“ज्ञान के लिए कोई उम्र नहीं होती”—यह विचार यूनान (ग्रीस) के महान दार्शनिक Epicurus का है, जो आज से लगभग 2300 वर्ष पहले हुए थे। उन्होंने कहा था—“युवावस्था में ज्ञान की साधना से मत भागो, और बुढ़ापे में उससे थको मत।” यह वाक्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है। वंचित समाज के नवयुवकों के लिए यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है कि वे किसी भी अवस्था में सीखने से पीछे न हटें। यदि वे अपने भीतर जुनून (तीव्र इच्छा) और लर्निंग (सीखने की प्रक्रिया) को जीवन का आधार बनाएं, तो वे कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी बदल सकते हैं।

हमारे समाज में अक्सर यह कहा जाता है—“अभी नहीं” या “अब बहुत देर हो गई।” यह सबसे बड़ा भ्रम है, जो नवयुवकों को आगे बढ़ने से रोकता है। वंचित वर्ग के युवाओं को बचपन से ही अभाव और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है, जिससे उनके मन में हीनभावना घर कर जाती है। लेकिन सच्चाई यह है कि हर क्षण सीखने का अवसर होता है। यदि वे अपने भीतर हौसला (साहस) पैदा करें और माइंडसेट (सोचने का ढंग) बदलें, तो कोई भी बाधा उन्हें रोक नहीं सकती।

गांव की गलियों और स्कूलों में अक्सर वंचित समाज के बच्चों को विशेष नामों से पुकारा जाता है, जो उनके आत्मसम्मान को चोट पहुंचाते हैं। उन्हें कामचोर, अयोग्य और नाकाबिल कहा जाता है, जबकि असल में यह समाज की सोच की कमी होती है। ऐसे में जरूरी है कि नवयुवक इन शब्दों को अपनी कमजोरी न बनने दें। वे अपने भीतर खुद्दारी (आत्मसम्मान) को जिंदा रखें और स्किल (कौशल) विकसित करें, क्योंकि यही उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिखाएगा।

ज्ञान केवल किताबों तक सीमित नहीं होता, बल्कि जीवन के हर अनुभव में छिपा होता है। जो नवयुवक कठिनाइयों से सीख लेते हैं, वे जीवन में अधिक मजबूत बनते हैं। वंचित समाज के युवाओं को यह समझना चाहिए कि उनका संघर्ष ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। यदि वे अपने अनुभवों को तजुर्बा (अनुभव) मानकर स्वीकार करें और एक्सपीरियंस (अनुभव) से सीखें, तो वे अपने जीवन को नई दिशा दे सकते हैं।

बुजुर्गों और युवाओं के लिए ज्ञान के मायने अलग-अलग होते हैं, लेकिन उसका महत्व समान रहता है। बुजुर्ग अपने अतीत से सीखते हैं, जबकि युवा अपने भविष्य को संवारने के लिए ज्ञान प्राप्त करते हैं। वंचित समाज के नवयुवकों के लिए यह और भी जरूरी है, क्योंकि उनके पास संसाधन सीमित होते हैं। यदि वे अपने भीतर सब्र (धैर्य) रखें और फ्यूचर (भविष्य) की सोच के साथ आगे बढ़ें, तो वे अपने सपनों को साकार कर सकते हैं।

Epicurus ने कहा था कि हम जो भी करते हैं, वह खुशी के लिए करते हैं। लेकिन सच्ची खुशी केवल भौतिक चीजों से नहीं, बल्कि ज्ञान और आत्मशांति से मिलती है। वंचित समाज के नवयुवकों को यह समझना होगा कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर बनाने का साधन है। यदि वे अपने भीतर सुकून (शांति) खोजें और हैप्पीनेस (खुशी) को सही मायने में समझें, तो वे जीवन में संतुलन बना सकते हैं।

समाज का तथाकथित उच्च वर्ग अक्सर ज्ञान और अवसरों पर अपना अधिकार समझता है, लेकिन यह धारणा अब बदल रही है। आज के दौर में जानकारी और शिक्षा सभी के लिए उपलब्ध है। वंचित समाज के नवयुवक यदि इस अवसर का सही उपयोग करें, तो वे किसी से कम नहीं रहेंगे। उन्हें अपने भीतर इंकलाब (परिवर्तन) की भावना जगानी होगी और ऑपर्च्युनिटी (अवसर) को पहचानना होगा।

जीवन में सफलता पाने के लिए केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास भी आवश्यक है। वंचित समाज के युवाओं को बार-बार असफलताओं का सामना करना पड़ता है, लेकिन यही असफलताएं उन्हें मजबूत बनाती हैं। यदि वे हार मानने के बजाय आगे बढ़ते रहें, तो सफलता उनके कदम चूमेगी। उन्हें अपने भीतर हिम्मत (साहस) बनाए रखनी चाहिए और पर्सिस्टेंस (निरंतरता) को अपनाना चाहिए।

आज का समय तकनीक और ज्ञान का युग है, जहां हर व्यक्ति के पास सीखने के अनगिनत साधन हैं। वंचित समाज के नवयुवकों को चाहिए कि वे इन साधनों का पूरा उपयोग करें और अपने जीवन को बेहतर बनाएं। वे इंटरनेट, किताबों और अनुभवों से सीख सकते हैं। यदि वे अपने भीतर आरज़ू (इच्छा) जगाएं और नॉलेज (ज्ञान) को अपना लक्ष्य बनाएं, तो वे हर बाधा को पार कर सकते हैं।

अंततः, यह कहना गलत नहीं होगा कि ज्ञान ही वह शक्ति है, जो वंचित समाज के नवयुवकों को नई पहचान दे सकती है। उन्हें यह समझना होगा कि उनकी परिस्थितियां उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि उनकी ताकत हैं। यदि वे सीखने की प्रक्रिया को कभी न छोड़ें, तो वे अपने जीवन को नई दिशा दे सकते हैं। उन्हें अपने भीतर रौशनी (प्रकाश) को जलाए रखना होगा और सक्सेस (सफलता) को अपना लक्ष्य बनाना होगा। यही नवयुग का सच्चा संदेश है।

शेर:
“तंगी में भी जिसने सीखने का दीया जलाए रखा,
वही वंचित नहीं रहा, उसने मुकद्दर नया बनाए रखा।”

संकलन कर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी ,
रिटायर्ड डिप्टी
कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966

स्रोत व संदर्भ :
एपिक्यूरस के ज्ञान-दर्शन, डॉ. भीमराव अंबेडकर के शिक्षा-सिद्धांत; “एनिहिलेशन ऑफ कास्ट”, “लेटर टू मेनोइकियस” में विस्तृत।वंचित नवयुवकों के संघर्ष, शिक्षा के महत्व, आत्मविश्वास, निरंतर प्रयास और सामाजिक बदलाव की प्रेरणा पर आधारित।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *