आज के समय में सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का एक ऐसा हिस्सा बन गया है जिसे हम चाहकर भी नजरअंदाज नहीं कर सकते। खासकर अगर हम युवाओं की बात करें, तो उनके दिन की शुरुआत और अंत, दोनों ही मोबाइल स्क्रीन पर स्क्रॉल करते हुए होते हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स ने पूरी दुनिया को हमारी मुट्ठी में लाकर रख दिया है।
इसमें कोई शक नहीं कि सोशल मीडिया ने युवाओं को कई बेहतरीन मौके दिए हैं। आज किसी छोटे शहर या गांव का युवा भी अपनी प्रतिभा को पूरी दुनिया के सामने रख सकता है। करियर और नई स्किल्स सीखने की जानकारियां अब बस एक क्लिक की दूरी पर हैं। कई युवाओं ने तो इसे अपना रोजगार भी बना लिया है। इसके अलावा, देश और दुनिया के सामाजिक मुद्दों पर भी युवा अब खुलकर अपनी राय रख रहे हैं, जो एक जागरूक समाज के लिए काफी सकारात्मक बदलाव है।
लेकिन, जैसा कि हम जानते हैं, हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। इसका दूसरा पहलू काफी चिंताजनक है। युवा सोशल मीडिया की एक ऐसी आभासी (virtual) दुनिया में खोते जा रहे हैं, जहां सब कुछ ‘फिल्टर’ लगाकर परफेक्ट दिखाया जाता है। दूसरों की चमक-दमक वाली जिंदगी देखकर युवाओं में अपने आप से असंतोष, हीन भावना और डिप्रेशन काफी तेजी से बढ़ रहा है। “लाइक्स” और “कमेंट्स” की गिनती ने उनकी असली खुशी तय करना शुरू कर दिया है। इसके अलावा, फेक न्यूज, साइबर बुलिंग और घंटों तक बिना किसी मकसद के सिर्फ ‘रील्स’ देखते रहना उनके कीमती समय को दीमक की तरह खा रहा है। रातों की नींद खराब होने से उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है और मैदानी खेल (outdoor games) तो जैसे उनकी जिंदगी से गायब ही हो गए हैं।
अगर सच कहूं तो सोशल मीडिया अपने आप में न तो पूरी तरह अच्छा है और न ही बुरा। यह बिल्कुल एक औजार की तरह है। जरूरत इस बात की है कि आज का युवा इसका इस्तेमाल अपनी तरक्की के लिए करे, न कि खुद इसका गुलाम बन जाए। अगर डिजिटल दुनिया और असल जिंदगी के रिश्तों के बीच एक सही संतुलन बना लिया जाए, तो यह युवाओं के लिए एक बड़े वरदान से कम नहीं है।

नारायण सिंह गुड़ा
शोधार्थी राजनीति विज्ञान

