19 वीं सदी में महात्मा ज्योतिबा फुले महान समाज सुधारक,विचारक और क्रांतिकारी बहुजन चिंतक हुए। जिन्होंने जीवन पर्यंत बहुजन समाज के शोषितों,वंचितों, महिलाओं के साथ साथ शिक्षा व स्वाभिमान के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य किए। उन्होंने बाल-विवाह का विरोध किया और विधवा विवाह का समर्थन किया। सन 1860 में विधवाओं और अनाथ बच्चों के लिए आश्रम खोला। उन्होंने सन 1848 में अपनी पत्नी सावित्री बाई फुले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला,जिसके लिए फातिमा शेख ने उनका भरपूर सहयोग किया। उस दौर में यह देश का पहला स्कूल था जिसमें महिलाओं व बालिकाओं को पढ़ाया जाने लगा। हालांकि इस पुनीत कार्य के लिए उन्हें अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ा लेकिन वे दृढ़ निश्चय के साथ कार्य करते रहे। भारत देश में बालिका व महिला शिक्षा को बढ़ावा देने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है। महात्मा ज्योतिबा फुले ने जाति आधारित भेदभाव का मुकाबला करने व ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती देने के लिए सन 1873 में “सत्य शोधक समाज” की स्थापना की। उनके द्वारा सन 1873 में लिखित पुस्तक “गुलामगिरी” जो कि भारतीय समाज में जाति आधारित शोषण,ब्राह्मणवादी वर्चस्व और मानसिक गुलामी के खिलाफ एक क्रांतिकारी दस्तावेज है। सन 1881 में लिखी उनकी दूसरी पुस्तक “किसान का कोड़ा” औपनिवेशिक भारत में शुद्र किसानों के शोषण,गरीबी और अज्ञानता की भयावह स्थिति का चित्रण करती है। यह पुस्तक जातिवाद,शोषण,धार्मिक कर्मकांडों के नाम पर लूट और ब्रिटिश सरकार की नीतियों को किसानों की बदहाली का कारण बताती है। महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के पुणे में एक किसान माली परिवार हुआ था। इनके परिवार के लोग फूलों व बागवानी का कार्य करते थे, जिसके कारण इन्हें फुले कहा जाने लगा। बचपन में मराठी में अध्ययन करते हुए अपनी पढ़ाई को बीच में ही छोड़कर कृषि कार्य में लग गए। बाद में उन्हें शिक्षा के महत्व की समझ बढ़ी तो उन्होंने 21 वर्ष की आयु में पुनः पढ़ना शुरू किया और मराठी व अंग्रेजी में कक्षा सातवीं तक की पढ़ाई की। उनके पिताजी का नाम गोविंद राव व माताजी का नाम चिमन बाई था। सन 1840 में सावित्री बाई फुले के साथ उन्होंने विवाह किया तथा शिक्षा व समाज सुधार की अलख जगाई। सन 1848-1852 के बीच कुल 18 स्कूल खोले और सभी जाति,धर्म के सभी को शिक्षा ग्रहण करने के अवसर प्रदान किए। क्योंकि उनका मानना था कि- “विद्या बिना मति गई,मति बिना नीति गई,नीति बिना गति गई,गति बिना वित्त गया,वित्त बिना शुद्र गए,इतने अनर्थ एक अविद्या ने किए।” सामाजिक क्रांति के अग्रदूत महामानव,शिक्षा के जनक,स्वाभिमान के प्रतीक,सामाजिक न्याय के प्रणेता,समता मूलक समाज की उच्च सोच के धनी महात्मा ज्योतिबा फुले का 28 नवम्बर 1890 को परिनिर्वाण हो गया। उन्होंने भारतीय समाज में एक नई सोच को जन्म दिया जो शिक्षा,स्वाभिमान और समानता पर आधारित थी।


संकलन- भोमाराम बोस अध्यापक,राउमावि रनिया देशीपुरा,तहसील कल्याणपुर,जिला-बालोतरा (राज.) 9829236009

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *