कृत्रिम मेधा

राम नरेश पूनिया
वाईस प्रिंसिपल शिक्षा विभाग, राजस्थान एवं करियर मार्गदर्शन में रुचि रखने वाले शिक्षाविद। शिक्षा, करियर, युवा विकास एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सामाजिक प्रभावों पर नियमित लेखन।

स्कूल शिक्षा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का प्रवेश अब भविष्य की संभावना नहीं, वर्तमान की वास्तविकता है। छात्र होमवर्क से लेकर प्रोजेक्ट, प्रस्तुतीकरण और परीक्षा तैयारी तक एआई आधारित उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी तकनीक आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने की बात करती है। लेकिन जिस गति से एआई स्कूलों तक पहुँच रहा है, उससे अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था इसके लिए तैयार है?

स्कूल शिक्षा में एआई के उपयोग पर उत्साह स्वाभाविक है, किंतु इसके साथ कुछ मूलभूत प्रश्नों पर विचार आवश्यक है।

  1. एआई सीखने में सहायक है, सीखने का विकल्प नहीं

एआई छात्रों को तुरंत उत्तर, सारांश और उदाहरण उपलब्ध करा सकता है। इससे अध्ययन आसान होता है और व्यक्तिगत सीखने की गति को समर्थन मिलता है। कमजोर छात्र अतिरिक्त सहायता प्राप्त कर सकते हैं और शिक्षक भी पाठ योजना तैयार करने में समय बचा सकते हैं।

लेकिन सीखना केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं है। तर्क करना, प्रश्न पूछना, चर्चा करना, असहमति व्यक्त करना और अनुभवों से सीखना भी शिक्षा का हिस्सा है। यदि छात्र हर प्रश्न का उत्तर सीधे एआई से लेने लगेंगे, तो उनके विश्लेषणात्मक और रचनात्मक कौशल प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए एआई को सहायक उपकरण के रूप में देखना चाहिए, शिक्षक और विद्यार्थी के बीच होने वाली सीखने की प्रक्रिया के विकल्प के रूप में नहीं।

  1. एआई डिजिटल असमानता भी बढ़ा सकता है

भारत में अभी भी बड़ी संख्या में विद्यार्थी ऐसे हैं जिनके पास गुणवत्तापूर्ण इंटरनेट, स्मार्ट डिवाइस या डिजिटल संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है। शहरी और ग्रामीण विद्यालयों के बीच डिजिटल अंतर पहले से मौजूद है।

यदि एआई आधारित शिक्षण को बिना तैयारी के व्यापक रूप से लागू किया गया, तो संसाधन सम्पन्न और संसाधन-विहीन छात्रों के बीच सीखने का अंतर और बढ़ सकता है। शिक्षा में तकनीक का उद्देश्य अवसरों की समानता होना चाहिए, असमानता को बढ़ाना नहीं।

  1. डेटा सुरक्षा और बाल संरक्षण सबसे बड़ी चुनौती है

स्कूलों में एआई के उपयोग का अर्थ है कि छात्रों की सीखने की आदतों, प्रदर्शन, रुचियों और व्यक्तिगत जानकारी का बड़ा डिजिटल संग्रह तैयार होगा। यह डेटा अत्यंत संवेदनशील है।

भारत में अभी स्कूल स्तर पर एआई उपयोग के लिए विस्तृत दिशानिर्देश और सुरक्षा मानक व्यापक रूप से विकसित नहीं हुए हैं। यदि डेटा सुरक्षा, गोपनीयता और अभिभावकीय सहमति के स्पष्ट नियम नहीं बनाए गए, तो भविष्य में गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। बच्चों के डेटा की सुरक्षा को तकनीकी सुविधा से अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

  1. शिक्षकों को एआई से नहीं, एआई के साथ सशक्त करना होगा

अक्सर यह आशंका व्यक्त की जाती है कि एआई शिक्षकों की भूमिका कम कर देगा। वास्तव में ऐसा नहीं है। एक अच्छा शिक्षक केवल विषय नहीं पढ़ाता, बल्कि प्रेरित करता है, मूल्य विकसित करता है, व्यवहार समझता है और जीवन कौशल प्रदान करता है। यह मानवीय पक्ष किसी मशीन द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता।

वास्तविक आवश्यकता शिक्षकों को एआई साक्षर बनाने की है। यदि शिक्षक एआई के उपयोग, सीमाओं और नैतिक पक्ष को समझेंगे तो वे छात्रों को भी इसका जिम्मेदार उपयोग सिखा सकेंगे। बिना प्रशिक्षण के तकनीक उपलब्ध करा देना शिक्षा सुधार नहीं कहलाएगा।

आगे का रास्ता

स्कूल शिक्षा में एआई का उपयोग रोकना न तो संभव है और न ही उचित। लेकिन इसका विस्तार स्पष्ट नीति, शिक्षक प्रशिक्षण, डेटा सुरक्षा मानकों और नैतिक दिशानिर्देशों के साथ होना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण नागरिक तैयार करना है।

इसलिए एआई को कक्षा में स्थान अवश्य मिलना चाहिए, परंतु शिक्षा का केंद्र अभी भी छात्र, शिक्षक और मानवीय संवाद ही रहना चाहिए। तकनीक जितनी उन्नत होती जाएगी, उतना ही महत्वपूर्ण यह होगा कि हम बच्चों को सोचने, समझने और सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना सिखाएँ।

क्योंकि भविष्य में सफल वही छात्र होगा जो केवल एआई का उपयोग करना नहीं, बल्कि एआई के साथ मिलकर सोचने की क्षमता रखता होगा।

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