मेरा नाम क्या है, यह शायद बहुत कम लोगों को याद होगा। लोग मुझे मेरे नाम से कम और मेरी जाति से अधिक जानते हैं। बचपन से लेकर आज तक न जाने कितनी बार ऐसा हुआ कि किसी ने मेरा परिचय मेरे व्यक्तित्व, मेरी शिक्षा, मेरे विचारों या मेरे संघर्षों से नहीं, बल्कि मेरी जाति से कराया। धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा कि इस समाज में कुछ लोगों के लिए नाम और पहचान उनके कर्मों से बनती है, जबकि मेरे जैसे लोगों के लिए जन्म ही भाग्य और पहचान दोनों तय कर देता है।
मैं एक बहुजन, वंचित और सामाजिक रूप से उपेक्षित समुदाय में जन्मा युवक हूँ। मेरे माता-पिता ने मुझे बड़े प्रेम से पाला। उन्होंने मुझे सिखाया कि मेहनत और ईमानदारी से जीवन जिया जाए। लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया, मुझे यह एहसास होने लगा कि केवल मेहनत करना ही पर्याप्त नहीं है। समाज में कुछ अदृश्य दीवारें भी हैं, जो व्यक्ति की प्रतिभा और परिश्रम से अधिक उसके जन्म को महत्व देती हैं।
जब मैं विद्यालय में पढ़ता था, तब मुझे समझ नहीं आता था कि कुछ बच्चों के पास सब कुछ क्यों है और कुछ बच्चों के पास कुछ भी नहीं। कुछ बच्चों के माता-पिता प्रभावशाली पदों पर थे, उनके घरों में पुस्तकालय थे, पढ़ने के लिए अलग कमरे थे, कोचिंग थी, संसाधन थे। दूसरी ओर मेरे जैसे बच्चे थे, जिनके माता-पिता रोज़मर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष करते थे। हम पढ़ाई के साथ-साथ जीवन की कठिनाइयों का भी सामना कर रहे थे।
धीरे-धीरे मुझे समझ आया कि यह केवल व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति का प्रश्न नहीं है, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था का परिणाम भी है। जिन समुदायों के पास पीढ़ियों से भूमि, संपत्ति, शिक्षा और सत्ता रही, वे आज भी आगे दिखाई देते हैं। वहीं जिन समुदायों को सदियों तक शिक्षा और संसाधनों से दूर रखा गया, वे आज भी संघर्ष कर रहे हैं।
जब मैं कॉलेज पहुँचा, तब मुझे लगा कि अब शायद परिस्थितियाँ बदल जाएँगी। लेकिन वहाँ भी कई बार ऐसे अनुभव हुए जिन्होंने मुझे भीतर तक घायल किया। मेरी योग्यता पर प्रश्न उठाए गए। मेरी उपलब्धियों को मेरी मेहनत का परिणाम मानने के बजाय मेरी जाति से जोड़ दिया गया। कई लोगों की नजरों में मेरी सफलता मेरी क्षमता नहीं, बल्कि किसी व्यवस्था की देन थी।
उस समय मुझे सबसे अधिक पीड़ा इस बात से होती थी कि लोग मेरी कहानी जाने बिना मेरे बारे में निर्णय सुना देते थे। उन्हें यह दिखाई नहीं देता था कि मैंने कितनी रातें जागकर पढ़ाई की है, कितनी बार आर्थिक अभावों के कारण किताबें खरीदने में कठिनाई हुई है, कितनी बार परिवार की जिम्मेदारियों और पढ़ाई के बीच संतुलन बनाना पड़ा है। उन्हें केवल मेरी जाति दिखाई देती थी।
कई बार मुझे लगता था कि मेरा अपना नाम कहीं खो गया है। मेरे माता-पिता ने जो नाम रखा था, वह मानो समाज के शोर में दब गया। लोग मुझे मेरे नाम से नहीं, मेरी जाति से पुकारते थे। जैसे मेरा अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही न हो।
मैं जब अपने आसपास देखता हूँ, तो एक गहरी असमानता दिखाई देती है। बड़े उद्योग, विशाल संपत्तियाँ, प्रतिष्ठित संस्थान, प्रभावशाली पद और निर्णय लेने वाली संस्थाएँ—इन सबमें आज भी कुछ वर्गों का प्रभुत्व अधिक दिखाई देता है। दूसरी ओर मेरे समाज के लाखों युवा आज भी बेहतर शिक्षा, रोजगार और सम्मानजनक अवसरों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
यह देखकर मेरे मन में कई प्रश्न उठते हैं। यदि सबको समान अवसर मिले हैं, तो फिर संसाधनों का वितरण इतना असमान क्यों है? यदि समाज वास्तव में बराबरी पर आधारित है, तो फिर आज भी कुछ समुदायों को अपने अस्तित्व और सम्मान के लिए लगातार संघर्ष क्यों करना पड़ता है?
मेरे समाज के अनेक परिवार आज भी आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे हैं। अनेक बच्चे ऐसे हैं जो अपनी प्रतिभा के बावजूद पर्याप्त अवसर नहीं प्राप्त कर पाते। कई युवाओं के सपने संसाधनों की कमी के कारण अधूरे रह जाते हैं। यह केवल आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न भी है।
इन सबके बीच सबसे कठिन संघर्ष मानसिक होता है।
हर दिन मुझे स्वयं को मजबूत दिखाना पड़ता है। लोगों को लगता है कि मैं सामान्य हूँ, लेकिन भीतर बहुत कुछ टूटता रहता है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि मैं लगातार एक अदृश्य बोझ ढो रहा हूँ। एक ऐसा बोझ जो केवल मेरा नहीं, बल्कि मेरे पूरे समुदाय के इतिहास का बोझ है।
रात के समय जब चारों ओर शांति होती है, तब मेरे भीतर अनेक प्रश्न जाग उठते हैं। मैं सोचता हूँ कि क्या आने वाली पीढ़ियों को भी यही सब झेलना पड़ेगा? क्या मेरे बच्चों को भी अपने नाम से पहले अपनी जाति बतानी पड़ेगी? क्या वे भी अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए दूसरों से अधिक संघर्ष करेंगे?
ऐसे क्षणों में मन बहुत भारी हो जाता है। कभी-कभी लगता है कि कोई ऐसा हो जो बिना कुछ पूछे मेरी पीड़ा को समझ सके। कोई ऐसा हो जो मेरे शब्दों से अधिक मेरे मौन को सुन सके।
लेकिन जीवन केवल दुःख का नाम नहीं है। मेरे भीतर एक आशा भी है।
मैंने अपने समाज के अनेक युवाओं को संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते देखा है। मैंने उन लोगों की कहानियाँ पढ़ी हैं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी शिक्षा को अपना हथियार बनाया और इतिहास बदल दिया। मैंने देखा है कि जागरूकता बढ़ रही है, नई पीढ़ी अपने अधिकारों को समझ रही है और सम्मानपूर्ण जीवन के लिए संगठित हो रही है।
यही आशा मुझे आगे बढ़ने की शक्ति देती है।
मैं चाहता हूँ कि आने वाला भारत ऐसा हो जहाँ किसी बच्चे की पहचान उसकी जाति नहीं, उसकी प्रतिभा हो। जहाँ किसी युवक की योग्यता पर उसके जन्म के आधार पर संदेह न किया जाए। जहाँ किसी व्यक्ति को अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष न करना पड़े।
मैं चाहता हूँ कि समाज यह समझे कि समानता किसी पर किया गया उपकार नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। सम्मान किसी विशेष वर्ग की संपत्ति नहीं, बल्कि हर मनुष्य की जन्मसिद्ध गरिमा है।
मैं एक बहुजन युवक हूँ। मेरे पास बहुत बड़ी संपत्ति नहीं है, न ही कोई विशेष सामाजिक शक्ति है। लेकिन मेरे पास सपने हैं, संघर्ष करने का साहस है और न्यायपूर्ण समाज की आकांक्षा है।
हो सकता है कि मेरा रास्ता कठिन हो, लेकिन मैं रुकूँगा नहीं। क्योंकि मैं केवल अपने लिए नहीं चल रहा हूँ। मैं उन पीढ़ियों के सपनों को लेकर चल रहा हूँ जिन्हें अवसर नहीं मिले। मैं उन आवाज़ों का प्रतिनिधि हूँ जिन्हें लंबे समय तक दबाया गया। मैं उस उम्मीद का वाहक हूँ जो आज भी करोड़ों वंचित युवाओं की आँखों में चमकती है।
और मुझे विश्वास है कि एक दिन ऐसा अवश्य आएगा जब मेरा नाम मेरी जाति पर भारी पड़ेगा, जब मेरी पहचान मेरा जन्म नहीं, मेरे कर्म होंगे, और जब इस देश का हर नागरिक बिना किसी भेदभाव के सिर उठाकर कह सकेगा—मैं एक समान और सम्मानित भारतीय हूँ।
लेकिन अब मैं निराश नहीं हूँ। मैं उस परंपरा का उत्तराधिकारी हूँ जिसने अन्याय के सामने कभी घुटने नहीं टेके। मैं बाबा साहेब भीमराव रामजी अंबेडकरऔर ज्योति राव फुले का अनुयायी हूँ। उन्होंने हमें सिखाया कि शिक्षा, संगठन और संघर्ष ही मुक्ति का मार्ग है। हार मानना मेरे लिए शर्म और आत्मसमर्पण के समान है। इसलिए मैं झुकूँगा नहीं, रुकूँगा नहीं और अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद करता रहूँगा।
मैं जानता हूँ कि आने वाला समय बहुजन, वंचित, दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज का होगा। क्योंकि अब हम अपने वोट की कीमत पहचान चुके हैं। अब हम केवल नारों और वादों से प्रभावित नहीं होंगे। हम ऐसे जनप्रतिनिधियों को चुनकर भेजेंगे जो हमारी पीड़ा समझें, हमारे अधिकारों की बात करें और हमारे समाज की आवाज संसद, विधानसभा और सत्ता के गलियारों तक पहुँचाएँ।
आज का बहुजन नवयुवक जाग चुका है। वह अंधविश्वास, भाग्यवाद और सामाजिक हीनता के बोझ से बाहर निकल रहा है। उसने ईवी रामास्वामी पेरियार को पढ़ा है, उसने प्रश्न करना सीखा है, तर्क करना सीखा है और अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना सीखा है। यही जागरूकता आने वाले भारत को अधिक न्यायपूर्ण, समतामूलक और मानवीय बनाएगी।
जय भीम

हगामी लाल
मेघवंशी,
रिटायर्ड डिप्टी
कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक. (अजमेर) हाल मुकाम, जामनगर ,गुजरात! 98 292 30966
