भूमिका एक सच्चे प्रजातंत्रवादी का उदय
भारतीय सामाजिक पुनर्जागरण के इतिहास में राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज (26 जून 1874 – 6 मई 1922) का नाम एक ऐसे अद्वितीय नरेश के रूप में स्वर्णाक्षरों में अंकित है, जिन्होंने राजसिंहासन पर बैठ कर भी अपना संपूर्ण जीवन वंचितों, शोषितों और दलितों के मानवीय अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए समर्पित कर दिया।

कोल्हापुर रियासत के इतिहास के ‘अमूल्य मणि’ शाहूजी महाराज ने शासक और प्रजा के बीच की पारंपरिक दूरी को मिटाकर शोषित वर्ग के कष्टों को न केवल समझा, बल्कि उनके निवारण को ही अपने जीवन का परम ध्येय बनाया।
प्रारंभिक जीवन, संघर्ष और राज्यारोहण
राजर्षि शाहूजी महाराज का जन्म 26 जून 1874 को हुआ था।

उनके बचपन का नाम यशवंतराव था। वे कागल के जागीरदार जयसिंह राव अप्पा साहिब घटगे के पुत्र थे तथा उनकी माता राधाबाई मुधोल राज्य की राजकन्या थीं।

मात्र तीन वर्ष की अल्पायु में माता के अवसान के बाद उनका लालन-पालन जीजाबाई द्वारा किया गया।

ब्रिटिश षड्यंत्रों और आंतरिक गद्दारी के कारण कोल्हापुर के शासक शिवाजी चतुर्थ की असमय मृत्यु के पश्चात, उनकी विधवा आनंदीबाई ने 17 मार्च 1884 को यशवंतराव को गोद लिया।

इसके बाद वे छत्रपति शाहूजी महाराज के रूप में कोल्हापुर की गद्दी पर आसीन हुए।

यद्यपि बाल्यकाल में ही राज्याभिषेक हो गया था, परंतु प्रशासनिक नियंत्रण पूर्ण रूप से 2 अप्रैल 1894 को उनके हाथों में आया।

सत्ता संभालते ही उन्होंने सार्वजनिक घोषणा की: “वे राज्य के चहुंमुखी विकास तथा जनता की समृद्धि की आकांक्षा रखते हैं।

वैचारिक पृष्ठभूमि और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
शाहूजी महाराज की प्रारंभिक शिक्षा राजकोट के राजकुमार विद्यालय में हुई और बाद में अंग्रेज शिक्षक स्टुअर्ट मिटफर्ड फ्रेज़र के सानिध्य में उनकी उच्च शिक्षा संपन्न हुई।

इस अंग्रेजी और आधुनिक शिक्षा ने उनके मानस पर गहरा प्रभाव डाला।

वे रूढ़िवादिता, काल्पनिक आख्यानों और पाखंडवाद के घोर विरोधी तथा तार्किक एवं वैज्ञानिक सोच के प्रबल समर्थक बने।

जिस समय उन्होंने सत्ता संभाली, समाज जाति-पात, छुआछूत, मानवाधिकारों की असमानता और वर्ण-व्यवस्था के क्रूर तांडव से ग्रसित था। चतुर्थ वर्ण (शूद्र) का कोई अस्तित्व नहीं समझा जाता था।

इस अंधकार युग में महात्मा ज्योतिराव फुले द्वारा स्थापित ‘सत्य शोधक समाज’ सामाजिक समता के लिए संघर्षरत था।

शाहूजी महाराज ज्योतिबा फुले के विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए और दीर्घकाल तक सत्य शोधक समाज के संरक्षक रहे।

सामाजिक क्रांतियों के मील के पत्थर

  1. आधुनिक आरक्षण के जनक
    भारतीय इतिहास में शाहूजी महाराज को जिस निर्णय के लिए सबसे विशिष्ट स्थान प्राप्त है, वह है उनके द्वारा लागू किया गया आरक्षण का प्रावधान।

सन 1894 में कोल्हापुर के सामान्य प्रशासन के 71 उच्च पदों में से 60 पर और 500 लिपिकीय पदों में से 490 पर एक विशेष वर्ग का वर्चस्व था।

इस असंतुलन को समाप्त करने के लिए महाराज ने 26 जुलाई 1902 को इंग्लैंड से एक ऐतिहासिक आदेश जारी कर 50 प्रतिशत पद दलित और पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित कर दिए।

यह जाति के आधार पर वंचितों को अवसर देने का भारत का पहला कानूनी प्रयास था, जिसके कारण उन्हें ‘आधुनिक आरक्षण का जनक’ कहा जाता है।

इसके परिणामस्वरूप 1912 तक प्रशासनिक पदों पर बहुजन प्रतिनिधित्व में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।

  1. वेदोक्त प्रकरण और धार्मिक वर्चस्व को चुनौती (1901)
    शाहूजी महाराज के जीवन में एक निर्णायक मोड़ तब आया जब 1901 में नदी स्नान के दौरान एक ब्राह्मण पंडित ने उन्हें ‘शूद्र’ कहकर वैदिक मंत्रों के स्थान पर पौराणिक मंत्रों का उच्चारण किया।

महाराज ने इस सामाजिक अपमान को एक चुनौती के रूप में लिया।

उन्होंने नारायण भट्ट सेवेकरी के माध्यम से अपना यज्ञोपवीत संस्कार करवाया।

जब तत्कालीन राज-पुरोहित ने रूढ़िवादियों के दबाव में महाराज का साथ देने से असमर्थता जताई, तो शाहूजी महाराज ने त्वरित कार्रवाई करते हुए राज-पुरोहित को पद से बर्खास्त कर दिया।

धार्मिक एकाधिकार को तोड़ने के लिए उन्होंने 9 जुलाई 1917 को राज्य के सभी देव स्थानों की संपत्ति पर सरकारी नियंत्रण स्थापित किया तथा मराठा व पिछड़ी जातियों के पुजारियों की नियुक्ति के आदेश दिए।

1920 में उन्होंने पुरोहितों के प्रशिक्षण के लिए विद्यालयों की स्थापना की और वंशानुगत पुजारी प्रणाली का अंत किया।

  1. अमानवीय प्रथाओं का अंत बलूतदारी और वतनदारी उन्मूलन
    दलितों की आर्थिक और सामाजिक दासता को समाप्त करने के लिए उन्होंने दो युगांतरकारी कानून बनाए
    बलूतदारी प्रथा का अंत (1917) इस प्रथा के तहत अछूतों को थोड़ी सी भूमि देकर उनके पूरे परिवार से जीवनभर मुफ्त बेगार ली जाती थी। महाराज ने इसे पूरी तरह प्रतिबंधित किया।

वतनदारी प्रथा का अंत (1918)
इस कानून के माध्यम से उन्होंने भूमि सुधार लागू किए और महारों (दलितों) को जमीन का मालिकाना हक दिलाकर उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया।

  1. समतावादी समाज और ‘गंगाराम कांबले’ प्रसंग
    प्रशासनिक सुधारों के साथ-साथ महाराज ने व्यक्तिगत आचरण से भी छुआछूत पर कड़ा प्रहार किया।

उनके महल के तालाब को छूने के कारण जब ऊंची जाति के लोगों ने उनके दलित सेवक गंगाराम कांबले की पिटाई की, तो महाराज ने दोषी सैनिक को कोड़ों से दंडित कर नौकरी से निकाल दिया।

इतना ही नहीं, उन्होंने कांबले को चाय और सोडा की दुकान खोलने के लिए आर्थिक सहायता दी और स्वयं वहां सार्वजनिक रूप से चाय पीकर पूरे समाज को सामाजिक समता का संदेश दिया।

शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक नीतियां
शाहूजी महाराज का दृढ़ विश्वास था कि जब तक निर्बल वर्गों को शिक्षित नहीं किया जाएगा, तब तक समाज का चहुंमुखी विकास असंभव है।

अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा
30 सितंबर 1912 को उन्होंने 10 वर्ष तक के बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य करने का कानून बनाया।

आगे चलकर 25 जुलाई 1917 को उन्होंने इसे पूर्णतः निःशुल्क और अनिवार्य कर दिया। ऐसा करने वाले वे देश के पहले शासक थे।

छात्रावासों की श्रृंखला
पिछड़ी जातियों में शिक्षा के प्रसार के लिए उन्होंने जातिवार छात्रावासों (जैसे- मराठा, जैन, मोहमडन, और अस्पृश्य मिल क्लार्क हॉस्टल)
की स्थापना की ताकि कोई भी छात्र संसाधनों के अभाव में शिक्षा से वंचित न रहे।

बाद में, जब इन जातियों में शिक्षा का स्तर सुधरा, तो 15 जनवरी 1919 के आदेश से उन्होंने पृथक स्कूलों को बंद कर सह-शिक्षा (Co-education) और एकीकृत शिक्षा व्यवस्था लागू की।

स्वास्थ्य और सामाजिक सुधार 1919 में उन्होंने चिकित्सालयों में अछूतों के सम्मानपूर्वक इलाज का अधिकार सुरक्षित किया।

उन्होंने बाल विवाह पर कड़ा प्रतिबंध लगाया तथा अंतरजातीय विवाह और विधवा पुनर्विवाह (1917) को कानूनी मान्यता प्रदान की।

कृषि और बुनियादी ढांचा विकास किसानों को ऋण और अनुदान देने के लिए सुविधाजनक किश्तें तय की।

राज्य को सूखे और बाढ़ से बचाने के लिए उन्होंने प्रख्यात इंजीनियर एम. विश्वेश्वरैया के सहयोग से एक विशालकाय बांध (राधा नगरी बांध) का निर्माण करवाया, जिससे कृषि क्षेत्र में समृद्धि आई।

डॉ. भीमराव अंबेडकर के सारथी और ‘मूकनायक’ का उदय
शाहूजी महाराज की सबसे दूरदर्शी खोज डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रतिमान में थी।

दत्तोबा पवार और दत्तोबा दलवी के माध्यम से जब उनका परिचय डॉ. अंबेडकर से हुआ, तो महाराज ने उनकी प्रतिभा को तुरंत पहचान लिया।

डॉ. अंबेडकर द्वारा अछूतों की आवाज बुलंद करने के लिए शुरू किए गए पाक्षिक पत्र

‘मूकनायक’ (31 जनवरी 1920)
के लिए महाराज ने ₹2,500 की तात्कालिक आर्थिक सहायता प्रदान की।

उन्होंने डॉ. अंबेडकर की अधूरी विदेशी शिक्षा को पूरा करने के लिए वित्तीय संबल प्रदान किया।

21-22 मार्च 1920 को मनमाड में आयोजित प्रथम अखिल भारतीय दलित वर्ग के सम्मेलन में शाहूजी महाराज ने डॉ. अंबेडकर को इस वर्ग का सर्वमान्य नेता घोषित करते हुए अत्यंत गर्व से कहा था

“मुझे लगता है कि अंबेडकर के रूप में तुम्हें तुम्हारा मुक्तिदाता मिल गया है। मुझे उम्मीद है कि वे तुम्हारी गुलामी की बेड़ियों को काट डालेंगे।

वे एक दिन न केवल इस देश के बल्कि पूरे राष्ट्र के महानतम नेताओं की श्रेणी में विशिष्ट स्थान पाएंगे।

कानूनी दूरदर्शिता: मिताक्षरा सिद्धांत का अंत (1920)
यद्यपि आधुनिक इतिहास में डॉ. अंबेडकर के हिंदू कोड बिल की व्यापक चर्चा होती है, परंतु शाहूजी महाराज ने 11 नवंबर 1920 को ही अपनी रियासत में एक क्रांतिकारी ‘हिंदू कोड बिल’ पास कर दिया था।

इस बिल के माध्यम से उन्होंने संपत्ति के उत्तराधिकार के संदर्भ में पारंपरिक ‘मिताक्षरा न्याय सिद्धांत’ को समाप्त कर दिया
(जिसके तहत स्त्रियों को संपत्ति के अधिकार से वंचित रखा जाता था) और महिलाओं के आर्थिक अधिकारों का मार्ग प्रशस्त किया।

उपसंहार
अमर विरासत
प्रशासनिक परिषद को भंग करने से लेकर वंचितों को सत्ता में भागीदारी देने तक, शाहूजी महाराज को कदम-कदम पर रूढ़िवादी शक्तियों के घोर विरोध और प्राणघातक धमकियों का सामना करना पड़ा।

परंतु वे अपनी विचारधारा पर अडिग रहे।

उन्होंने स्पष्ट कहा था:
वे गद्दी छोड़ सकते हैं, मगर सामाजिक प्रतिबद्धता के
कार्यों से पीछे नहीं हट सकते।

मात्र 48 वर्ष की अल्पायु में, 6 मई 1922 को बंबई (मुंबई) में इस महान विभूति का देहावसान हो गया।

कानपुर की कुर्मी महासभा द्वारा ‘राजर्षि’ (राजाओं में ऋषि) की उपाधि से विभूषित छत्रपति शाहूजी महाराज का 28 वर्षों का शासनकाल मानव अधिकारों, सामाजिक न्याय, आर्थिक लोकतंत्र और समतावादी समाज के निर्माण का एक स्वर्णिम अध्याय है।

उनका जीवन और कार्य आज के आधुनिक भारत के लोकतंत्र और समाजशास्त्र के लिए एक सदा प्रदीप्त रहने वाला प्रकाश स्तंभ है।

लेखक
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक ब्यावर राजस्थान
94622-60179

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