भारत की प्रजातांत्रिक व्यवस्था में कुछ शब्द अत्यंत लोकप्रिय हो चुके हैं—जैसे सुशासन, जनता की सरकार, और भ्रष्टाचार उन्मूलन। ये शब्द केवल भाषणों तक सीमित रह जाते हैं और एक प्रकार का नारा (पुकार) बन जाते हैं, जिनसे आम जनता को आकर्षित किया जाता है। “डेमोक्रेसी” (जनतंत्र) की अवधारणा लोगों को यह विश्वास दिलाती है कि सत्ता उनके हाथ में है, परंतु वास्तविकता में यह विश्वास कई बार भ्रम साबित होता है। समय के साथ जब वादे पूरे नहीं होते, तब जनता के मन में अविश्वास और निराशा भी गहराने लगती है, जो लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।

वंचित समाज, जो सदियों से सामाजिक और आर्थिक असमानताओं का सामना करता आया है, स्वभाव से अत्यंत मासूम (भोला) और सरल होता है। उसकी यही सरलता उसे राजनीतिक खेल का आसान हिस्सा बना देती है। “पॉलिटिक्स” (राजनीति) की जटिल चालों को समझना उसके लिए कठिन होता है, इसलिए वह भावनात्मक अपीलों में बह जाता है और वास्तविक मुद्दों से दूर हो जाता है। इसी कारण उसका शोषण बार-बार होता है और वह अपने अधिकारों के प्रति पूरी तरह सजग नहीं हो पाता, जिससे उसकी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाता।

चुनाव के समय यह स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। राजनीतिक दल अपने वादाखिलाफी (वचनभंग) के इतिहास को छिपाकर नए वादों के साथ जनता के सामने आते हैं। “कैंपेन” (प्रचार) के दौरान बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, और साथ ही नकदी, शराब तथा अन्य वस्तुओं का वितरण कर मतदाताओं को प्रभावित किया जाता है। इस प्रक्रिया में आम नागरिक का विवेक कमजोर पड़ जाता है और वह तत्काल लाभ के आकर्षण में दीर्घकालिक हितों को नजरअंदाज कर देता है, जिससे लोकतंत्र की पवित्रता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग जाता है।

एक गरीब देश में चुनाव की प्रक्रिया का इतना महंगा होना अपने आप में एक फिजूलखर्ची (अनावश्यक खर्च) का संकेत है। “इलेक्शन” (चुनाव) के दौरान जो धन खर्च होता है, वह यदि विकास कार्यों में लगाया जाए तो समाज का बड़ा वर्ग लाभान्वित हो सकता है। परंतु राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में यह खर्च एक सामान्य प्रवृत्ति बन चुकी है, जहाँ जीत को ही सर्वोच्च लक्ष्य मान लिया जाता है। इस कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं जैसे आवश्यक क्षेत्र उपेक्षित रह जाते हैं, जिससे समाज में असमानता और अधिक गहराती जाती है।

वंचित समाज की सबसे बड़ी चुनौती उसकी सीमित समझदारी (बुद्धिमत्ता) है, जो शिक्षा के अभाव के कारण उत्पन्न होती है। “एजुकेशन” (शिक्षा) की कमी उसे अपने अधिकारों और कर्तव्यों से अनभिज्ञ रखती है। यही कारण है कि वह बार-बार गलत निर्णय लेने के लिए विवश हो जाता है और उसका शोषण जारी रहता है। यदि उसे सही दिशा और मार्गदर्शन मिले तो वह अपनी स्थिति बदल सकता है, परंतु वर्तमान परिस्थितियों में वह अवसरों से वंचित रह जाता है और विकास की मुख्यधारा से पीछे छूट जाता है।

राजनीतिक दल इस कमजोरी का लाभ उठाते हुए जनता के जज़्बात (भावनाएँ) को भड़काते हैं। वे जाति, धर्म और क्षेत्रीय मुद्दों को उभारकर “इमोशन” (भावना) के सहारे वोट प्राप्त करते हैं। इससे समाज में आपसी दूरी और अविश्वास बढ़ता है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। परिणामस्वरूप समाज का संतुलित विकास रुक जाता है और वंचित वर्ग अपनी मूल समस्याओं से जूझता ही रह जाता है, जिससे उसकी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाता।

सत्ता प्राप्त करने के बाद वही नेता जनता से दूरी बना लेते हैं और उनके व्यवहार में बेदिली (उदासीनता) स्पष्ट दिखाई देने लगती है। “गवर्नेंस” (शासन) के नाम पर केवल घोषणाएँ की जाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव बहुत कम देखने को मिलता है। इससे जनता का विश्वास धीरे-धीरे कमजोर होता जाता है और वह स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगती है। परिणामस्वरूप लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठने लगते हैं और जनसरोकारों से जुड़ी अपेक्षाएँ अधूरी रह जाती हैं।

इस पूरे परिदृश्य का परिणाम यह होता है कि वंचित समाज के भीतर गहरी मायूसी (निराशा) जन्म लेती है। बार-बार टूटती उम्मीदें उसे मानसिक रूप से थका देती हैं और वह अपने भविष्य को लेकर असमंजस में रहने लगता है। “डेवलपमेंट” (विकास) के बड़े-बड़े दावे केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं, जिससे जनता का विश्वास और अधिक कम हो जाता है। ऐसी स्थिति में समाज का मनोबल गिरता है और वह परिवर्तन की आशा भी धीरे-धीरे खोने लगता है, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत है।

इस स्थिति से बाहर निकलने का एकमात्र उपाय जागरूकता है। जब समाज में शऊर (समझ-बूझ) विकसित होगा, तब वह सही और गलत में अंतर कर पाएगा। “अवेयरनेस” (जागरूकता) के माध्यम से ही वह अपने अधिकारों को समझ सकेगा और नेताओं से जवाबदेही मांग सकेगा। जागरूक नागरिक ही लोकतंत्र की असली ताकत होते हैं, जो न केवल अपने मत का सही उपयोग करते हैं बल्कि शासन की नीतियों पर भी सजग निगाह रखते हैं, जिससे व्यवस्था अधिक उत्तरदायी और पारदर्शी बनती है।

अंततः, वंचित समाज को अपने भीतर खुद्दारी (आत्मसम्मान) और स्वाभिमान की भावना विकसित करनी होगी। जब वह स्वयं को सशक्त बनाएगा, तभी वह सही निर्णय लेने में सक्षम होगा और अपने अधिकारों की रक्षा कर पाएगा। “रिस्पॉन्सिबिलिटी” (जिम्मेदारी) की भावना के साथ यदि वह अपने मताधिकार का प्रयोग करेगा, तो वह न केवल बेहतर नेतृत्व का चयन करेगा बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन भी ला सकेगा। इससे एक सशक्त, जागरूक और न्यायपूर्ण व्यवस्था का निर्माण संभव हो सकेगा, जहाँ हर वर्ग को समान अवसर और सम्मान प्राप्त हो।

शेर:
जाग उठे जो हक़ की खातिर, बदलेंगी तक़दीरें,
ख़ामोशी से कुछ न होगा, आवाज़ बने तदबीरें।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी ,रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966

स्रोत व संदर्भ :
प्रदीप पांडे की थ्रेड पर पोस्ट से प्रेरित एवं सामाजिक जागरूकता, लोकतंत्र, अधिकार, शिक्षा, संघर्ष, परिवर्तन, प्रेरणा, समानता, चेतना, समाज

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