
14 अप्रैल 2026 को बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती पर पूरा बहुजन समाज जाग उठा था। नीले झंडों की लहरें, विशाल जुलूस, रैलियां, शोभायात्राएं, सेमिनार, सांस्कृतिक कार्यक्रम और बंधुत्व के संकल्प से देश के कोने-कोने गूंज उठे थे। दिल्ली की सड़कों से लेकर दूरदराज के गांवों तक, लाखों-करोड़ों की भीड़ बाबा साहब के विचारों को सजीव करने के लिए सड़कों पर उतर आई। वंचित समाज की यह आवाज़ थी — समानता, न्याय और स्वाभिमान की आवाज़। लेकिन जब मुख्यधारा के मीडिया की ओर मुड़कर देखा, तो दिल टूट गया। पूरे भारत में 85% बहुजन आबादी के इन भव्य आयोजनों को 15 अप्रैल 2026 के अखबारों और टीवी चैनलों में 5% से भी कम जगह मिली। पूरे न्यूज़पेपर में यदि जगह के स्थान पर कल्पना करें तो 3% जगह भी इस माह उत्सव को कवर नहीं किया गया। एक प्रतीकात्मक फोटो, छोटी सी खबर, या फिर बिल्कुल चुप्पी। यह उपेक्षा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित अपमान था।बहुजन समाज इस मीडिया को देखकर खुद को बेगाना महसूस करता है। जैसे कोई अपना घर हो, लेकिन उसमें अपना नाम तक न लिखा हो। जैसे लाखों लोग सड़कों पर अपना उत्सव मना रहे हों, लेकिन मीडिया की आंखें बंद कर ली गई हों। यह दर्द गहरा है, यह घाव पुराना है,
लेकिन 2026 में भी यह ताज़ा हो गया। बाबा साहब ने कहा था — “शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो।” लेकिन जब संघर्ष की यह तस्वीर खुद मीडिया में जगह नहीं पाती, तो बहुजन समाज को लगता है कि उसकी आवाज़ को जानबूझकर दबाया जा रहा है। वह खुद को ठगा हुआ, उपेक्षित और अकेला महसूस करता है।क्यों हुई यह उपेक्षा? कारण गहरे और कड़वे हैंसबसे बड़ा कारण है — मनुवादी विचारधारा का बोलबाला।
मुख्यधारा का मीडिया आज भी पूंजीपतियों और सवर्ण वर्चस्व वाले घरानों के नियंत्रण में है। Oxfam India और Newslaundry की रिपोर्ट्स बार-बार बताती हैं कि मीडिया के 90% से ज्यादा शीर्ष पद — एडिटर-इन-चीफ, ब्यूरो चीफ, एंकर — उच्च जातियों के लोगों के कब्जे में हैं। दलित, आदिवासी या पिछड़े समुदाय का कोई नेता इन पदों पर नहीं बैठता। जब कहानी सुनाने वाले खुद सवर्ण केंद्रित होते हैं, तो बहुजन की कहानी उन्हें “भीड़” लगती है, “समस्या” लगती है, लेकिन “आंदोलन” कभी नहीं।रैलियां निकल रही हैं, नीले झंडे लहरा रहे हैं, लोग बाबा साहब के मंत्र दोहरा रहे हैं — “सबको समान अधिकार” — लेकिन मीडिया इसे कवर नहीं करता। क्यों? क्योंकि यह रैली स्थापित जाति व्यवस्था के लिए खतरा है। बाबा साहब के विचार समानता की चिंगारी हैं, जो मनुवाद की पुरानी इमारत को हिला देते हैं। मीडिया का चरित्र एकतरफा है — वह वही दिखाता है जो उसकी विचारधारा से मेल खाता हो। बहुजन रैलियों को “कानून-व्यवस्था की समस्या” या “राजनीतिक स्टंट” बताकर पेश कर दिया जाता है, जबकि सवर्ण आयोजनों को “सांस्कृतिक उत्सव” का दर्जा मिल जाता है।
दूसरा बड़ा कारण पूंजी और विज्ञापन का दबाव है। मीडिया घराने आज कॉरपोरेट जगत पर निर्भर हैं। उनकी आय विज्ञापनों से आती है, जो बड़े-बड़े पूंजीपतियों से आते हैं। बहुजन समाज के पास न तो इतनी पूंजी है, न इतना प्रभाव। इसलिए मीडिया उन मुद्दों को प्राथमिकता देता है जो टीआरपी लाएं, जो विज्ञापनदाताओं को खुश रखें। सामाजिक न्याय की रैलियां टीआरपी नहीं लातीं, इसलिए उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह चरित्र है पूंजीवादी मीडिया का — जहां समाचार नहीं, बल्कि व्यापार चलता है।तीसरा कारण है — सरकार और मीडिया का गठजोड़।
वर्तमान दक्षिणपंथी सरकार की सहानुभूति बहुजन समाज के प्रति अक्सर दिखावटी लगती है। बाबा साहब को श्रद्धांजलि दी जाती है, लेकिन उनके असली अनुयायियों की शक्ति को दबाया जाता है। मीडिया इस सरकार के नियंत्रण या प्रभाव में रहकर ऐसे आयोजनों को कम महत्व देता है, ताकि बहुजन समाज की एकजुटता का संदेश आम जनता तक न पहुंचे। यह विभाजनकारी राजनीति का हिस्सा है — बहुजन को वोट बैंक मानो, लेकिन उनकी स्वाभिमानी आवाज़ को दबाओ।यह मंशा साफ है — जन-चेतना को रोकना।
बाबा साहब के विचार अगर पूरे समाज तक फैल गए, तो यथास्थिति टूट जाएगी। समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का संदेश अगर हर घर पहुंच गया, तो मनुवाद की जड़ें हिल जाएंगी। इसलिए मीडिया जानबूझकर बहुजन रैलियों को “छोटी घटना” बना देता है। लाखों लोग सड़क पर हों, फिर भी खबर 5% जगह न मिले — यह चरित्र है “सवर्ण-केंद्रित” मीडिया का। यह चरित्र कहता है — “जो कहानी हम सुनाते हैं, वही मायने रखती है।” बहुजन की कहानी हम नहीं सुनाएंगे, क्योंकि वह हमारी व्यवस्था को चुनौती देती है।
बहुजन समाज का दर्द और बेगानापन
कल्पना कीजिए — 85% आबादी का समाज, जो देश की रीढ़ है, मजदूर है, किसान है, कर्मचारी है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी जयंती को मीडिया अनदेखा कर दे। दिल में कैसा दर्द होता होगा? बच्चे नीले झंडे लेकर स्कूल जाते हैं, युवा रैलियों में भाग लेते हैं, बुजुर्ग बाबा साहब की प्रतिमाओं पर फूल चढ़ाते हैं — लेकिन टीवी पर यह खबर नहीं दिखती। अखबार में दो लाइन भी नहीं। बहुजन समाज खुद से पूछता है — क्या हम इस देश के नागरिक नहीं? क्या हमारी खुशी, हमारा उत्सव, हमारा संघर्ष कोई मायने नहीं रखता?यह उपेक्षा मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत गहरी चोट पहुंचाती है। बहुजन समाज महसूस करता है कि मुख्यधारा का मीडिया उसे “दूसरा दर्जे” का नागरिक मानता है। उसकी संस्कृति, उसके महापुरुष, उसके आंदोलन मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन सकते। इसलिए वह खुद को बेगाना महसूस करता है — जैसे इस मीडिया में उसका कोई स्थान नहीं, कोई स्वामित्व नहीं। यह ठगा हुआ महसूस करना स्वाभाविक है।
जब आपका त्योहार, आपका नायक, आपकी शक्ति को जानबूझकर छिपाया जाए, तो गुस्सा और दर्द दोनों पैदा होते हैं।लेकिन यह दर्द हताशा नहीं, बल्कि नई चेतना का स्रोत भी बन रहा है। बहुजन समाज अब समझ चुका है कि मुख्यधारा का मीडिया कभी उसका दोस्त नहीं था। बाबा साहब ने खुद “मूकनायक” जैसे अखबार निकाले थे, क्योंकि सवर्ण मीडिया उनकी आवाज़ दबाता था। आज भी वही इतिहास दोहराया जा रहा है।
समाधान की राह
बहुजन मीडिया का उदयइस उपेक्षा का एकमात्र जवाब है — अपनी आवाज़ खुद बनाना। बहुजन समाज को मजबूत बहुजन मीडिया की जरूरत है — डिजिटल प्लेटफॉर्म, यूट्यूब चैनल, सोशल मीडिया कैंपेन, स्वतंत्र अखबार। सोशल मीडिया ने पहले ही इस उपेक्षा को तोड़ना शुरू कर दिया है। 2026 की जयंती पर फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब पर रैलियों की बाढ़ आ गई। दलित कैमरा, मूकनायक जैसे प्लेटफॉर्म बिना फिल्टर के सच्ची तस्वीर दिखा रहे हैं।बहुजन समाज को अब गेटकीपरों (मीडिया संपादकों) पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। अपनी रैलियां, अपने सेमिनार, अपने विचार खुद रिकॉर्ड करो, खुद शेयर करो, खुद पहुंचाओ। सोशल मीडिया ने तत्काल लामबंदी का हथियार दिया है। जब मुख्यधारा अनदेखा करती है, तब डिजिटल दुनिया बहुजन की ताकत को दुनिया के सामने लाती है।यह समय है जागने का। बाबा साहब के सपने को पूरा करने के लिए बहुजन समाज को न सिर्फ राजनीतिक रूप से, बल्कि मीडिया रूप से भी सशक्त होना होगा।
जब तक अपनी मीडिया नहीं होगी, तब तक उपेक्षा जारी रहेगी। लेकिन जब बहुजन अपनी कहानी खुद लिखेगा, तब मनुवाद की दीवारें गिरेंगी।
14 अप्रैल 2026 की जयंती ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बहुजन समाज जागरूक है, संगठित है और संघर्षशील है। मुख्यधारा का मीडिया चाहे जितना दबाए, लेकिन नीले झंडे की लहरें रुकने वाली नहीं हैं। बहुजन समाज अब बेगाना नहीं रहेगा — वह अपना घर खुद बनाएगा, अपनी आवाज़ खुद गूंजाएगा।
बहुजन समाज की पीड़ा को दर्शाता शेर:
“नीले झंडे लहराते लाखों, पर मीडिया की आँखें बंद,
बाबा की जयंती पर भी बहुजन का दर्द अनसुना, सरकार-मीडिया का गुलामपन।”
संकलन कर्ता
हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966
स्रोत और संदर्भ:
14 अप्रैल 2026 को देशभर में बहुजन समाज द्वारा आयोजित विशाल रैलियों, जुलूसों और कार्यक्रमों का प्रत्यक्ष अवलोकन, सोशल मीडिया रिपोर्ट्स तथा मुख्यधारा के अखबारों-चैनलों में न्यूनतम कवरेज। मीडिया नेतृत्व में सवर्ण वर्चस्व की स्थिति विभिन्न अध्ययनों एवं वास्तविक समाचार रिपोर्टिंग पर आधारित।
