भारत में आज प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर संसद तक एक अजीब-सी बहस छिड़ी है—ज्यादा नंबर वाले रह जाते हैं, कम नंबर वाले निकल जाते हैं। यही आधा-अधूरा सच दिखाकर कुछ लोग आरक्षण को खत्म करने का शोर मचा रहे हैं। उनका फ़साना (कहानी) युवाओं को बहकाता है और लोकतंत्र को ज़ख्म देता है। यह बहस सिर्फ परीक्षा की रिज़ल्ट (परिणाम) नहीं, बल्कि सदियों की असमानता के सिस्टम (प्रणाली) पर हमला करती है। सच यह है कि जिस समाज में अन्याय जाति देखकर होता रहा हो, वहाँ आर्थिक बराबरी की बात एक फ़रेब (धोखा) है। जब शिक्षा, स्वास्थ्य, जमीन और अवसर जाति के अनुसार बँटे हों, तो प्रतियोगिता एक समान कैसे हो सकती है? यही कारण है कि आरक्षण कोई राहत नहीं, बल्कि ऐतिहासिक न्याय की रिपेयर (मरम्मत) है। इसी सत्य को समझे बिना बराबरी का दावा सिर्फ घमंड की नुमाइश (प्रदर्शनी) बनकर रह जाता है।
घोड़े और बैल की दौड़ का पूरा किस्सा बताता है कि बराबरी सिर्फ कागज़ पर होती है, ज़मीन पर नहीं। अगर दोनों को एक ही ट्रैक (पथ) पर दौड़ाओगे तो घोड़ा ही जीतेगा—क्योंकि व्यवस्था हमेशा से उसके पक्ष में रही है। लेकिन जैसे ही खेत जोतने की प्रतियोगिता होगी, घोड़े की सारी ख़ुदाई (अहंकार)—अहंकार—क्षण में गायब हो जाएगी। यही सच्ची क्षमता की असली तस्वीर है। आज जिसे मेरिट कहा जा रहा है, वह दरअसल एक पूर्व-नियोजित—पहले से तय—ढांचा है, जिसे घोड़े के लिए गढ़ा गया है। बैल को कभी सही मैदान ही नहीं दिया गया, फिर भी उससे उम्मीद की जाती है कि वह उसी गति से दौड़े। यह सोच एक धोख़ा है और प्रतियोगिता का यह फ्रेम (ढांचा) वास्तविक न्याय को छुपा देता है। असल बात यह है कि मेरिट तब ही सच्ची होगी जब दोनों को अपनी-अपनी क्षमता के अनुकूल मैदान मिले, न कि घोड़े की सुविधा से बनाई गई दौड़।
जो लोग 80% वाले के छूटने और 50% वाले के पास होने पर शोर मचाते हैं, वे जाति की असली हक़ीक़त से आँख फेर लेते हैं। प्रतियोगिता कभी समान ट्रैक (पथ) पर हुई ही नहीं। उनसे बस एक सवाल—क्या उन्होंने कभी जमादार के साथ गटर में उतरकर देखा? क्या बढ़ई, धोबी, मोची, खटीक या नाई की तरह मेहनत का बार (बोझ) उठाया? क्या वे कभी शूद्र के घर के आगे से चप्पल हाथ में लेकर गुज़रे? क्या अपनी बारात को शूद्र बस्ती पर रोककर रास्ता बदलना पड़ा? नहीं। क्योंकि यह सब उन लोगों की सदियों की मजबूरी रही है, जिन्हें आज मेरिट में कमतर बताकर फिर से पीछे धकेलने की कोशिश की जाती है। सच यह है कि मेरिट का यह नैरेटिव बराबरी नहीं, बल्कि सदियों की असमानता का परदा (ढाँकना) है। जिन्हें नीचे रखा गया, उन्हीं से तेज़ दौड़ की उम्मीद करना न्याय नहीं, एक सोचा-समझा फ़रेब है।
आँकड़े साफ बताते हैं कि प्रतियोगिता कभी बराबर नहीं रही। भारत की शिशु मृत्यु दर 42% है, जबकि SC में 66% और ST में 78% से अधिक—यह कोई सामान्य अंतर नहीं, बल्कि सदियों की नाइंसाफ़ी (अन्याय) का प्रमाण है। खेती की कुल जमीन में SC–ST का हिस्सा 12% से भी कम है, और मजदूरों में सबसे बड़ी संख्या उन्हीं की है, क्योंकि गरीबी नहीं—जाति इसकी असल वजह है। देश का अधिकतर सोना, जमीन और आय-संपत्ति एक ही जाति समूह की मुट्ठी में है, और मंदिरों व व्यापार के लाभकारी अधिकार भी सदियों से उसी वर्ण के अधीन रहे हैं। ये आंकड़े केवल जानकारी नहीं, बल्कि एक करारी वार्निंग (चेतावनी) हैं कि बीमारी हो या गरीबी—यह जेब देखकर नहीं, जाति देखकर आती है। यही फ़साद (संघर्ष)—संघर्ष—दिखाता है कि बराबरी की बात करना बिना सामाजिक वास्तविकता समझे एक खोखला क्लेम (दावा) है।
शिक्षा का सच साफ बताता है कि शुरुआत ही सबकी एक जैसी नहीं होती। अगर सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की जातिगत सूची और प्राइवेट स्कूलों की जाति संरचना की तुलना करें, तो तुरंत समझ आएगा कि घोड़ा कहाँ पढ़ रहा है और बैल कहाँ पढ़ने भेजा जा रहा है। सरकारी स्कूलों की भीड़, संसाधनों की कमी और सामाजिक मह़रूमी (वंचना)—वंचना—बता देती है कि किसे शुरुआत से ही पीछे रखा गया। दूसरी ओर, प्राइवेट स्कूलों का चमकता हुआ कैम्पस (परिसर) और सुविधाएँ एक अलग ही संसार बनाते हैं जहाँ केवल वही पहुँच पाता है जिसे जाति और अवसर दोनों का लाभ मिला हो। ऐसे में ‘समान स्टार्टिंग लाइन’ का दावा एक मायाजाल (भ्रम) है। जिन बच्चों की यात्रा अलग-अलग रास्तों से शुरू होती हो, उनसे एक जैसी दौड़ की उम्मीद करना भी असली न्याय से इनकार है। शिक्षा का यह अंतर ही साबित करता है कि मेरिट नहीं, मैदान बदलता है—और यही सबसे बड़ा फैक्टर (कारक) है।
आरक्षण का विरोध करने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि असली हक़ीक़त क्या है। वे घोड़े और बैल की दौड़ को बराबर बताकर एक सुविधाजनक नैरेटिव गढ़ते हैं, क्योंकि उन्हें भय है कि अगर कभी खेत की असली जुताई की प्रतियोगिता शुरू हुई, तो बैल अपने प्राकृतिक कौशल से घोड़े को बहुत पीछे छोड़ देगा। यही उनका सबसे बड़ा ख़ौफ़ है—डर—कि बराबरी का मैदान बदलते ही उनकी बनाई हुई मेरिट का फ़साना (कहानी) टूट जाएगा। इसलिए वे हर जगह वही ‘मेरिट’ लागू करना चाहते हैं जो उनके पक्ष में हो, जहाँ घोड़ा हमेशा विजेता दिखे और बैल हमेशा पीछे। यह सोच बताती है कि उनका संघर्ष न्याय से नहीं, बल्कि अपने स्टेटस (दर्जा) को बचाने से है। इसी वजह से वे उस हर बदलाव का विरोध करते हैं जो असली बराबरी की ओर जाता है।
कई बार हमारा उच्च शिक्षित वर्ग उसी इम्तिहान की दौड़ में भागने लगता है, जिसे घोड़ा अपने लिए तय करता है। घोड़े वाले चने खाकर स्वयं को घोड़ा मानने की यह
गलती—उसे वास्तविक सामाजिक संरचना से दूर कर देती है। यही वह जगह है जहाँ हमारा बुद्धिजीवी वर्ग फँसता है। उसे समझना होगा कि असली ताकत उस ग्राउंड (भूमि) में है जहाँ हमारी मेहनत, संघर्ष और धरती से जुड़ी हिक़ायत (कहानी) तैयार होती है। तुलना और प्रतिस्पर्धा का पैमाना घोड़े की सहूलियत से नहीं, हमारी अपनी वास्तविकता से बनना चाहिए। यही कारण है कि हमें अपना पैमाना, अपनी ताकत और अपनी ज़मीन खुद तय करनी चाहिए। खेत, श्रम और संघर्ष सिर्फ बोझ नहीं, हमारी स्ट्रेंथ (शक्ति) हैं—और यहीं हमारी जीत का असली पैमाना भी।
जो लोग आरक्षण को अन्याय कहते हैं, उनसे बस एक सीधी चुनौती—एक बार गटर में उतरकर हमारे साथ मुक़ाबला (प्रतिस्पर्धा) कर लो। उसी काम में उतरकर देखो जिसे सदियों से हम ढोते आए हैं। तभी पता चलेगा कि असली ग्राउंड (मैदान) किसका कैसा है। फिर गिन लेना—तुम्हारे कितने प्रतिशत सफल हुए और हमारे कितने। सच यही है कि जाति की इस लंबी दौड़ में घोड़ा तेज़ नहीं है, बल्कि बैल को रोका गया है। सदियों की मेहरूमी (वंचना) ने बैल की गति बाँधी है, जबकि घोड़ा विशेष सुविधाओं के फायदे लेकर दौड़ता रहा। इसलिए बराबरी की बात करने से पहले एक बार हमारे जीवन में कदम रखकर देखो। तब समझ आएगा कि जिस दुनिया को तुम ‘साधारण’ कहते हो, वह हमारे लिए संघर्ष की रियलिटी (सच्चाई) है। यही कारण है कि न्याय की शुरुआत बराबर मैदान से होती है, न कि घोड़े की बनाई शर्तों से।
भारत की सामाजिक संरचना हमेशा दो पटरियों पर चली है—एक पर घोड़ा, दूसरी पर बैल। घोड़े को मैदान भी मिला, चारा भी और तालियाँ (प्रशंसा) भी; बैल के हिस्से में आया बोझ, भूख और अपमान। ऐसे में आरक्षण कोई कृपा नहीं, बल्कि असमानता की भरपाई का एक न्यायपूर्ण मेकेनिज़्म (प्रणाली) है। यह उस लंबे अन्याय का इलाज़ है, न कि किसी पर किया गया एहसान। आज सबसे बड़ी ज़रूरत है कि हम अपनी ताकत पहचानें, अपना पैमाना खुद बनाएं और समाज को लगातार याद दिलाते रहें कि जब तक न्याय जाति देखकर मिलता रहेगा, तब तक कोई भी प्रतियोगिता बराबरी की नहीं हो सकती। असली परिवर्तन तभी आएगा जब बैल को उसका हक़ और उसका स्पेस (स्थान )मिलेगा, और घोड़े की बनाई गई कथाओं के बजाय सच्चाई को आधार बनाया जाएगा।
शेर
ज़ुल्मत की धूप में जलते रहे उम्र-भर हम,
नस्लों का बोझ उठाकर भी कहलाए “कमज़ोर” हम।

संकलन कर्ता
हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।
स्रोत व संदर्भ
जातिगत असमानता, आर्थिक-सामाजिक वंचना, शिक्षा-स्वास्थ्य अंतर, ऐतिहासिक उत्पीड़न, सरकारी आंकड़े व सामाजिक न्याय संबंधी शोध।
भारत में आज प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर संसद तक एक अजीब-सी बहस छिड़ी है—ज्यादा नंबर वाले रह जाते हैं, कम नंबर वाले निकल जाते हैं। यही आधा-अधूरा सच दिखाकर कुछ लोग आरक्षण को खत्म करने का शोर मचा रहे हैं। उनका फ़साना (कहानी) युवाओं को बहकाता है और लोकतंत्र को ज़ख्म देता है। यह बहस सिर्फ परीक्षा की रिज़ल्ट (परिणाम) नहीं, बल्कि सदियों की असमानता के सिस्टम (प्रणाली) पर हमला करती है। सच यह है कि जिस समाज में अन्याय जाति देखकर होता रहा हो, वहाँ आर्थिक बराबरी की बात एक फ़रेब (धोखा) है। जब शिक्षा, स्वास्थ्य, जमीन और अवसर जाति के अनुसार बँटे हों, तो प्रतियोगिता एक समान कैसे हो सकती है? यही कारण है कि आरक्षण कोई राहत नहीं, बल्कि ऐतिहासिक न्याय की रिपेयर (मरम्मत) है। इसी सत्य को समझे बिना बराबरी का दावा सिर्फ घमंड की नुमाइश (प्रदर्शनी) बनकर रह जाता है।
घोड़े और बैल की दौड़ का पूरा किस्सा बताता है कि बराबरी सिर्फ कागज़ पर होती है, ज़मीन पर नहीं। अगर दोनों को एक ही ट्रैक (पथ) पर दौड़ाओगे तो घोड़ा ही जीतेगा—क्योंकि व्यवस्था हमेशा से उसके पक्ष में रही है। लेकिन जैसे ही खेत जोतने की प्रतियोगिता होगी, घोड़े की सारी ख़ुदाई (अहंकार)—अहंकार—क्षण में गायब हो जाएगी। यही सच्ची क्षमता की असली तस्वीर है। आज जिसे मेरिट कहा जा रहा है, वह दरअसल एक पूर्व-नियोजित—पहले से तय—ढांचा है, जिसे घोड़े के लिए गढ़ा गया है। बैल को कभी सही मैदान ही नहीं दिया गया, फिर भी उससे उम्मीद की जाती है कि वह उसी गति से दौड़े। यह सोच एक धोख़ा है और प्रतियोगिता का यह फ्रेम (ढांचा) वास्तविक न्याय को छुपा देता है। असल बात यह है कि मेरिट तब ही सच्ची होगी जब दोनों को अपनी-अपनी क्षमता के अनुकूल मैदान मिले, न कि घोड़े की सुविधा से बनाई गई दौड़।
जो लोग 80% वाले के छूटने और 50% वाले के पास होने पर शोर मचाते हैं, वे जाति की असली हक़ीक़त से आँख फेर लेते हैं। प्रतियोगिता कभी समान ट्रैक (पथ) पर हुई ही नहीं। उनसे बस एक सवाल—क्या उन्होंने कभी जमादार के साथ गटर में उतरकर देखा? क्या बढ़ई, धोबी, मोची, खटीक या नाई की तरह मेहनत का बार (बोझ) उठाया? क्या वे कभी शूद्र के घर के आगे से चप्पल हाथ में लेकर गुज़रे? क्या अपनी बारात को शूद्र बस्ती पर रोककर रास्ता बदलना पड़ा? नहीं। क्योंकि यह सब उन लोगों की सदियों की मजबूरी रही है, जिन्हें आज मेरिट में कमतर बताकर फिर से पीछे धकेलने की कोशिश की जाती है। सच यह है कि मेरिट का यह नैरेटिव बराबरी नहीं, बल्कि सदियों की असमानता का परदा (ढाँकना) है। जिन्हें नीचे रखा गया, उन्हीं से तेज़ दौड़ की उम्मीद करना न्याय नहीं, एक सोचा-समझा फ़रेब है।
आँकड़े साफ बताते हैं कि प्रतियोगिता कभी बराबर नहीं रही। भारत की शिशु मृत्यु दर 42% है, जबकि SC में 66% और ST में 78% से अधिक—यह कोई सामान्य अंतर नहीं, बल्कि सदियों की नाइंसाफ़ी (अन्याय) का प्रमाण है। खेती की कुल जमीन में SC–ST का हिस्सा 12% से भी कम है, और मजदूरों में सबसे बड़ी संख्या उन्हीं की है, क्योंकि गरीबी नहीं—जाति इसकी असल वजह है। देश का अधिकतर सोना, जमीन और आय-संपत्ति एक ही जाति समूह की मुट्ठी में है, और मंदिरों व व्यापार के लाभकारी अधिकार भी सदियों से उसी वर्ण के अधीन रहे हैं। ये आंकड़े केवल जानकारी नहीं, बल्कि एक करारी वार्निंग (चेतावनी) हैं कि बीमारी हो या गरीबी—यह जेब देखकर नहीं, जाति देखकर आती है। यही फ़साद (संघर्ष)—संघर्ष—दिखाता है कि बराबरी की बात करना बिना सामाजिक वास्तविकता समझे एक खोखला क्लेम (दावा) है।
शिक्षा का सच साफ बताता है कि शुरुआत ही सबकी एक जैसी नहीं होती। अगर सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की जातिगत सूची और प्राइवेट स्कूलों की जाति संरचना की तुलना करें, तो तुरंत समझ आएगा कि घोड़ा कहाँ पढ़ रहा है और बैल कहाँ पढ़ने भेजा जा रहा है। सरकारी स्कूलों की भीड़, संसाधनों की कमी और सामाजिक मह़रूमी (वंचना)—वंचना—बता देती है कि किसे शुरुआत से ही पीछे रखा गया। दूसरी ओर, प्राइवेट स्कूलों का चमकता हुआ कैम्पस (परिसर) और सुविधाएँ एक अलग ही संसार बनाते हैं जहाँ केवल वही पहुँच पाता है जिसे जाति और अवसर दोनों का लाभ मिला हो। ऐसे में ‘समान स्टार्टिंग लाइन’ का दावा एक मायाजाल (भ्रम) है। जिन बच्चों की यात्रा अलग-अलग रास्तों से शुरू होती हो, उनसे एक जैसी दौड़ की उम्मीद करना भी असली न्याय से इनकार है। शिक्षा का यह अंतर ही साबित करता है कि मेरिट नहीं, मैदान बदलता है—और यही सबसे बड़ा फैक्टर (कारक) है।
आरक्षण का विरोध करने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि असली हक़ीक़त क्या है। वे घोड़े और बैल की दौड़ को बराबर बताकर एक सुविधाजनक नैरेटिव गढ़ते हैं, क्योंकि उन्हें भय है कि अगर कभी खेत की असली जुताई की प्रतियोगिता शुरू हुई, तो बैल अपने प्राकृतिक कौशल से घोड़े को बहुत पीछे छोड़ देगा। यही उनका सबसे बड़ा ख़ौफ़ है—डर—कि बराबरी का मैदान बदलते ही उनकी बनाई हुई मेरिट का फ़साना (कहानी) टूट जाएगा। इसलिए वे हर जगह वही ‘मेरिट’ लागू करना चाहते हैं जो उनके पक्ष में हो, जहाँ घोड़ा हमेशा विजेता दिखे और बैल हमेशा पीछे। यह सोच बताती है कि उनका संघर्ष न्याय से नहीं, बल्कि अपने स्टेटस (दर्जा) को बचाने से है। इसी वजह से वे उस हर बदलाव का विरोध करते हैं जो असली बराबरी की ओर जाता है।
कई बार हमारा उच्च शिक्षित वर्ग उसी इम्तिहान की दौड़ में भागने लगता है, जिसे घोड़ा अपने लिए तय करता है। घोड़े वाले चने खाकर स्वयं को घोड़ा मानने की यह
गलती—उसे वास्तविक सामाजिक संरचना से दूर कर देती है। यही वह जगह है जहाँ हमारा बुद्धिजीवी वर्ग फँसता है। उसे समझना होगा कि असली ताकत उस ग्राउंड (भूमि) में है जहाँ हमारी मेहनत, संघर्ष और धरती से जुड़ी हिक़ायत (कहानी) तैयार होती है। तुलना और प्रतिस्पर्धा का पैमाना घोड़े की सहूलियत से नहीं, हमारी अपनी वास्तविकता से बनना चाहिए। यही कारण है कि हमें अपना पैमाना, अपनी ताकत और अपनी ज़मीन खुद तय करनी चाहिए। खेत, श्रम और संघर्ष सिर्फ बोझ नहीं, हमारी स्ट्रेंथ (शक्ति) हैं—और यहीं हमारी जीत का असली पैमाना भी।
जो लोग आरक्षण को अन्याय कहते हैं, उनसे बस एक सीधी चुनौती—एक बार गटर में उतरकर हमारे साथ मुक़ाबला (प्रतिस्पर्धा) कर लो। उसी काम में उतरकर देखो जिसे सदियों से हम ढोते आए हैं। तभी पता चलेगा कि असली ग्राउंड (मैदान) किसका कैसा है। फिर गिन लेना—तुम्हारे कितने प्रतिशत सफल हुए और हमारे कितने। सच यही है कि जाति की इस लंबी दौड़ में घोड़ा तेज़ नहीं है, बल्कि बैल को रोका गया है। सदियों की मेहरूमी (वंचना) ने बैल की गति बाँधी है, जबकि घोड़ा विशेष सुविधाओं के फायदे लेकर दौड़ता रहा। इसलिए बराबरी की बात करने से पहले एक बार हमारे जीवन में कदम रखकर देखो। तब समझ आएगा कि जिस दुनिया को तुम ‘साधारण’ कहते हो, वह हमारे लिए संघर्ष की रियलिटी (सच्चाई) है। यही कारण है कि न्याय की शुरुआत बराबर मैदान से होती है, न कि घोड़े की बनाई शर्तों से।
भारत की सामाजिक संरचना हमेशा दो पटरियों पर चली है—एक पर घोड़ा, दूसरी पर बैल। घोड़े को मैदान भी मिला, चारा भी और तालियाँ (प्रशंसा) भी; बैल के हिस्से में आया बोझ, भूख और अपमान। ऐसे में आरक्षण कोई कृपा नहीं, बल्कि असमानता की भरपाई का एक न्यायपूर्ण मेकेनिज़्म (प्रणाली) है। यह उस लंबे अन्याय का इलाज़ है, न कि किसी पर किया गया एहसान। आज सबसे बड़ी ज़रूरत है कि हम अपनी ताकत पहचानें, अपना पैमाना खुद बनाएं और समाज को लगातार याद दिलाते रहें कि जब तक न्याय जाति देखकर मिलता रहेगा, तब तक कोई भी प्रतियोगिता बराबरी की नहीं हो सकती। असली परिवर्तन तभी आएगा जब बैल को उसका हक़ और उसका स्पेस (स्थान )मिलेगा, और घोड़े की बनाई गई कथाओं के बजाय सच्चाई को आधार बनाया जाएगा।
शेर
ज़ुल्मत की धूप में जलते रहे उम्र-भर हम,
नस्लों का बोझ उठाकर भी कहलाए “कमज़ोर” हम।
संकलन कर्ता
हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।
स्रोत व संदर्भ
जातिगत असमानता, आर्थिक-सामाजिक वंचना, शिक्षा-स्वास्थ्य अंतर, ऐतिहासिक उत्पीड़न, सरकारी आंकड़े व सामाजिक न्याय संबंधी शोध।
भारत में आज प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर संसद तक एक अजीब-सी बहस छिड़ी है—ज्यादा नंबर वाले रह जाते हैं, कम नंबर वाले निकल जाते हैं। यही आधा-अधूरा सच दिखाकर कुछ लोग आरक्षण को खत्म करने का शोर मचा रहे हैं। उनका फ़साना (कहानी) युवाओं को बहकाता है और लोकतंत्र को ज़ख्म देता है। यह बहस सिर्फ परीक्षा की रिज़ल्ट (परिणाम) नहीं, बल्कि सदियों की असमानता के सिस्टम (प्रणाली) पर हमला करती है। सच यह है कि जिस समाज में अन्याय जाति देखकर होता रहा हो, वहाँ आर्थिक बराबरी की बात एक फ़रेब (धोखा) है। जब शिक्षा, स्वास्थ्य, जमीन और अवसर जाति के अनुसार बँटे हों, तो प्रतियोगिता एक समान कैसे हो सकती है? यही कारण है कि आरक्षण कोई राहत नहीं, बल्कि ऐतिहासिक न्याय की रिपेयर (मरम्मत) है। इसी सत्य को समझे बिना बराबरी का दावा सिर्फ घमंड की नुमाइश (प्रदर्शनी) बनकर रह जाता है।
घोड़े और बैल की दौड़ का पूरा किस्सा बताता है कि बराबरी सिर्फ कागज़ पर होती है, ज़मीन पर नहीं। अगर दोनों को एक ही ट्रैक (पथ) पर दौड़ाओगे तो घोड़ा ही जीतेगा—क्योंकि व्यवस्था हमेशा से उसके पक्ष में रही है। लेकिन जैसे ही खेत जोतने की प्रतियोगिता होगी, घोड़े की सारी ख़ुदाई (अहंकार)—अहंकार—क्षण में गायब हो जाएगी। यही सच्ची क्षमता की असली तस्वीर है। आज जिसे मेरिट कहा जा रहा है, वह दरअसल एक पूर्व-नियोजित—पहले से तय—ढांचा है, जिसे घोड़े के लिए गढ़ा गया है। बैल को कभी सही मैदान ही नहीं दिया गया, फिर भी उससे उम्मीद की जाती है कि वह उसी गति से दौड़े। यह सोच एक धोख़ा है और प्रतियोगिता का यह फ्रेम (ढांचा) वास्तविक न्याय को छुपा देता है। असल बात यह है कि मेरिट तब ही सच्ची होगी जब दोनों को अपनी-अपनी क्षमता के अनुकूल मैदान मिले, न कि घोड़े की सुविधा से बनाई गई दौड़।
जो लोग 80% वाले के छूटने और 50% वाले के पास होने पर शोर मचाते हैं, वे जाति की असली हक़ीक़त से आँख फेर लेते हैं। प्रतियोगिता कभी समान ट्रैक (पथ) पर हुई ही नहीं। उनसे बस एक सवाल—क्या उन्होंने कभी जमादार के साथ गटर में उतरकर देखा? क्या बढ़ई, धोबी, मोची, खटीक या नाई की तरह मेहनत का बार (बोझ) उठाया? क्या वे कभी शूद्र के घर के आगे से चप्पल हाथ में लेकर गुज़रे? क्या अपनी बारात को शूद्र बस्ती पर रोककर रास्ता बदलना पड़ा? नहीं। क्योंकि यह सब उन लोगों की सदियों की मजबूरी रही है, जिन्हें आज मेरिट में कमतर बताकर फिर से पीछे धकेलने की कोशिश की जाती है। सच यह है कि मेरिट का यह नैरेटिव बराबरी नहीं, बल्कि सदियों की असमानता का परदा (ढाँकना) है। जिन्हें नीचे रखा गया, उन्हीं से तेज़ दौड़ की उम्मीद करना न्याय नहीं, एक सोचा-समझा फ़रेब है।
आँकड़े साफ बताते हैं कि प्रतियोगिता कभी बराबर नहीं रही। भारत की शिशु मृत्यु दर 42% है, जबकि SC में 66% और ST में 78% से अधिक—यह कोई सामान्य अंतर नहीं, बल्कि सदियों की नाइंसाफ़ी (अन्याय) का प्रमाण है। खेती की कुल जमीन में SC–ST का हिस्सा 12% से भी कम है, और मजदूरों में सबसे बड़ी संख्या उन्हीं की है, क्योंकि गरीबी नहीं—जाति इसकी असल वजह है। देश का अधिकतर सोना, जमीन और आय-संपत्ति एक ही जाति समूह की मुट्ठी में है, और मंदिरों व व्यापार के लाभकारी अधिकार भी सदियों से उसी वर्ण के अधीन रहे हैं। ये आंकड़े केवल जानकारी नहीं, बल्कि एक करारी वार्निंग (चेतावनी) हैं कि बीमारी हो या गरीबी—यह जेब देखकर नहीं, जाति देखकर आती है। यही फ़साद (संघर्ष)—संघर्ष—दिखाता है कि बराबरी की बात करना बिना सामाजिक वास्तविकता समझे एक खोखला क्लेम (दावा) है।
शिक्षा का सच साफ बताता है कि शुरुआत ही सबकी एक जैसी नहीं होती। अगर सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की जातिगत सूची और प्राइवेट स्कूलों की जाति संरचना की तुलना करें, तो तुरंत समझ आएगा कि घोड़ा कहाँ पढ़ रहा है और बैल कहाँ पढ़ने भेजा जा रहा है। सरकारी स्कूलों की भीड़, संसाधनों की कमी और सामाजिक मह़रूमी (वंचना)—वंचना—बता देती है कि किसे शुरुआत से ही पीछे रखा गया। दूसरी ओर, प्राइवेट स्कूलों का चमकता हुआ कैम्पस (परिसर) और सुविधाएँ एक अलग ही संसार बनाते हैं जहाँ केवल वही पहुँच पाता है जिसे जाति और अवसर दोनों का लाभ मिला हो। ऐसे में ‘समान स्टार्टिंग लाइन’ का दावा एक मायाजाल (भ्रम) है। जिन बच्चों की यात्रा अलग-अलग रास्तों से शुरू होती हो, उनसे एक जैसी दौड़ की उम्मीद करना भी असली न्याय से इनकार है। शिक्षा का यह अंतर ही साबित करता है कि मेरिट नहीं, मैदान बदलता है—और यही सबसे बड़ा फैक्टर (कारक) है।
आरक्षण का विरोध करने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि असली हक़ीक़त क्या है। वे घोड़े और बैल की दौड़ को बराबर बताकर एक सुविधाजनक नैरेटिव गढ़ते हैं, क्योंकि उन्हें भय है कि अगर कभी खेत की असली जुताई की प्रतियोगिता शुरू हुई, तो बैल अपने प्राकृतिक कौशल से घोड़े को बहुत पीछे छोड़ देगा। यही उनका सबसे बड़ा ख़ौफ़ है—डर—कि बराबरी का मैदान बदलते ही उनकी बनाई हुई मेरिट का फ़साना (कहानी) टूट जाएगा। इसलिए वे हर जगह वही ‘मेरिट’ लागू करना चाहते हैं जो उनके पक्ष में हो, जहाँ घोड़ा हमेशा विजेता दिखे और बैल हमेशा पीछे। यह सोच बताती है कि उनका संघर्ष न्याय से नहीं, बल्कि अपने स्टेटस (दर्जा) को बचाने से है। इसी वजह से वे उस हर बदलाव का विरोध करते हैं जो असली बराबरी की ओर जाता है।
कई बार हमारा उच्च शिक्षित वर्ग उसी इम्तिहान की दौड़ में भागने लगता है, जिसे घोड़ा अपने लिए तय करता है। घोड़े वाले चने खाकर स्वयं को घोड़ा मानने की यह
गलती—उसे वास्तविक सामाजिक संरचना से दूर कर देती है। यही वह जगह है जहाँ हमारा बुद्धिजीवी वर्ग फँसता है। उसे समझना होगा कि असली ताकत उस ग्राउंड (भूमि) में है जहाँ हमारी मेहनत, संघर्ष और धरती से जुड़ी हिक़ायत (कहानी) तैयार होती है। तुलना और प्रतिस्पर्धा का पैमाना घोड़े की सहूलियत से नहीं, हमारी अपनी वास्तविकता से बनना चाहिए। यही कारण है कि हमें अपना पैमाना, अपनी ताकत और अपनी ज़मीन खुद तय करनी चाहिए। खेत, श्रम और संघर्ष सिर्फ बोझ नहीं, हमारी स्ट्रेंथ (शक्ति) हैं—और यहीं हमारी जीत का असली पैमाना भी।
जो लोग आरक्षण को अन्याय कहते हैं, उनसे बस एक सीधी चुनौती—एक बार गटर में उतरकर हमारे साथ मुक़ाबला (प्रतिस्पर्धा) कर लो। उसी काम में उतरकर देखो जिसे सदियों से हम ढोते आए हैं। तभी पता चलेगा कि असली ग्राउंड (मैदान) किसका कैसा है। फिर गिन लेना—तुम्हारे कितने प्रतिशत सफल हुए और हमारे कितने। सच यही है कि जाति की इस लंबी दौड़ में घोड़ा तेज़ नहीं है, बल्कि बैल को रोका गया है। सदियों की मेहरूमी (वंचना) ने बैल की गति बाँधी है, जबकि घोड़ा विशेष सुविधाओं के फायदे लेकर दौड़ता रहा। इसलिए बराबरी की बात करने से पहले एक बार हमारे जीवन में कदम रखकर देखो। तब समझ आएगा कि जिस दुनिया को तुम ‘साधारण’ कहते हो, वह हमारे लिए संघर्ष की रियलिटी (सच्चाई) है। यही कारण है कि न्याय की शुरुआत बराबर मैदान से होती है, न कि घोड़े की बनाई शर्तों से।
भारत की सामाजिक संरचना हमेशा दो पटरियों पर चली है—एक पर घोड़ा, दूसरी पर बैल। घोड़े को मैदान भी मिला, चारा भी और तालियाँ (प्रशंसा) भी; बैल के हिस्से में आया बोझ, भूख और अपमान। ऐसे में आरक्षण कोई कृपा नहीं, बल्कि असमानता की भरपाई का एक न्यायपूर्ण मेकेनिज़्म (प्रणाली) है। यह उस लंबे अन्याय का इलाज़ है, न कि किसी पर किया गया एहसान। आज सबसे बड़ी ज़रूरत है कि हम अपनी ताकत पहचानें, अपना पैमाना खुद बनाएं और समाज को लगातार याद दिलाते रहें कि जब तक न्याय जाति देखकर मिलता रहेगा, तब तक कोई भी प्रतियोगिता बराबरी की नहीं हो सकती। असली परिवर्तन तभी आएगा जब बैल को उसका हक़ और उसका स्पेस (स्थान )मिलेगा, और घोड़े की बनाई गई कथाओं के बजाय सच्चाई को आधार बनाया जाएगा।
शेर
ज़ुल्मत की धूप में जलते रहे उम्र-भर हम,
नस्लों का बोझ उठाकर भी कहलाए “कमज़ोर” हम।
संकलन कर्ता
हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।
स्रोत व संदर्भ
जातिगत असमानता, आर्थिक-सामाजिक वंचना, शिक्षा-स्वास्थ्य अंतर, ऐतिहासिक उत्पीड़न, सरकारी आंकड़े व सामाजिक न्याय संबंधी शोध।
