लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक, ब्यावर

भारतीय इतिहास के पन्नों में कुछ ऐसे नायक भी हुए हैं जिनकी गर्जना ने, न केवल सत्ता की चूलें हिला दीं, बल्कि सदियों से सोए हुए स्वाभिमान को भी जगा दिया।

आज 22 अप्रैल
उस महान क्रांतिकारी, सच्चे अंबेडकरवादी और ‘आद-धर्म’ आंदोलन के प्रणेता बाबू मंगू राम मुगोवालिया की पुण्यतिथि है, जिन्होंने पंजाब की धरती से अस्पृश्यता के विरुद्ध एक अभूतपूर्व शंखनाद किया था।

संघर्ष की नींव और शिक्षा की मशाल
14 जनवरी 1886 को होशियारपुर के मुगोवाल गांव में जन्में मंगू राम जी का शुरुआती जीवन कांटों भरा था।

एक चमार परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें कदम-कदम पर जातिवाद का ज़हर पीना पड़ा। वह स्कूल के अकेले अछूत छात्र थे, जिन्हें कक्षा के भीतर बैठने तक की अनुमति नहीं थी। ओलावृष्टि के दौरान जब उन्होंने भीतर शरण लेनी चाही, तो एक सवर्ण शिक्षक ने उन्हें बेरहमी से पीटा।

लेकिन यह अपमान मंगू राम के हौसलों को तोड़ नहीं सका। उन्होंने न केवल अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि 1909 में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, अमेरिका तक का सफर तय किया।

वहाँ वे ‘गदर पार्टी’ का हिस्सा बने और देश की आज़ादी के लिए हथियारों की तस्करी जैसे जोखिम भरे कार्यों में जुट गए।

मृत्यु की सज़ा से सामाजिक क्रांति तक
विदेशी धरती पर उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 16 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद जब वे 1925 में भारत लौटे, तो उनके अपनों ने उन्हें मृत मान लिया था। यहाँ तक कि उनकी पत्नी का विवाह ‘चादर पाना’ रस्म के तहत उनके छोटे भाई से कर दिया गया था। इस व्यक्तिगत आघात ने उन्हें विचलित करने के बजाय समाज सेवा के लिए और अधिक दृढ़ कर दिया।

उन्होंने मुगोवाल में ‘आद-धर्म स्कूल’ की स्थापना की, क्योंकि वे जानते थे कि शिक्षा ही वह शेरनी का दूध है जो गुलामी की बेड़ियाँ काट सकती है।

आद-धर्म आंदोलन: पहचान की लड़ाई
16 दिसंबर 1926 को बाबू मंगू राम ने ‘आद-धर्म आंदोलन’ की शुरुआत की। उन्होंने तर्क दिया कि दलित इस देश के मूल निवासी (आदिवासी) हैं और उनका धर्म हिंदू धर्म से अलग ‘आद-धर्म’ है।

परिणाम: 1931 की जनगणना में लगभग 4.18 लाख लोगों ने गर्व से खुद को ‘आद-धर्मी’ लिखवाया।

प्रभाव
चमार, वाल्मीकि, भंगी और रामदासिया समुदायों को एक मंच पर लाकर उन्होंने जातिगत ऊँच-नीच को सीधी चुनौती दी।

डॉ. अंबेडकर और मंगू राम: दो महान नायकों का संगम
जब डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर को मंगू राम जी के कार्यों का पता चला, तो उन्होंने पत्र लिखकर उनकी सराहना की।
इसके बाद मंगू राम जी पूर्णत बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के अनुयायि बन गए।

इतिहास का वह मोड़ सबसे महत्वपूर्ण है जब 1931 के द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में महात्मा गांधी ने दावा किया कि वे अछूतों के एकमात्र नेता हैं। तब बाबू मंगू राम ने ही,पंजाब से 1,000 से अधिक टेलीग्राम लंदन भेजे, जिनमें से कई खून से लिखे गए थे। इन पत्रों ने स्पष्ट कर दिया कि:
“दलितों के वास्तविक राजनीतिक नेता केवल और केवल डॉ. भीमराव अंबेडकर हैं।”

गरीब मजदूरों ने अपना घर का सामान बेचकर टेलीग्राम के पैसे जुटाए, ताकि वे अपने मसीहा डॉ. अंबेडकर का पक्ष मजबूत कर सकें। यह त्याग विश्व इतिहास में विरला है।

विरासत और उपसंहार
आज़ादी के बाद भी बाबू मंगू राम जी सक्रिय रहे। 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में सम्मानित किया। 22 अप्रैल 1980 को 94 वर्ष की आयु में इस महामानव का निधन हुआ।

बाबू मंगू राम मुगोवालिया का जीवन हमें सिखाता है कि सामाजिक न्याय की लड़ाई केवल सत्ता के लिए ही नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान और पहचान के लिए होती है।
आज 22 अप्रैल को उनकी पुण्यतिथि पर, उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके द्वारा जलाए गए शिक्षा और समानता के दीप को बुझने न दें।
जय भीम! जय भारत! जय बाबू मंगू राम मुगोवालिया!

लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक ब्यावर

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