत्मानुलोकन की आवश्यकता
दूसरों को प्रताड़ित करने वाले और उनके स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने वाले लोगों को अपने अंदर झांकना चाहिए।

जो दर्द आपको अपने अपमान से होता है, वही दर्द सामने वाले को भी होता है।

किसी के आत्मसम्मान के मर्म को समझिए।

यदि आप किसी को सम्मान दे नहीं सकते, तो आपको किसी के सम्मान को ठेस पहुँचाने का भी कोई हक नहीं है।

  1. गिरगिट सी फितरत और स्वार्थ का नग्न नृत्य, ‘इंसान मौसम नहीं फिर भी बदल जाता है

प्रकृति में मौसम का बदलना एक वरदान है, क्योंकि वह एक निश्चित नियम और समय के अनुसार चलता है।

लेकिन इंसान का बदलना?
इंसान तो पल-पल, क्षण-क्षण अपनी सुविधा, अपने स्वार्थ और अपने लालच के अनुसार रंग बदलता है।

बदलते चेहरों का सच
आज का इंसान इतना अप्रत्याशित हो चुका है कि जब तक आपसे उसका स्वार्थ सिद्ध हो रहा है, वह आपके तलवे चाटने को भी तैयार रहेगा।

लेकिन जैसे ही उसका काम निकला या आपकी परिस्थिति बदली, वह आपको इस तरह नजरअंदाज कर देगा जैसे आप कभी अस्तित्व में थे ही नहीं।

यह स्वार्थपरता मानवीय रिश्तों की सबसे बड़ी त्रासदी है।

दूसरों को परेशान करने की प्रवृत्ति
अपने स्वार्थ में अंधा व्यक्ति दूसरों को मोहरा बनाता है।

वह अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए दूसरों के जीवन को नरक बनाने से भी नहीं हिचकता।

वह भूल जाता है कि रिश्तों में वफादारी, ईमानदारी और स्थिरता ही इंसान को ‘इंसान’ बनाती है, अन्यथा वह केवल दो पैरों पर चलने वाला एक जानवर बनकर रह जाता है।

सुधार और संकल्प
मौसम की तरह बदलना बंद कीजिए।

अपने चरित्र में वह स्थिरता लाइये कि विकट से विकट परिस्थिति में भी आपकी नैतिकता और मानवीय मूल्य न बदलें।

स्वार्थ के लिए किसी का इस्तेमाल करना और फिर उसे छोड़ देना, इंसानियत के नाम पर कलंक है।

उपसंहार स्वयं की खोज और आत्म-सुधार का मार्ग

यह आलेख केवल पढ़ने और भूल जाने के लिए नहीं है, यह हर पाठक की चेतना को झकझोरने वाला एक जीवंत दस्तावेज़ है।

यह हमसे मांग करता है कि हम अपने भीतर छिपे उस ‘अहंकारी’, ‘अंधविश्वासी’ और ‘स्वार्थी’ इंसान को बाहर निकालें और उसे सत्य की रोशनी में देखें।

आइए, आज इस आलेख के माध्यम से यह प्रतिज्ञा करें

हम अपनी बुद्धि को अंधविश्वास और रूढ़ियों का शिकार नहीं होने देंगे, बल्कि तार्किकता और वैज्ञानिक चेतना से समाज को रोशन करेंगे।

हम किसी भी स्थिति में किसी दूसरे इंसान के आत्मसम्मान को ठेस नहीं पहुँचाएंगे।

हर व्यक्ति की गरिमा का उतना ही सम्मान करेंगे जितना हम स्वयं के लिए चाहते हैं।

हम अपने स्वार्थ के लिए मौसम की तरह रंग नहीं बदलेंगे और न ही अपनी तरक्की के लिए दूसरों को परेशान करेंगे या उनके मार्ग में बाधा बनेंगे।

जब तक हम अपने अंदर झांककर खुद को नहीं पहचानेंगे, तब तक एक समतामूलक, न्यायपूर्ण और संवेदनशील समाज का निर्माण असंभव है।

अपने अहंकार को त्यागिए, अपनी गलतियों को स्वीकार कीजिए और एक सच्चे, जागरूक और परोपकारी इंसान बनने की राह पर कदम बढ़ाइए।

यही वास्तविक शिक्षा है और यही जीवन की सार्थकता है।

लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया
प्राचार्य (RES)
सामाजिक आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक ब्यावर-94622-60179

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