पुस्तक समीक्षा

डॉ. मोहललाल सोनल ‘मनहंस’ जी की इकहत्तर कविताओं का यह संग्रह उनके आस-पास और दुनिया जहां की दैनंदिन गतिविधियों से उद्वेलित हुए मन से उपजी अभिव्यक्तियाँ हैं ।ये ऐसी कवितायें हैं जो किसी स्थापित कवि के मन में उमड़-घुमड़ रहे ख़्वाबों-ख्यालों से नही निकली हैं अपितु इन कविताओं में इस दुनिया का यथार्थ दहकता हैं । इनमें दलितों, वंचितों की पीड़ा हैं तो कार्य-कारण का निदान भी हैं। इसमें व्यक्ति की गरिमा को अलंकारित करते फूल हैं तो ज़ालिम, गैरबराबरी वाली अव्यवस्था को लताड़ भी ।

इस काव्य संग्रह की रचनाएँ तीन भागों में बांटी जा सकती हैं –
1/ भूतपूर्व व वर्तमान क्रांतदर्शी नायकों और प्रेरणादायी दिवसों पर कविताएँ
2/ सामाजिक विषमता पर चोट करती कविताएँ
3/ अपने आस-पास दैनंदिन और निज़ी घटनाओं पर कवि के अन्तस् की अभिव्क्तियाँ

‘मनहंस’ जी की कविताओं में पुरातन काव्य परिपाटी की एक झलक देखी जा सकती हैं तो अर्वाचीन काव्य के बिम्ब और रोजमर्रा की ज़िन्दगी के ज्वलंत सवाल तो हैं ही, उनका हर काव्य काव्यसंग्रह किसी न किसी बहुजन नायक/नायिका के चरणों में अपने श्रद्धासुमन अर्पित करने के साथ शुरू होता है । पहले जहाँ किसी काव्य की शुरुआत किसी काल्पनिक देवी-देवता के मंगलाचरण से शुरू होती थी वहाँ मनहंस जी अपने असली महानायकों/नायिकायों की वन्दना से शुरू करते हैं । इस काव्य संग्रह में भी वे भारत रत्न भीमराव अंबेडकर के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए कविता ‘ज्ञानदीप अथाह अंबर’ से शुरुआत करते है -शिक्षित, संगठित बनकर/आगे बढो दिया एक नारा/शत शत नमन करता/अगड़ा-पिछड़ा सारा ।

इसके साथ ही वे संविधान दिवस, करता हूँ गर्व, एक बुद्ध और चाहिए, एक छुडा गए जो दासत्व की जेल, मान्यवर कांशीराम, संत कबीर, एक पूरजोर आवाज़, अमिट शहादत, बिरसा बाबा, माता फातिमा का कर्म महान, क्रांतिवीर उधमसिंह, एक बहुजन योद्धा आदि कविताओं के माध्यम से तमाम बहुजन नायक/नायिकाओं को याद करते हैं और उनके बताये पथ को अंगीकार करने की नसीहत देते हैं।

सदियों से हाशिये पर धकेल दिए गए विशाल बहु-जनसमुदायों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हुए वे कई कविताओं में इस अव्यवस्था पर मारक चोट करते हैं । मसलन ‘आज के युग वर्णवाद’ लम्बी कविता में वे बार-बार कहते हैं – सुनते आये वर्णवाद/कर्म आधारित था/ तो क्या ये बहुजन ब्राह्मण हुए?/क्षत्रिय हुए?/वैश्य हुए? फिर अंतिम कुछ पंक्तियों में कहते है –

वर्णवाद की ये जो दकियानूसी/अति असमानता भरी/ पुरानी पाठ-पढाई/सदिओं से सिर्फ/अछूत शूद्रों को ही नही/तीनों वर्णों से बाहर के/ सभी पिछड़ों को दबाकर, रौंदकर/सिर्फ सवर्णों की जो/ चलती आई अन्यायपूर्ण बड़ाई।

‘जाति के जिन्न’ में वे सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक और अन्य संसाधनों में संख्यात्मक-गुणात्मक भागेदारी के सवाल पर अत्यंत प्रभावशाली लहजे में कहते हैं – अति महत्व का एक भी मंत्रालय/अनुसूचितों के पास नहीं/राम के रायसीना नाथ बनने पर/ख़ास सुधार की आस नही । फिर प्रश्न उछालते है – ‘मनहंस’ क्या आसानी से/बदल पायेगा हिंदुत्व का वर्णवाद/या फिर उंच-नीच की खाई/यूँ ही रहेगी आगे आबाद ।

कवि अपने आस-पास घट रही हर घटनाओं पर पैनी दृष्टि रखते हैं। वे जीवन में घट रही छोटी-छोटी घटनाओं को भी अपनी कविताओं में पिरो देने का हुनर रखते है। उनकी संवेदना का आलम ये कि ग़म, ख़ुशी, वेदना, आक्रोश, कृतज्ञता, कृतघ्नता, प्रतिकार, प्रेम और वात्सल्य जैसे उमड़ रहे भाव बरबस ही उनकी कलम से निसृत होने लगते है।

पाली जिले के जितेंद्र मेघवाल की हत्या से आक्रोशित कवि का मन कातर मन से कह उठता हैं – वह वीर झुका नही/बलिदान देकर/बना गया कहानी/जिसने हार माननी नही सीखी/लड़ा जो स्वाभिमान के ख़ातिर/जुल्म के विरुद्ध चेतना भर गया/देश, विदेश समंदर पार तक आख़िर ।

कवि के लिए अपनी क़लम सर्वस्व हैं. ‘अपना तो क़लम धन’ में वे लिखते हैं – अपना धन तो बस ‘क़लम धन’/जिससे बात कुछ गई बन/लिखना, पढ़ना तो कलम से ही/लक्ष्य छोटा-बड़ा हुआ आसान। एक और कविता ‘क़लम की ताकत’ में भी वे लिखते हैं – क़लम अपनी रख स्वाधीन/लिखना हैं कुछ खरा-खरा/दूर हटाना अब तो क़लम से/बहुजनों का अंधेरा जो पसरा और ‘मनहंस’ मौन तोडना होगा अब तो/तोडनी होगी अब तक थी जो चुप्पी/स्वाधीन रखकर क़लम को लिखना सिर्फ़ लिखना नही होगा काफी।

‘रोशनी के मायने’ शीर्षक देश की वृहत्तर आबादी के लिए सदियों की ग़ुलामी और शोषण के बाद देश आज़ाद होने व संविधान लागू होने के बाद बाबा साहब अंबेडकर द्वारा सामाजिक विषमताओं से भरे देश में यह रोशनी अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंची या नहीं और इस रोशनी के उजियारे के हमारे लिए क्या मायने है? इन कविताओं में इस वर्ण्य विषय को बखूबी अभिव्यक्त किया है. कुल मिलकर 184 पृष्ठों में इकहत्तर कविताओं का यह गुलदस्ता समतामूल समाज की पुनर्स्थापन के अवगाहन और विसंगत सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक अव्यवस्था के ख़िलाफ़ प्रतिरोध की सशक्त आवाज़ बुलंद करता है ।

समीक्षक – पूराराम, सिरोही

पुस्तक – रोशनी के मायने
लेखक – डॉ मोहनलाल सोनल मनहंस
प्रकाशक – कलमकार पब्लिशर्स नई दिल्ली
संपर्क – 9310562856
मूल्य – 250/- रु
पृष्ठ -184

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