भूमिका
विरोधी से दुश्मन बनने की राजनीति : लोकतंत्र के लिए बढ़ता खतरा?
भारतीय लोकतंत्र की यात्रा 1950 से 2014 तक अनेक उतार-चढ़ावों से गुजरी है।संवाद (बातचीत) लोकतांत्रिक राजनीति की पहली शर्त माना जाता रहा।पंडित जवाहरलाल नेहरू के दौर से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह तक राजनीतिक दलों में तीखे वैचारिक मतभेद रहे, लेकिन हर मतभेद को व्यक्तिगत शत्रुता में बदल देना सामान्य राजनीतिक संस्कार नहीं था।असहमति (मतभेद) को व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता था।
विपक्ष सरकार की आलोचना करता था और सरकार विपक्ष के सवालों का जवाब देती थी।डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) का अर्थ ही सत्ता से सवाल पूछने और अलग विचार रखने का अधिकार है।
हालांकि 1975 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का गंभीर अपवाद था, जिसके बाद 1977 में जनता ने सत्ता परिवर्तन करके अपनी ताकत दिखाई।1989 के बाद गठबंधन राजनीति ने अनेक विचारों और दलों को साथ चलने की मजबूरी पैदा की।
2004 से 2014 तक संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने भी अनेक दलों के सहयोग से शासन चलाया।
लेकिन 2014 के बाद राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अधिक तीखी और ध्रुवीकृत दिखाई देने लगी।तहज़ीब (शालीन व्यवहार) का स्थान कई बार कटु राजनीतिक भाषा लेने लगी।सवाल यह है कि क्या विरोधी को दुश्मन समझने की यह प्रवृत्ति लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर कर रही है?
- पुराने दौर में मतभेद थे, मगर राजनीतिक सह-अस्तित्व भी था
1950 से 1967 तक केंद्र में कांग्रेस का व्यापक प्रभुत्व रहा, लेकिन संसद में विपक्ष की भूमिका समाप्त नहीं हुई।विमर्श (विचारों पर चर्चा) राजनीतिक प्रक्रिया का आवश्यक अंग बना रहा।1967 के बाद राज्यों में गैर-कांग्रेसी गठबंधनों का विस्तार हुआ और अलग-अलग विचारधाराओं के दलों ने सत्ता में हिस्सेदारी की।कोएलिशन (गठबंधन) राजनीति ने यह दिखाया कि अलग विचार रखने वाले दल भी साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर साथ चल सकते हैं।1977 में आपातकाल के बाद कांग्रेस की हार और जनता पार्टी की सरकार बनना भारतीय लोकतंत्र की निर्णायक घटना थी।डिसेंट (असहमति) को दबाने के परिणाम का जनता ने चुनाव के माध्यम से उत्तर दिया।
1989 में वी.पी. सिंह सरकार को भाजपा और वाम दलों के बाहरी समर्थन से चलना पड़ा, जिससे राजनीतिक सहयोग की नई परिस्थिति बनी।1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने अपना कार्यकाल पूरा किया।
यह उदाहरण बताता है कि वैचारिक दूरी के बावजूद राजनीतिक ट्रस्ट (विश्वास) और समझौता संभव था।
गुंजाइश (संभावना) हमेशा बनी रहती है कि प्रतिद्वंद्वी दल जनता के हित में साथ बैठें।इस परंपरा को लोकतंत्र की ताकत के रूप में देखना चाहिए।
- 1975 का आपातकाल बताता है कि असहमति दबाने का परिणाम कितना गंभीर हो सकता है
भारतीय राजनीति का इतिहास केवल आदर्श संवाद की कहानी नहीं है; इसमें सत्ता के केंद्रीकरण का सबसे बड़ा उदाहरण 1975 का आपातकाल भी है।मर्यादा (शालीन सीमा) टूटने पर लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कितना दबाव पड़ सकता है, इसका गंभीर प्रमाण वही दौर है।25 जून 1975 को आपातकाल घोषित हुआ और विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां तथा प्रेस पर सेंसरशिप जैसी कार्रवाइयां हुईं।
सेंसरशिप (प्रकाशन पर सरकारी नियंत्रण) ने समाचार माध्यमों की स्वतंत्रता को सीमित किया।
जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी सहित अनेक विपक्षी नेता गिरफ्तार किए गए।अकाउंटेबिलिटी (जवाबदेही) कमजोर होने पर सत्ता का केंद्रीकरण लोकतांत्रिक संतुलन को प्रभावित करता है।
लेकिन 1977 के चुनाव में जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया और मोरारजी देसाई देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।
यह भारतीय मतदाता की राजनीतिक चेतना का बड़ा प्रमाण था।
तवज्जो (महत्त्व) सत्ता से अधिक लोकतांत्रिक अधिकारों को मिलनी चाहिए।आपातकाल ने यह सबक दिया कि आलोचना को कुचलने की कीमत कुल मिलाकर सत्ता को भी चुकानी पड़ती है।
इसीलिए आज भी विरोधी आवाज को दुश्मन समझना लोकतांत्रिक दृष्टि से खतरनाक है।
- 1989 से 2014 तक गठबंधन राजनीति ने अलग विचारों को साथ रहने की कला सिखाई
1989 के बाद भारतीय राजनीति में एक नया दौर आया, जिसमें किसी एक दल का स्थायी प्रभुत्व कमजोर हुआ और क्षेत्रीय दलों की भूमिका बढ़ी।
सहिष्णुता (सहन करने की क्षमता) राजनीतिक व्यवस्था की मजबूरी भी बनी और आवश्यकता भी।
वी.पी. सिंह सरकार भाजपा तथा वाम दलों के अलग-अलग समर्थन के सहारे चली।कोऑपरेशन (सहयोग) के बिना ऐसी सरकारों का चलना संभव नहीं था।
1996 के बाद संयुक्त मोर्चा सरकारों में एच.डी. देवगौड़ा और आई.के. गुजराल जैसे नेता प्रधानमंत्री बने।
1998 और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में गठबंधन राजनीति ने केंद्र में स्थायित्व की दिशा पकड़ी।
2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सत्ता में आया और 2014 तक दो कार्यकाल पूरे किए।
प्लूरलिज्म (बहुलतावाद) ने राजनीति को यह सिखाया कि अलग विचारों को साथ लेकर चलना कमजोरी नहीं है।आज सोशल मीडिया का ट्रोलिंग (ऑनलाइन आक्रामक हमला) वाला वातावरण राजनीतिक मतभेदों को व्यक्तिगत संघर्ष में बदल देता है।
इसके विपरीत उस दौर की गठबंधन राजनीति बताती है कि सत्ता चलाने के लिए बातचीत और समझौता आवश्यक है।विरोधी का अस्तित्व स्वीकार करना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी परिपक्वता है।
- 2014 के बाद सवाल यह नहीं कि कौन सत्ता में है, सवाल यह है कि विरोध कितना स्वीकार्य है
2014 में भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा में 282 सीटें जीतकर 1984 के बाद पहली बार किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत दिलाया।
सहअस्तित्व (मिल-जुलकर रहने की स्थिति) की लोकतांत्रिक भावना ऐसे समय और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
बहुमत सरकार को निर्णय लेने की क्षमता देता है, लेकिन आलोचना से मुक्त होने का अधिकार नहीं देता।मेजॉरिटी (बहुमत) शासन का आधार हो सकता है, लोकतांत्रिक असहमति को समाप्त करने का लाइसेंस नहीं।आज राजनीतिक बहस में कई बार नीति की आलोचना करने वाले व्यक्ति की नीयत पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया जाता है।
पोलराइज़ेशन (ध्रुवीकरण) जब बढ़ता है तो समाज में बीच की जगह सिकुड़ने लगती है।
राजनीति में यह भावना खतरनाक है कि जो हमारे साथ नहीं है, वह हमारा विरोधी ही नहीं बल्कि शत्रु है।
सोशल मीडिया की ब्रांडिंग (छवि निर्माण) और प्रचार तंत्र किसी नेता या दल की लोकप्रियता बढ़ा सकते हैं, लेकिन आलोचना का उत्तर नहीं बन सकते।
जनता को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और प्रशासन जैसे सवालों पर जवाब चाहिए। रवैय्या (व्यवहार का ढंग) यदि आलोचना के प्रति कठोर होगा तो लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास कमजोर हो सकता है।
राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को समाप्त करने की इच्छा लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी भूल होगी।
सरकार मजबूत हो, लेकिन आलोचना के प्रति सहनशील भी हो—यही लोकतांत्रिक परिपक्वता की पहचान है।
समापन
भारत की राजनीतिक यात्रा यह प्रमाणित करती है कि सत्ता बदल सकती है, विचारधाराएं बदल सकती हैं और राजनीतिक समीकरण भी बदल सकते हैं।
प्रतिशोध (बदला) लोकतांत्रिक राजनीति का स्थायी आधार नहीं बन सकता।
1975 का आपातकाल, 1977 का सत्ता परिवर्तन, 1989 की गठबंधन राजनीति और 1999 से 2014 तक गठबंधन सरकारों का दौर हमें अलग-अलग सबक देता है।
डायलॉग (बातचीत) बंद होने पर राजनीति संघर्ष बन जाती है।
लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि सरकार को बहुमत मिले, लेकिन विपक्ष को आवाज भी मिले।
इंस्टीट्यूशन (संस्था) तभी मजबूत होती है जब उसके भीतर असहमति के लिए स्थान सुरक्षित रहे।
2014 के बाद सत्ता की मजबूती के साथ राजनीतिक भाषा में बढ़ती कटुता पर चर्चा इसलिए जरूरी है कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है।वह आलोचना सुनने, विरोध सहने और अलग विचार रखने वाले नागरिक के अधिकार को स्वीकार करने का नाम भी है।
फीडबैक (प्रतिक्रिया) को दुश्मनी समझने वाली राजनीति आखिरकार स्वयं को कमजोर करती है।
विरोधी आज प्रतिद्वंद्वी है, कल सहयोगी भी हो सकता है और भविष्य में सत्ता का हिस्सा भी।
नफ़रत (घृणा) की जगह राजनीतिक मुहब्बत (प्रेम) जरूरी नहीं, लेकिन परस्पर सम्मान अवश्य जरूरी है।क्योंकि लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती हैं, मगर लोकतांत्रिक संस्कार पीढ़ियों तक
चलते हैं।
शेर
“दुश्मनी लाख सही, खत्म न कर रिश्ता-ए-गुफ़्तगू,
बात होती रहे तो रास्ता निकल आता है।”

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक. 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाडोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)
स्रोत-संदर्भ:
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19, संसदीय लोकतंत्र की परंपरा, समकालीन राजनीतिक विमर्श और असहमति पर सार्वजनिक बहस।
अस्वीकरण: यह लेख वर्तमान भारतीय राजनीतिक माहौल, लोकतांत्रिक मूल्यों और सार्वजनिक विमर्श पर आधारित है।
