भूमिका (प्रस्तावना)

आज का दौर सूचना और तकनीक का है, लेकिन इस विशाल तंत्र में बहुजन और वंचित समाज का अपना नजरिया आज भी हाशिये पर है। जब इस समाज का कोई युवा पढ़-लिखकर, जागरूक होकर व्यवस्था को देखता है, तो उसे अहसास होता है कि मुख्यधारा के मीडिया में उनके लोगों की आवाज उठाने वाला कोई नहीं है। पीढ़ियों से जिसे विरासत में प्रताड़ना और डर का माहौल सिखाया गया हो, उसके लिए मीडिया में अपनी भूमिका तलाशना एक साहसिक विद्रोह है। संसाधनों के अभाव के बावजूद, जब कोई पढ़ा-लिखा युवा इस क्षेत्र में उतरने की हिम्मत करता है, तो उसका सामना एक अत्यंत कठिन और कड़वी सामाजिक सच्चाई से होता है।

  1. आज की कड़वी सच्चाई: करोड़ों की संपत्ति या सामाजिक बहिष्कार

आज के दौर में सोशल मीडिया या किसी भी मंच पर राजनीति, सरकार या प्रशासन के खिलाफ लिखने के लिए, आपके पास या तो करोड़ों की संपत्ति होनी चाहिए, ताकि आप कानूनी मुकदमों और व्यवस्था के दमन का खर्च उठा सकें; और यदि वह संपत्ति चली भी जाए, तो आपको उसका कोई अफसोस न हो। लेकिन एक वंचित समाज के युवा के पास इतनी संपत्ति नहीं होती। इसके बावजूद यदि वह इस क्षेत्र में कदम रखता है, तो वह अपनी और दूसरी जाति, वर्ग या धर्म के लिए एक अछूत के समान हो जाता है। सबसे कड़वा सच तो यह है कि आपको जानने वाले लोग भी आपसे एक ‘सुरक्षित दूरी’ बना लेते हैं ताकि वे खुद किसी मुसीबत में न पड़ें।

  1. आधुनिक समाज का पाखंड और आलोचना से डर

आज का समाज एक अजीब और खतरनाक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ सरकार, मीडिया और अधिकारियों के विरुद्ध लिखना दिन-ब-दिन दुश्वार होता जा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि समाज अपनी गलतियाँ सुधारने के बजाय उन्हें छुपाना चाहता है और पूरी तरह पाखंडी हो गया है। लोग व्यवस्था की झूठी तारीफों के जाल में इतने फँस चुके हैं कि उन्हें ज़मीनी कड़वा सच विचलित कर देता है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ (मीडिया) खुद सत्ता और पूँजीपतियों की गोद में जा बैठा है, जिससे सच को उजागर करने वाले स्वतंत्र नवयुवकों का रास्ता और अधिक दुर्गम हो जाता है।

  1. महापुरुषों की विरासत: डॉ. अंबेडकर का ‘मूकनायक’ दृष्टिकोण

इन तमाम मुश्किलों, अकेलेपन और डरावने माहौल के बावजूद, बहुजन नवयुवकों को पीछे हटने की ज़रूरत नहीं है। जब बाबा साहब डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने पत्रकारिता की शुरुआत की थी, तब उनके पास भी संसाधन नहीं थे। लेकिन उन्होंने मूकनायक, बहिष्कृत भारत और जनता जैसे समाचार पत्र निकाल कर साबित किया कि मीडिया केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि बेआवाज़ों को आवाज़ देने का माध्यम है। आज के युवाओं को बाबा साहब से सीख लेकर ज्ञान और वैचारिक दृढ़ता को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाना होगा।

  1. सामाजिक सुधार की राह: महात्मा फुले और पेरियार का तार्किक स्वर

सफलता और बदलाव के लिए युवाओं को महात्मा ज्योतिराव फुले और पेरियार ई.वी. रामासामी के सकारात्मक कार्यों को अपना आदर्श बनाना होगा। महात्मा फुले ने ‘सत्यशोधक समाज’ के ज़रिए सामाजिक पाखंड और कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया था, ठीक उसी तरह आज के पत्रकारों को भी ‘सत्यशोधक’ बनना होगा। वहीं, पेरियार ने समाज को जो तर्कशीलता (Rationalism) सिखाई, उसे अपनाकर आज के युवाओं को सोशल मीडिया पर बिना डरे, पूरी तरह तार्किक और अकाट्य तथ्यों के साथ अपनी बात रखनी होगी ताकि विरोधी उनके तर्कों को काट न सकें।

  1. डिजिटल युग में सफलता की रणनीतियाँ

धन-बल और सामाजिक सुरक्षा के अभाव की भरपाई तकनीक, नेटवर्क और सटीक अध्ययन से की जा सकती है। आज के डिजिटल युग में बड़े प्रिंटिंग प्रेस की ज़रूरत नहीं है; पॉडकास्ट, यूट्यूब और स्वतंत्र ब्लॉग्स के माध्यम से बहुत कम खर्च में अपनी बात लाखों लोगों तक पहुँचाई जा सकती है। अकेले लड़ने के बजाय, अपने जैसे प्रगतिशील विचारों वाले युवाओं का एक मजबूत नेटवर्क बनाएँ, जो एक-दूसरे का आर्थिक, कानूनी और मानसिक संबल बन सकें। आपका गहन अध्ययन और अकाट्य तथ्य ही इस राह पर आपका सबसे मजबूत कवच बनेंगे।

  1. समापन (निष्कर्ष)

यह सच है कि विरासत में मिला डर और संसाधनों की कमी कदम-कदम पर रास्ता रोकती है, और सच लिखने पर समाज आपको अकेला भी छोड़ सकता है। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि यदि आज बहुजन और वंचित समाज का पढ़ा-लिखा युवा चुप रह गया, तो आने वाली पीढ़ियों का इतिहास और उनके हक हमेशा के लिए मिटा दिए जाएंगे। बाबा साहब, फुले और पेरियार की वैचारिक मशाल को थामकर आगे बढ़िए। आपकी कलम सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि आपके समाज की मुक्ति और हक की लड़ाई का साधन है। डर को पीछे छोड़िए, क्योंकि यह समय अपनी भूमिका तलाशने का नहीं, बल्कि अपनी भूमिका खुद तय करने का है।

“जिस दिन से हमने सच को बयां करना सीख लिया,
अपनों ने ही हमसे एक सुरक्षित फासला कर लिया।
पर याद रख ऐ वक्त, ये दौर भी बदल जाएगा,
कि हमने कलम थाम कर, सदियों का डर बदल दिया।”

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)

स्रोत और संदर्भ :
बाबा साहब कृत मूकनायक, फुले का गुलामगिरी, पेरियार के विचार, समकालीन दलित-बहुजन डिजिटल मीडिया रिपोर्ट्स और सामाजिक जमीनी अनुभव।

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