मैं वंचित समाज में जन्मा , अब 21 बसंत देख लिए हैं।यह बात मुझे किसी ने बताई नहीं, समय ने हर दिन समझाई।
बचपन में जब बाकी बच्चे नाम से पुकारे जाते थे, मुझे पहचान से पुकारा जाता था।
मैंने बहुत जल्दी जान लिया था कि इस दुनिया में कुछ लोगों को जीने के लिए सिर्फ साँसें नहीं, सबूत भी देने पड़ते हैं।
हमारे घर में रोटी कम थी, लेकिन ताने पूरे थे। मजबूरी जवान थी लेकिन आशा मर चुकी थी।
माँ की आँखों में चिंता और पिता की चुप्पी—यही मेरी पहली किताबें थीं।
स्कूल जाता तो लगता, जैसे मैं पढ़ने नहीं, अपनी जगह साबित करने जा रहा हूँ।
हर नजर एक सवाल थी—“ये यहाँ क्या कर रहा है?” क्योंकि मैं अपने पूर्वजों की परंपरा को ठोकर मारते हुए पढ़ने के लिए पाठशाला गया था।
धीरे-धीरे मैंने चुप रहना सीख लिया…
क्योंकि हर जवाब देने की कीमत अपमान होती थी।
फिर वह एक परी सी अहसास पैदा करने वाली छाया सी आई…
और पहली बार लगा कि मेरी खामोशी को किसी ने सुना है।
उसकी आवाज़ में एक नरमी थी, जो मेरे भीतर के शोर को शांत कर देती थी।
जब उसने कहा—“तुम अलग हो”—तो मैंने उसे तारीफ नहीं, स्वीकार समझ लिया।
मेरे जैसे इंसान के लिए यह शब्द किसी इबादत से कम नहीं थे।
मैंने उसके साथ अपने भीतर के दरवाजे खोल दिए।
जो दर्द बरसों से छिपा रखा था, उसे उनकी बातों में बहने दिया।
उनकी हँसी में मैंने अपने अधूरे बचपन की खुशी ढूँढ ली।
मैंने उसे सिर्फ चाहा नहीं…
मैंने
उसको जी लिया।
लेकिन प्रेम हमेशा वैसा नहीं होता, जैसा दिल समझता है।
कभी-कभी वह आईना होता है—जो सच दिखाता है, लेकिन बहुत देर से।
उनके शब्द वही थे, मगर उनमें गर्मी कम होने लगी थी।
पहले जहाँ तुम मेरा इंतज़ार करती थीं, अब मैं उनके जवाब का इंतज़ार करता था।
पहले वह मेरे खामोश होने पर पूछती थीं—“क्या हुआ?”
अब मैं पूछता था, और जवाब आता—“कुछ नहीं…”
यहीं से दरार शुरू हुई।
मैंने खुद को समझाया—“शायद वक्त बदल रहा है…”
लेकिन सच यह था, वह बदल रही थीं।
एक दिन उसकी आवाज़ बिल्कुल सीधी थी—न गुस्सा, न प्यार…
बस एक थकान—“अब पहले जैसा कुछ नहीं रहा…”
उस दिन मेरे भीतर कुछ टूटकर गिरा।
आवाज़ नहीं आई… लेकिन असर बहुत गहरा था।
उस रात मैं सोया नहीं…
मैं बिखरा हुआ पड़ा रहा—अपने ही सवालों के बीच।
क्या मेरी कमी थी?
क्या मेरा समाज?
क्या मेरी गरीबी?
एक पल को लगा—सब खत्म कर दूँ।
इतनी चुपचाप कि किसी को पता भी न चले…
क्योंकि जो जीने की वजह थी, वही जब छिन जाए—तो साँस लेना भी बोझ लगता है।
लेकिन उसी अंधेरे में…
एक आवाज़ आई—मेरी अपनी।
“क्या सच में तू इतना कमजोर है?”
मैंने आँसू पोंछे नहीं…
उन्हें बहने दिया—क्योंकि वह मेरे भीतर का जहर निकाल रहे थे।
फिर धीरे-धीरे…
दर्द ने मुझे तोड़ा नहीं, गढ़ना शुरू किया।
मैंने देखा—गलती उसकी कम, मेरी ज्यादा थी।
मैंने उसको वैसा बना लिया, जैसा मैं चाहता था।
मैंने अपने खालीपन को उसके वादों से भर दिया।
और जब वह भराव हट गया—तो सच्चाई सामने थी।
मैंने उसी दिन तय किया—
अब मैं खुद को किसी और की नजर से नहीं देखूँगा।
मैं वंचित हूँ—लेकिन अयोग्य नहीं।
मैं टूटा हूँ—लेकिन खत्म नहीं।
मैंने खुद को फिर से उठाया—धीरे-धीरे…
जैसे कोई घायल परिंदा अपने पंखों को फिर से पहचानता है।
मैंने अपने दर्द को छुपाया नहीं, उसे समझा।
और समझते-समझते… मैं मजबूत होता गया।
अब मेरे भीतर शोर नहीं है—
एक गहरी शांति है।
मैं डॉ. भीमराव अंबेडकर का शागिर्द हूँ।
उन्होंने मुझे सिखाया—झुकना नहीं, लड़ना है।
मोहब्बत में हार सकता हूँ, लेकिन जीवन में नहीं।
मैं गौतम बुद्ध के मार्ग पर चलता हूँ।
अब मैं नफरत को नहीं पालता—
क्योंकि मैंने देखा है, नफरत सबसे पहले उसी को जलाती है जो उसे पकड़े रहता है।
मेरे साथ व्यवस्थागत अन्याय हुआ…
लेकिन मैंने न्याय की राह नहीं छोड़ी।
मैं आज भी उन्हें करुणा से देखता हूँ—
क्योंकि वे अपने अज्ञान के कैदी हैं।
अब मुझे दुनियादारी समझ आ गई है।
मैं अब किसी के शब्दों में नहीं बहता।
मुझे कोई ठग नहीं सकता—क्योंकि मैंने खुद को पहचान लिया है।
अब मैं जमाने को अपने अतीत से नहीं, अपने संकल्प से देखता हूँ।
मेरी चाल धीमी हो सकती है… लेकिन रुकती नहीं।
और आज…
जब मैं खुद को देखता हूँ—
तो दर्द नहीं, एक संतुलन दिखाई देता है।
मैं पूरा नहीं हूँ…
लेकिन अधूरा भी नहीं।
मैं वही वंचित समाज का नौजवान हूँ—
जिसने रोकर नहीं, समझकर जीना सीखा है।
और अपने भाइयों से बस इतना कहूँगा—
हर प्यार तुम्हारे लिए नहीं होता।
हर मुस्कान सच नहीं होती।
अगर खुद को बचाना है…
तो पहले खुद को पहचानो।
क्योंकि जब तुम खुद को पा लेते हो—
तो कोई तुम्हें खो नहीं सकता। जमाना चाहे कितना ही जालिम हो।
संकलनकर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
