भूमिका
रिश्तों की पवित्रता और समाज के ताने-बाने में आज एक ऐसा सन्नाटा पसर गया है, जिसकी चीखें तो बहुत बुलंद हैं, मगर उन्हें सुनने वाला कोई नहीं है। एक दौर था जब विदा होकर ससुराल जाने वाली बेटियों की डोली के पीछे दहेज की वो भयानक आग सुलगती थी, जिसमें अनगिनत मासूम जिंदगियाँ जलकर खाक हो गईं। वह आधी आबादी की बेबसी का काला अध्याय था। मगर आज, वक्त का पहिया कुछ इस तरह घूमा है कि ज़ुल्म की दास्ताँ ने अपना रुख बदल लिया है।
अत्याचार का चेहरा बदल चुका है, लेकिन बेबसी के आँसू और घुटती हुई सांसों की पीड़ा आज भी जस की तस है। कल जहाँ औरत होना एक अभिशाप माना जाता था, आज वहाँ पुरुष होना जैसे एक जन्मजात गुनाह और अदृश्य अपराध बन गया है। वैवाहिक कलह, झूठे मुकदमों और एलिमनी की अंतहीन बेड़ियों में जकड़े पुरुषों का दर्द आज समाज के बंद दरवाजों के पीछे सिसक रहा है।

वक्त का क्रूर पहिया और बदलती त्रासदी

बेटियों को उस नर्क से निकालने के लिए कानून बने, कड़े प्रावधान किए गए और समाज में जागरूकता आई। यह एक सराहनीय और बेहद ज़रूरी बदलाव था। लेकिन समय के चक्र ने एक और भयानक मोड़ ले लिया। समाज की त्रासदी आज भी वही है, बस उत्पीड़न का शिकार होने वाला चेहरा बदल गया है।
कल जो आग बेटियों की रसोई से उठती थी, आज वही आग मुकदमों और कोर्ट-कचहरी के कागजों से निकलकर एक मर्द के हँसते-खेलते जीवन को राख कर रही है। आज समाज का एक बड़ा हिस्सा पुरुषों के दर्द के प्रति पूरी तरह अंधा हो चुका है। आँसू चाहे महिला के हों या पुरुष के, उनका कड़वापन और उनका दर्द एक जैसा होता है, लेकिन समाज ने पुरुषों के आँसुओं को देखना बंद कर दिया है।
झूठे आरोपों का जाल और आँकड़ों की खौफनाक हकीकत

इस मूक त्रासदी को महज़ एक जज़्बाती दलील नहीं समझा जाना चाहिए, क्योंकि सरकारी आँकड़े इसकी गवाही खुद चीख-चीख कर दे रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के हालिया आत्महत्या के आँकड़े दिल दहला देने वाले हैं। भारत में होने वाली कुल आत्महत्याओं में पुरुषों की हिस्सेदारी 73.5% तक पहुँच चुकी है, जिनमें एक बहुत बड़ा हिस्सा पारिवारिक कलह और वैवाहिक मानसिक प्रताड़ना से जूझ रहे पुरुषों का है.
ये आँकड़े केवल संख्याएँ नहीं हैं, बल्कि उन मासूम मर्दों की अधूरी रह गई जिंदगियों की दास्ताँ हैं जो अंदर ही अंदर घुटकर दम तोड़ चुके हैं। जब एक पुरुष पर दहेज उत्पीड़न या घरेलू हिंसा का कोई झूठा मुकदमा दर्ज होता है, तो समाज बिना सच जाने उसे ‘अपराधी’ घोषित कर देता है। उसका करियर, उसका मान-सम्मान और बरसों की मेहनत एक ही झटके में मटियामेट हो जाती है। पुरुष से उसका रोने का हक भी छीन लिया गया है। ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ जैसी खोखली कहावतों के पीछे छिपा एक आम पुरुष अंदर ही अंदर टूटता रहता है।

एलिमनी (गुजारा भत्ता) की बेड़ियाँ और घुटती जिंदगी

तलाक की प्रक्रिया में एलिमनी और मेंटेनेंस के नाम पर कई बार पुरुष को आर्थिक रूप से पूरी तरह अपाहिज बना दिया जाता है। अपनी बूढ़ी माँ की दवाइयों, छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई और खुद के अस्तित्व को बचाने के संघर्ष के बीच जब कोर्ट की तरफ से भारी-भरकम राशि का फरमान आता है, तो एक आम नौकरीपेशा मर्द अंदर से मर जाता है।
उसे अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा उस रिश्ते की एवज में देना पड़ता है जो टूट चुका है। यह आर्थिक और मानसिक शोषण पुरुष को एक ऐसी बेड़ी में जकड़ देता है जिससे छूटने का कोई रास्ता उसे नज़र नहीं आता। वह दिन-रात सिर्फ एक मशीन की तरह काम करता है, ताकि कानूनी कार्रवाई और जेल जाने से बच सके। इस घुटने वाली जिंदगी में उसका अपना कोई सपना, अपनी कोई खुशी बाकी नहीं रह जाती।
जब मर्द होना ही अपराध बन गया:
अदालत की सख्त टिप्पणी
इस विषय पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने भी गंभीर चिंता व्यक्त की है। हाल के एक ऐतिहासिक मामले में कोर्ट ने दुख और निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि पत्नियों द्वारा वैवाहिक विवादों में पति के बूढ़े माता-पिता, दूर के रिश्तेदारों और अलग रह रही विवाहित बहनों को भी दुर्भावनापूर्ण तरीके से आरोपी बना दिया जाता है।
अदालत ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि बिना किसी ठोस सबूत के पूरे परिवार का नाम घसीटना और सामान्य या अस्पष्ट आरोपों के आधार पर किसी को सजा देना ‘कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग’ है। अदालतों की ये टिप्पणियाँ साफ़ इशारा करती हैं कि सुरक्षा के लिए बनी ढाल अब एक खतरनाक हथियार में तब्दील हो चुकी है, जिसके निशाने पर सिर्फ बेकसूर पुरुष और उनका परिवार आ रहा है।
न्याय की आड़ में मासूम जिंदगियों का अंत

इस पूरी त्रासदी का सबसे खौफनाक पहलू यह है कि जब मानसिक प्रताड़ना और सामाजिक कलंक सहने की सीमा खत्म हो जाती है, तो कई मासूम पुरुष आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर हो जाते हैं। हर साल न जाने कितने पुरुष सिर्फ इसलिए फाँसी के फंदे पर झूल जाते हैं क्योंकि वे झूठे मुकदमों और कोर्ट के चक्करों से थक चुके होते हैं।
न्याय का मकसद किसी को जीवन देना और समाज में संतुलन बनाना होना चाहिए, लेकिन जब कानून एकतरफा होकर किसी निर्दोष की जान लेने का कारण बनने लगे, तो वह न्याय नहीं बल्कि कानूनी कत्ल कहलाता है। क्या उन मासूम पुरुषों की जान की कोई कीमत नहीं है जो बिना किसी खता के मौत के आगोश में सो गए?

समय की सबसे बड़ी माँग: निष्पक्ष कानूनी समीक्षा

अब वह समय आ चुका है जब हमें अपनी आँखें खोलनी होंगी। नारी सशक्तिकरण और महिलाओं की सुरक्षा के कानून जितने आवश्यक हैं, उतने ही आवश्यक पुरुषों को झूठे आरोपों से बचाने के प्रावधान भी हैं। कानूनों की निष्पक्ष समीक्षा आज के समय की सबसे बड़ी और अपरिहार्य माँग है।
अदालतों को केवल जेंडर देखकर नहीं, बल्कि सच और सबूतों को देखकर फैसला करना होगा। झूठे मुकदमे करने वालों के खिलाफ भी उतने ही कड़े दंड का प्रावधान होना चाहिए, ताकि कानून के इस दुरुपयोग पर लगाम कसी जा सके। न्याय की देवी की आँखों पर बंधी पट्टी का मतलब निष्पक्षता होना चाहिए, न कि किसी एक पक्ष के प्रति अंधापन।

समापन

पीड़ा का कोई जेंडर नहीं होता। दर्द चाहे औरत का हो या मर्द का, वह एक इंसान का दर्द होता है। कल तक जो समाज बेटियों के जलने पर आंसू बहा रहा था (और वह बिल्कुल सही था), आज उसी समाज को बेटों के घुट-घुट कर मरने पर भी तड़पना होगा। हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना होगा जहाँ किसी भी मासूम को सिर्फ इसलिए अपनी जान न गंवानी पड़े क्योंकि वह एक पुरुष है। न्याय की आड़ में हो रहे इस मूक नरसंहार को रोकना ही होगा, तभी सही मायनों में एक स्वस्थ, संतुलित और मानवीय समाज की स्थापना हो सकेगी।

कल जिसे कहते थे देवी, आज उसने यूँ सितम ढाया है,
ढाल जो मिली थी हिफ़ाज़त की, उसे खंजर बनाया है

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)।
स्रोत और संदर्भ
अशोक निर्मल की थ्रेड्स पर पोस्ट से प्रेरित एवं
NCRB के पुरुष आत्महत्या आँकड़े, सुप्रीम कोर्ट की धारा 498A दुरुपयोग सम्बन्धी टिप्पणियाँ, तथा वैवाहिक मुकदमों के समाजशास्त्रीय अध्ययन।

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