लोग दुनिया से चले जाते हैं… और कभी-कभी हमारे जीवन से भी ऐसे चले जाते हैं जैसे वे कभी थे ही नहीं। समय उनकी आहट, उनकी आवाज़, उनकी मौजूदगी को धीरे-धीरे धुँधला कर देता है। पर कुछ लोग सच में जाते नहीं—वे बस हमारे भीतर एक शांत कोने में ठहर जाते हैं, जैसे कोई दीपक, जो बिना शोर के जलता रहता है।
अद्वैत भी ऐसे ही एक दीपक के साथ जी रहा था।वह वंचित समाज का एक नवयुवक था, जिसने जीवन की कठिनतम पगडंडियों को पार करते हुए आईआईटी खड़गपुर तक का सफ़र तय किया था। बचपन में तिरस्कार, अभाव और सामाजिक विभाजन की चुभन उसके भीतर गहरे तक उतर चुकी थी। पर उसी चुभन ने उसे आगे बढ़ने की जिद दी। वह पढ़ा, संघर्ष किया और अंततः एक ऐसी नौकरी हासिल की, जहाँ उसका वेतन सात अंकों में था। समाज ने कहा—अब तुम्हारी ज़िंदगी बन गई।
पर अद्वैत जानता था—ज़िंदगी बनना और मन का भर जाना, दोनों अलग बातें हैं।
इसी अधूरेपन के बीच उसके जीवन में एक नवयुवती जिसका नाम समता था आई।
समता —एक सुसंस्कृत, संवेदनशील और भीतर से शांत लड़की। वह अद्वैत के जीवन में किसी हल्की हवा की तरह आई, जिसने उसके भीतर के बंद कमरों की खिड़कियाँ खोल दीं। उनकी पहली मुलाकात साधारण थी, पर उसके बाद हर मुलाकात जैसे एक गहराई में उतरने लगी। उनके बीच प्रेम का शोर नहीं था, कोई प्रदर्शन नहीं था—बस एक मौन समझ थी, जिसमें शब्दों से अधिक खामोशियाँ बोलती थीं।
समता ने अद्वैत में वह देखा, जो शायद दुनिया नहीं देख पाई थी—उसकी जिद के पीछे छिपी थकान, उसकी सफलता के पीछे छिपा खालीपन। और अद्वैत ने पहली बार किसी को अपने भीतर आने दिया।
वे साथ थे—पर उस साथ में भी एक अनकहा भय था। समाज की दीवारें, जाति के अदृश्य बंधन, परिवारों की अपेक्षाएँ—ये सब धीरे-धीरे उनके बीच आकर खड़े हो गए। उन्होंने कोशिश की, बहुत कोशिश की… पर कुछ लड़ाइयाँ जीतने के लिए नहीं, समझने के लिए होती हैं।
एक दिन मे
समता पता नहीं कहां चली गई।न कोई आखिरी मुलाकात, न कोई वादा, न कोई स्पष्ट विदाई। बस एक खामोशी, जो अद्वैत के जीवन में हमेशा के लिए बस गई। वह चला जाना, किसी के मर जाने से कम नहीं था—क्योंकि यहाँ शरीर नहीं गया था, पर स्मृतियाँ, अधूरी बातें और मन का एक हिस्सा उसके साथ चला गया था।
समय बीतता गया। अद्वैत ने अपने काम में सफलता पाई, सम्मान पाया, पर उसके भीतर एक कोना हमेशा खाली रहा। वह मुस्कुराता था, पर वह मुस्कान पूरी नहीं होती थी।
इसी खालीपन के साथ एक दिन वह विपश्यना की ओर मुड़ा।शुरुआत में उसे यह साधना कठिन लगी। जब भी वह भीतर देखने की कोशिश करता, उसके पेट में एक अजीब-सी हलचल उठती, जैसे कोई दबा हुआ भाव बार-बार सतह पर आना चाहता हो। वह उससे भागता भी था, उससे लड़ता भी था… पर वह संवेदना हर बार लौट आती। संवेदना को अनित्य बोध और अनात्मभाव को साक्षी भाव से देखकर महसूस करता।
धीरे-धीरे उसने सीखा—भागना नहीं है, दबाना नहीं है… सिर्फ देखना है।
ध्यान की गहराइयों में उतरते-उतरते एक दिन उसके भीतर कुछ बदल गया। उसे जैसे अनुभव हुआ कि शरीर की हर संवेदना क्षण-क्षण बदल रही है। जो अभी है, वह अगले ही पल वैसा नहीं रहेगा। जो पीड़ा है, वह भी स्थायी नहीं है। और जो सुख है, वह भी टिकने वाला नहीं।
उसे भीतर से एक सत्य का बोध हुआ—सब कुछ अनित्य है।
फिर एक और गहरी समझ आई—जिसे वह “मैं” कहता रहा, वह भी कोई स्थायी सत्ता नहीं है। शरीर बदल रहा है, संवेदनाएँ बदल रही हैं, विचार बदल रहे हैं… तो फिर “मैं” कहाँ है?
यह अनात्म का बोध था।उसी क्षण समता की स्मृति फिर से उभरी—पर इस बार वह पीड़ा बनकर नहीं आई। वह एक अनुभव बनकर आई, जो कभी उसके जीवन में आया था और फिर चला गया।
अद्वैत ने अपनी आँखें बंद कीं और भीतर गहराई से महसूस किया—
जिस शरीर को वह अपना मानता था, वह भी उसका नहीं है।
जिस श्वास को वह “मेरी” कहता था, वह भी बिना पूछे आती-जाती है… और एक दिन सदा के लिए मौत के वक्त साथ छोड़ देगी।
तब उसके भीतर एक अद्भुत शांति उतर आई।जब यह शरीर मेरा नहीं, यह श्वास मेरी नहीं… तो फिर यह प्रेम, यह लगाव, यह स्मृतियाँ किसकी हैं?
समता अब कोई खोई हुई वस्तु नहीं थी, न कोई अधूरी कहानी—वह एक प्रवाह थी, जो आयी… और चली गयी।
अद्वैत मुस्कुराया।
अब न उसे कुछ पाने की लालसा थी, न कुछ खोने का भय।
जो था, वह बस घट रहा था… और वह उसे देख रहा था।
लोग दुनिया से चले जाते हैं… और कभी-कभी हमारे जीवन से भी ऐसे चले जाते हैं जैसे वे कभी थे ही नहीं।
पर सच यह है—न कोई आता है, न कोई जाता है।
सब कुछ बस बदलता है… निरंतर, अनवरत।
और उस परिवर्तन के बीच,जो इसे साक्षी भाव से देख ले—वही मुक्त हो जाता है।

संकलन कर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी ,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966
