मेरा कुछ वर्षों पूर्व लिखा आलेख पुनः अवलोकनार्थ 👇🏻🙏🏻
साधु-सन्तों, बाबाओं के लिए ओरियनटेशन प्रोग्राम आयोजित हो
अपने समाज के सभी पंथों के साधु-सन्त, महंत,बावजी, बापजी, बाबा, पीठाधीश,पीठाधीश्वरों के लिए एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया जाये। यह ओरियंटेशन प्रोग्राम हो।
विषय का शीर्षक रखा जाये :-
“वर्तमान समय में अपने समाज के विकास में साधु-संत, महंत, बाबाओं की भूमिका : अंबेडकर विचारधारा के परिप्रेक्ष्य में।”
जो भी संत महंत बाबा मनुवादी विचारधारा से पोषित हैं उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पल्लवित अंबेडकर विचारधारा की जानकारी दी जाये। इनकी और इनके अनुयायियों (भक्तों) की शक्ति का उपयोग समाज के विकास और संघर्ष में उपयोगी हो सके। शुद्ध देशी घी के मिष्ठान्न युक्त भंडारे, रात्रि जागरण, प्रवचन, भेंट, आश्रमों को सुसज्जित भौतिक सुख-सुविधाओं आदि में लगने वाली शारीरिक, मानसिक, आर्थिक शक्ति का उपयोग समाज हित में हो सके। इनमें से कुछ साधु-सन्तों आदि की तामसी प्रवृति का उपयोग समाज के विकास में संघर्ष करने में लिया जा सके। आजकल बाबा लोगों के प्रति आमजन में पैदा हो रहे डर से भी निजात मिल सकेगी।
अपने साधु-संतों अन्य धार्मिक गुरुओं को तथागत बुद्ध, डॉ आंबेडकर साहब के जीवन दर्शन की जानकारी के साथ भारत के संविधान की अपने लोगों के मानव जीवन में सार्थकता की तथ्यात्मक जानकारी प्रदान की जाये। जब हम हमारे साधु-संतों को सही जानकारी तथ्यों के साथ उपलब्ध करायेंगे तो फिर दूसरे लोग उनको दिग्भ्रमित नहीं कर सकेंगे।
यह बात सही है कि अपने वर्ग के पास रुपये-पैसों की कमी है, हम भौतिक आवश्यकताओं, सुख सुविधाओं की पूर्ति नहीं कर सकते, सवर्ण समाज के लोग “आर्थिक दान” देकर प्रभावित करने में सफल हो जाते हैं। बिना स्वार्थ के “दान” में दान को कसौटी पर परखना भी चाहिए।
ध्यान रखिए सवर्ण समाज के साधु-संतों को भी उनके लोग राजनीति, धर्म, सामाजिक व्यवस्था आदि की नवीनतम जानकारी उपलब्ध कराते हैं फिर वो साधु-संत अपने प्रवचनों के माध्यम से ” उस ज्ञान” का प्रचार-प्रसार करते हैं। उनका कोई भी साधु-संत, बाबा, महात्मा, कथावाचक उनकी लाइन से अलग नहीं जाता।
कहीं-कहीं पर एक सकारात्मक परिणाम जरूर राजस्थान में दिखाई दे रहा है कि राजस्थान में आयोजित प्रतियोगी परीक्षाओं में कई जगह पर शिक्षा के महत्व को समझने वाले, जागरूक अपने कुछ साधु-संतों ने परीक्षार्थियों के लिए ठहरने, भोजन, यातायात साधन की अच्छी व्यवस्था करने लगे हैं। आने वाले समय में और भी साधु-संत ऐसे कार्यों में अपनी भागीदारी निभाएंगे। अब समय की यह मांग है।
यद्यपि यह भी सही है कि अपने समाज के कुछ ही साधु-संत, बाबा, महात्मा, पीठाधीश, पीठाधीश्वर, बापजी हैं जो नियमित अच्छी पुस्तकों को पढ़ते हैं और अपना स्वयं का लेखन कर समाज का मार्गदर्शन करते हैं। बाकी पढ़ने लिखने की प्रवृत्ति से दूर ही रहते हैं। वो जब पढ़ने लिखने की प्रवृत्ति से दूर हैं तो फिर उनके भक्त भी ऐसा ही अनुसरण करते हैं। समाज के साधु-संतों को स्वयं का लेखन करना अनिवार्य है।
हमारे साधु-संतों को यदि समाज हित में अपनी भूमिका निभानी है तो तथागत बुद्ध और डॉ आंबेडकर साहब के जीवन दर्शन, अपने महापुरुषों को स्वयं पढ़ना ही होगा। तब पता चलता है कि सच की कसौटी क्या है। आज अपने साधु-संत आदि धर्म गुरु जिस तरह श्वेत, भगवा, केसरिया वस्त्र पहनकर प्रवास करते हैं, और प्राथमिक तौर पर वस्त्रों के रंग से समाज में सम्मान प्राप्त करते हैं इसका श्रेय केवल डॉ आंबेडकर साहब द्वारा लिखित भारत के संविधान की बदौलत है।
अतः समाज हित में अपने समाज के साधु-सन्तों के लिए ओरियनटेशन प्रोग्राम/ कार्यशाला आयोजित की जानी चाहिए
साधु-संतों, पीठाधीश, पीठाधीश्वर, बापजी बाबा महात्माओं के पास सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत प्राप्त शक्ति का उपयोग सही दिशा में किया जा सके। जिस तरह वर्तमान में ‘सामाजिक समानता’ और ‘सामाजिक समरसता’ शब्दों के बीच अर्थ की सही जानकारी नहीं होने से परेशानी देखी जा रही है ऐसी समस्या ऐसी संगोष्ठियों से स्वत: ही दूर हो जाती है।
अपने समाज में सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्र में शताब्दियों से साधु-संतों, बाबा लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है इसे नकारा नहीं जा सकता।
समाज के “चहुंमुखी विकास” में सभी वर्गों (लिंग, शिक्षा, पद, कर्म, सेवा) के समाज बंधुओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
-0-
! जय हो बाबा लोगों की !
जय भारत 🇮🇳
डाॅ गुलाब चन्द जिन्दल ‘मेघ’
केरियर काउंसलर
उप निदेशक (से.नि.) पशुपालन विभाग, राजस्थान
अजमेर
9460180510
इस लेख से प्रेरणा लेते हुए बहुजन संतो निम्नलिखित लेख लिखने का प्रयास किया है।
“अंबेडकरवादी दृष्टि से बहुजन संत परंपरा का पुनरुत्थान : समय की मांग और सामाजिक आवश्यकता”
- धार्मिक चेतना से सामाजिक जागरूकता की ओर ।
अब ज़रूरत इस बात की है कि हमारे साधु-संत, बापजी, महंत और बाबा केवल मंत्रोच्चारण तक सीमित न रहें, बल्कि समाज की रूह (आत्मा) में परिवर्तन लाने का बीड़ा उठाएँ। धर्म का असली मतलब केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि इंसानियत (मानवता) की सेवा है। आज बहुजन समाज को ऐसे संतों की दरकार है जो भक्ति और बुद्धि को साथ लेकर चलें। जब धार्मिक चेतना का संगम सामाजिक जागरूकता से होगा, तभी असली उद्धार (मोक्ष) की राह खुलेगी। गाँव-गाँव, मोहल्लों में ऐसे संत जाएँ जो बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करें, नशे से दूर रखें और समानता (इक्वलिटी) का संदेश दें। यह भी याद रखना होगा कि जब तक धर्म समाज के दुख-दर्द से जुड़ा नहीं होगा, तब तक वह रूहानी नूर (आध्यात्मिक प्रकाश) नहीं बन सकता। अब वक्त है कि हमारे संत जन-कल्याण के दूत बनें, न कि केवल कथा और भंडारे के आयोजक।
- अंधभक्ति से हटकर तर्कशीलता (रैशनलिटी) की दिशा
बहुजन समाज के साधु-संतों को अब अंधभक्ति की जगह रैशनलिटी (तर्कशीलता) अपनाने की दरकार है। बिना समझे मान लेना रूह (आत्मा) की बेड़ियाँ हैं, जबकि विज्ञान (साइंस) और विवेक (रिज़न) ही सच्ची मुक्ति का रास्ता है। तथागत बुद्ध और डॉ. अंबेडकर साहब ने जो साइंटिफिक (वैज्ञानिक) दृष्टिकोण दिया, वह केवल किताबों में नहीं रहना चाहिए बल्कि आश्रमों और मठों की सोच में उतरना चाहिए। जो संत क्वेश्चन (प्रश्न) पूछने की हिम्मत रखता है, वही समाज को जाग्रत कर सकता है। आज जरूरत है कि हमारे बाबा और महंत अपने प्रवचनों में यह बताएं कि फ़ेथ (विश्वास) और साइंस (विज्ञान) एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। इंसानियत (मानवता) का धर्म तभी जीवित रहेगा जब लोग सोचेंगे, समझेंगे और बदलाव लाएँगे। संतों को चाहिए कि वे अपने अनुयायियों में क्यूरियोसिटी (जिज्ञासा) जगाएँ ताकि समाज अंधे अनुकरण नहीं, बल्कि समझदारी से आगे बढ़े।
- भोग-विलास से त्याग और सेवा की ओर
आज समय की पुकार है कि हमारे साधु-संत, बाबा और बापजी लक्ज़री (ऐश्वर्य) और शो-ऑफ (दिखावे) के मोह से बाहर निकलें। धर्म का अर्थ केवल भोग-विलास नहीं बल्कि सेवा (सर्विस) और त्याग (सैक्रिफ़ाइस) है। जिस धन का उपयोग भव्य भंडारों, मिष्ठान्न वितरण या सजावट में होता है, वही धन अगर एजुकेशन (शिक्षा), हेल्थ (स्वास्थ्य) और गरीब बच्चों की मदद में लगे तो समाज का चेहरा बदल सकता है। रूहानी (आध्यात्मिक) शक्ति तभी सार्थक होगी जब वह भूखे को अन्न, नंगे को वस्त्र और अशिक्षित को ज्ञान दे। असली संत वही है जो कंफर्ट (सुविधा) नहीं, कमिटमेंट (प्रतिबद्धता) में विश्वास रखता है। संतों को यह समझना होगा कि धर्म का माप आश्रम की ऊँचाई से नहीं, बल्कि उनकी ह्यूमैनिटी (मानवता) की गहराई से होता है। त्याग की यह राह ही उन्हें समाज का सच्चा मार्गदर्शक बना सकती है।
- समाज के भीतर भाईचारे (फ्रेटरनिटी) का निर्माण
बहुजन समाज की सबसे बड़ी ताकत उसका यूनिटी (एकता) है, और यही उसकी सबसे बड़ी परीक्षा भी। हमारे साधु-संत, बाबा, बापजी और महंत अब केवल पूजा-पाठ में नहीं, बल्कि फ्रेटरनिटी (भाईचारे) के संदेश में भी अग्रणी भूमिका निभाएँ। जाति, उपजाति और मतभेदों की दीवारें समाज को कमज़ोर करती हैं, जबकि इंसानियत (मानवता) हमें एक करती है। संतों को चाहिए कि वे अपने प्रवचनों में यह स्पष्ट करें कि किसी का ऊँचा या नीचा होना जन्म से नहीं, बल्कि कर्म (डीड्स) से तय होता है। जब हमारे मठों, आश्रमों और धार्मिक आयोजनों में सबको समान सम्मान मिलेगा, तभी असली सोशल हार्मनी (सामाजिक भाईचारा) स्थापित होगी। आज ज़रूरत है उस रूहानी (आध्यात्मिक) एकता की जो भेदभाव मिटाकर दिलों को जोड़ती है। यही वह शक्ति है जो बहुजन समाज को भीतर से मज़बूत कर सकती है और पूरे राष्ट्र को समानता की नई रोशनी दे सकती है।
- राजनीतिक जागरूकता की ज़रूरत (पॉलिटिकल अवेयरनेस)
बहुजन समाज के साधु-संत, बाबा और महंत अगर समाज की दिशा बदलना चाहते हैं तो उन्हें पॉलिटिकल अवेयरनेस (राजनीतिक जागरूकता) विकसित करनी होगी। राजनीति से दूरी बनाकर रहना अब किसी भी वर्ग के लिए लाभकारी नहीं है, क्योंकि सत्ता ही वह ज़रिया है जो समाज की दशा और दिशा तय करती है। हमारे संतों को यह समझना होगा कि वोट (मत) केवल एक अधिकार नहीं बल्कि ड्यूटी (कर्तव्य) भी है। वे अपने अनुयायियों को यह सिखाएँ कि कास्ट (जाति) के नाम पर नहीं, बल्कि कॉन्स्टिट्यूशन (संविधान) की मर्यादा के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। संतों को चाहिए कि वे अपने प्रवचनों में यह बात बार-बार कहें कि जब बहुजन समाज राजनीतिक रूप से जाग्रत होगा, तभी उसकी रूहानी (आध्यात्मिक) और सामाजिक ताकत दोनों बढ़ेंगी। डॉ. अंबेडकर का यही संदेश था— “राजनीतिक शक्ति ही सामाजिक समानता का द्वार खोल सकती है।”
- शिक्षा को धर्म का हिस्सा बनाना (एजुकेशन ऐज़ अ पार्ट ऑफ़ रिलीज़न)
अब समय आ गया है कि हमारे साधु-संत, बाबा और महंत यह समझें कि एजुकेशन (शिक्षा) ही सबसे बड़ा धर्म है। बिना शिक्षा के न तो रूहानी (आध्यात्मिक) जागरण संभव है और न ही सामाजिक परिवर्तन। हर मठ, आश्रम या पीठ में एक छोटा लाइब्रेरी (पुस्तकालय) होना चाहिए जहाँ बुद्ध, फुले, कबीर, रैदास और डॉ. अंबेडकर की किताबें रखी जाएँ, ताकि अनुयायी केवल सुनें नहीं, पढ़ें और समझें भी। संतों को बच्चों और युवाओं में नॉलेज (ज्ञान) का बीज बोना चाहिए, क्योंकि यही समाज की असली पूँजी है। भंडारे से ज़्यादा पुण्य तब मिलेगा जब कोई स्टूडेंट (विद्यार्थी) पढ़ाई में आगे बढ़े। अंधभक्ति की जगह जब एजुकेशन (शिक्षा) धर्म का अंग बनेगी, तभी समाज अंधकार से उजाले की ओर बढ़ेगा। यही वह मार्ग है जो बहुजन संत परंपरा को नए युग की चेतना से जोड़ सकता है।
- ओरियंटेशन प्रोग्राम का मुख्य उद्देश्य (मेन ऑब्जेक्टिव ऑफ़ ओरियंटेशन प्रोग्राम)
ओरियंटेशन प्रोग्राम (प्रशिक्षण कार्यक्रम) का असली मकसद केवल सभा या प्रवचन नहीं, बल्कि माइंडसेट (मानसिकता) में बदलाव लाना है। हमारे साधु-संत, बापजी और महंत जब कांस्टीट्यूशन (संविधान), ह्यूमन राइट्स (मानवाधिकार) और सोशल जस्टिस (सामाजिक न्याय) की समझ प्राप्त करेंगे, तभी वे अपने अनुयायियों को सही दिशा दे पाएँगे। इस प्रोग्राम में संतों को डॉ. अंबेडकर और तथागत बुद्ध के विचारों पर आधारित साइंटिफिक (वैज्ञानिक) दृष्टिकोण सिखाया जाए, ताकि उनका धर्म केवल कर्मकांड न रहे, बल्कि समाज सुधार का माध्यम बने। जो संत इस प्रशिक्षण से गुजरेंगे, वे आगे चलकर सोशल लीडर (सामाजिक नेता) के रूप में उभर सकते हैं। इससे समाज के भीतर एक नई रूहानी (आध्यात्मिक) चेतना पैदा होगी, जहाँ धर्म और समाज दोनों एक-दूसरे के पूरक बनेंगे, विरोधी नहीं। यही इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी सफलता होगी।
- भक्ति नहीं, बोध की ज़रूरत (डिवोशन नहीं, अवेयरनेस)
आज बहुजन समाज के साधु-संतों और बाबा लोगों को समझना होगा कि केवल डिवोशन (भक्ति) से नहीं, बल्कि अवेयरनेस (जागरण) से मुक्ति का मार्ग खुलता है। भक्ति तब अधूरी रह जाती है जब उसमें नॉलेज (ज्ञान) और कंपैशन (करुणा) का समावेश न हो। तथागत बुद्ध ने सिखाया था कि सच्चा धर्म वही है जो सफ़रिंग (दुःख) को समझकर उसे मिटाने का उपाय बताता है। हमारे संतों को यह संदेश समाज तक पहुँचाना चाहिए कि बिना बोध (समझ) के भक्ति केवल रीत बनकर रह जाती है। जब संत खुद रीडिंग (पढ़ाई) और थिंकिंग (विचार) की आदत डालेंगे, तब उनके अनुयायी भी वैसा ही करेंगे। डॉ. अंबेडकर ने कहा था — “जो सोचेगा नहीं, वह बदल भी नहीं सकेगा।” इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि हमारे बाबा और महंत रूहानी (आध्यात्मिक) मार्ग पर चलते हुए लोगों को सोचने, प्रश्न करने और सत्य पहचानने की प्रेरणा दें — यही असली भक्ति है।
- महिला साध्वियों की भूमिका (रोल ऑफ़ वूमेन सेंट्स)
बहुजन समाज की महिला साध्वियाँ अब केवल डिवोशन (भक्ति) तक सीमित न रहें, बल्कि लीडरशिप (नेतृत्व) और सोशल चेंज (सामाजिक परिवर्तन) की धारा में सक्रिय भूमिका निभाएँ। समाज में इक्वलिटी (समानता) और डिग्निटी (गरिमा) की स्थापना तभी संभव है जब महिलाएँ आगे बढ़कर स्पिरिचुअल (आध्यात्मिक) नेतृत्व सँभालें। हमारे आश्रमों और मठों में वूमेन सेंट्स (महिला साध्वियाँ) को शिक्षा, स्वास्थ्य, और आत्मनिर्भरता के मुद्दों पर जनजागरण का माध्यम बनाना चाहिए। वे समाज को यह सिखाएँ कि रूहानी (आध्यात्मिक) शक्ति किसी लिंग पर निर्भर नहीं होती; वह कर्म (डीड्स) और सेवा से प्रकट होती है। जब महिला साध्वियाँ प्रवचन में कॉनफ़िडेंस (आत्मविश्वास) और ज्ञान का संगम दिखाएँगी, तब नई पीढ़ी उन्हें प्रेरणा के रूप में देखेगी। यही वह राह है जहाँ धर्म और समाज दोनों मिलकर एम्पावरमेंट (सशक्तिकरण) की दिशा में आगे बढ़ेंगे।
- संत परंपरा का पुनर्जागरण (रिवाइवल ऑफ़ सेंट ट्रेडिशन)
अब समय है कि बहुजन समाज की संत परंपरा एक नए रिवाइवल (पुनर्जागरण) की ओर कदम बढ़ाए। हमारे साधु-संत, बाबा, बापजी और महंत केवल धार्मिक प्रतीक न बनें, बल्कि सोशल रिफॉर्मर (सामाजिक सुधारक) की भूमिका निभाएँ। जब संतों की वाणी में अवेयरनेस (जागरूकता) और उनके कर्मों में कंपैशन (करुणा) झलकेगी, तब धर्म जनकल्याण का सशक्त माध्यम बनेगा। रूहानी (आध्यात्मिक) शक्ति तभी सार्थक होगी जब उसका उपयोग समाज के कमजोर वर्गों को उठाने, शिक्षित करने और समान अवसर दिलाने में हो। डॉ. अंबेडकर ने जो ह्यूमैनिटी (मानवता) का मार्ग दिखाया, वही इस युग का सच्चा धर्म है। बहुजन संतों को अब केवल कलरफुल (रंगीन) वस्त्र नहीं, बल्कि कंस्टीट्यूशनल (संवैधानिक) सोच धारण करनी होगी। तभी समाज कहेगा
“जहाँ संत की सोच में समानता का नूर हो,
वहीं से इंसानियत का असली सवेरा शुरू हो।”
संकलन कर्ता
हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।
स्रोत एवं संदर्भ
यह आलेख डॉ. गुलाब चन्द जिंदल ‘मेघ’ के मौलिक विचारों, डॉ. अंबेडकर और तथागत बुद्ध की शिक्षाओं, तथा बहुजन समाज के संत परंपरा के सामाजिक अवलोकन पर आधारित है।
