मेरे नाम में छुपी हुई रोशनी ! ऐसा कहना मेरे द्वारा सही है या गलत आपको तय करना है।

आज अलमारी की सफाई करते हुए मेरी पुरानी डायरी हाथ लग गई। उसके पीले पड़ चुके पन्नों को पलटते-पलटते अचानक एक सूखी हुई गुलाब की कली मेरी गोद में आ गिरी। उसे देखते ही मैं कुछ क्षणों के लिए ठिठक गई। वह कली केवल एक फूल नहीं थी, बल्कि मेरे जीवन के उस अध्याय की निशानी थी जिसे मैंने कभी बंद तो कर दिया था, लेकिन भुला नहीं पाई थी।

मैं सविता हूँ। एक बहुजन वंचित समाज की बेटी। उस समाज की बेटी, जिसके हिस्से में सदियों तक सम्मान से अधिक अपमान, अवसरों से अधिक बाधाएँ और प्रेम से अधिक तिरस्कार आया है। बचपन से ही मैंने लोगों की निगाहों में अपने लिए एक अदृश्य दूरी महसूस की थी। कोई सीधे कुछ न कहे, फिर भी उनके व्यवहार से यह अहसास हो जाता था कि मैं उस समाज से हूँ जिसे बराबरी की निगाह से देखना आज भी बहुतों ने नहीं सीखा।

कॉलेज में प्रवेश मिला तो लगा था कि शायद शिक्षा के संसार में सब बराबर होंगे, लेकिन वहाँ भी कई बार शब्दों से अधिक खामोशियाँ चुभती थीं। कुछ लोग दोस्त बनते-बनते पीछे हट जाते, कुछ परिचय पूछते-पुछते अचानक बदल जाते। मैं पढ़ाई में अच्छी थी, सपने भी बड़े थे, लेकिन आत्मविश्वास धीरे-धीरे टूट रहा था। ऐसा लगता था जैसे मेरे पूर्वजों के हिस्से का अपमान मेरी विरासत बनकर मेरे कंधों पर रख दिया गया हो।

उन्हीं दिनों मेरी मुलाकात उससे हुई थी। वह भी इसी कॉलेज का मेरा सीनियर साथी था लेकिन उसको दबे कुचले वर्ग को ऊपर उठाने का मिशनरी जज्बा था। यह दूसरे शब्दों में कहूं तो उनको दूसरे लोगों को सकारात्मक उत्प्रेरित करने की बीमारी थी।

वह मेरी जिंदगी में किसी वसंत की तरह आया था। उसने कभी मुझसे मेरी जाति नहीं पूछी। उसने केवल मेरी आँखों में छिपे हुए डर को पढ़ा था। शायद इसी कारण उसकी बातें सीधे मेरे दिल तक पहुँच जाती थीं।

मुझे आज भी वह बारिश भरी दोपहर याद है। हम दोनों कॉलेज के पास एक छोटे से कैफ़े में बैठे थे। बाहर बादल बरस रहे थे और भीतर मेरे मन में निराशा का सैलाब उमड़ रहा था। मैं लगातार अपनी परेशानियों का ज़िक्र कर रही थी और हर बात के अंत में यही कह रही थी—”मुझसे नहीं होगा।”

आख़िर मैंने थककर कहा, “शायद मेरी किस्मत में ही सब कुछ अधूरा रहना लिखा है। हमारे समाज की लड़कियों के सपने कहाँ पूरे होते हैं? हमें तो जन्म से ही सीमाएँ सौंप दी जाती हैं।”

वह कुछ क्षण चुप रहा। फिर मुस्कुराकर बोला, “तुम्हें पता है, तुम्हारी सबसे बड़ी समस्या क्या है?”

मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।

उसने कहा, “तुम दूसरों के लिखे हुए फैसलों को अपनी किस्मत समझ बैठी हो।”

मैं चुप रही।

फिर उसने धीरे से मेरा हाथ अपने हाथ में लिया और बोला, “सविता, तुम्हें कभी यह नहीं भूलना चाहिए कि ईश्वर किसी इंसान को नीचा बनाकर पैदा नहीं करता। अगर समाज ने दीवारें बनाई हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम उड़ना छोड़ दो।”

उस दिन उसकी बातें किसी धार्मिक उपदेश जैसी लग रही थीं। मुझे बाबा साहेब अंबेडकर की वह तस्वीर याद आने लगी जिसमें वे हाथ में संविधान लिए खड़े हैं। मुझे महात्मा फुले और सावित्रीबाई फुले के संघर्ष याद आने लगे। मुझे बुद्ध की करुणा याद आने लगी, जिन्होंने कहा था कि मनुष्य अपने कर्मों से ऊँचा होता है, जन्म से नहीं।

वह बोलता रहा, “तुम्हारे पुरखों ने सदियों का अँधेरा सहा ताकि आने वाली पीढ़ियाँ रोशनी देख सकें। अगर तुम हार मान लोगी तो उनके संघर्ष का क्या होगा?”

उसकी यह बात सुनकर मेरी आँखें भर आई थीं।

उस दिन पहली बार मुझे महसूस हुआ कि शायद मैं केवल अपने लिए नहीं जी रही हूँ। मेरे भीतर मेरे माता-पिता के सपने हैं, मेरे पूर्वजों की पीड़ा है और आने वाली पीढ़ियों की उम्मीदें भी हैं।

समय बीतता गया। कॉलेज खत्म हो गया। जिंदगी अपने-अपने रास्तों पर आगे बढ़ गई। वह अब मेरी दुनिया का हिस्सा नहीं है। शायद वर्षों से हमारी कोई बातचीत भी नहीं हुई। लेकिन उसकी कही हुई बातें आज भी मेरे भीतर जीवित हैं।

जब कभी मैं किसी कठिनाई के सामने कमजोर पड़ती हूँ, जब समाज की पुरानी सोच मुझे निराश करने लगती है, तब मुझे उसकी आवाज़ सुनाई देती है—”दूसरों के फैसलों को अपनी किस्मत मत समझो।”

आज मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ तो समझ पाती हूँ कि मेरे जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई गरीबी से नहीं थी, भेदभाव से भी नहीं थी। सबसे बड़ी लड़ाई अपने भीतर बैठे हुए उस डर से थी, जो मुझे बार-बार कमतर साबित करने की कोशिश करता था।

उसने मुझे सिखाया था कि आत्मसम्मान किसी विश्वविद्यालय की डिग्री से नहीं मिलता, वह अपने अस्तित्व को स्वीकार करने से मिलता है।

डायरी के उस पन्ने में दबा हुआ सूखा फूल आज भी मेरे पास है। उसकी खुशबू तो कब की उड़ चुकी है, लेकिन उससे जुड़ी हुई यादें अब भी महकती हैं। वे मुझे याद दिलाती हैं कि चाहे दुनिया कुछ भी कहे, मैं अपने पूर्वजों के संघर्षों की संतान हूँ। मैं किसी की दया की पात्र नहीं, बल्कि अपने अधिकारों की अधिकारी हूँ।

और शायद यही एहसास मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।

हगामी लाल मेघवंशी,
रिटायर्ड
डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। (अजमेर)हाल मुकाम ,जामनगर, गुजरात!
98292 30966

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