आज के समय में शिक्षा का स्वरूप चिंताजनक रूप से बदलता जा रहा है, जहाँ ज्ञान का स्थान ‘खौफ़’ (डर) और ‘प्रेशर’ (दबाव) ने ले लिया है। प्राइवेट स्कूलों में बच्चों और अभिभावकों पर ऐसी शर्तें थोपी जा रही हैं, जो शिक्षा के मूल उद्देश्य को ही कमजोर कर देती हैं। शिक्षा का वातावरण स्वतंत्रता, जिज्ञासा और रचनात्मकता से भरा होना चाहिए, लेकिन जब वहाँ भय और दबाव हावी हो जाता है, तो बच्चे सीखने के बजाय केवल नियमों का पालन करने वाले बन जाते हैं। यह स्थिति समाज के भविष्य के लिए घातक संकेत है। इनके लिए संदेश है कि‘डर’ फैलाकर शिक्षा देना बंद करो, ‘रिस्पेक्ट’ से ही असली ज्ञान पनपता है।

आज कई प्राइवेट स्कूल अभिभावकों को बाहर से किताबें खरीदने पर रोक लगाते हैं और ऐसा करने पर बच्चे का नाम काटने की धमकी देते हैं। यह एक प्रकार का ‘जुल्म’ (अत्याचार) है, जिसे ‘बिज़नेस’ (व्यापार) का रूप दे दिया गया है। शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले संस्थान जब व्यापारिक केंद्रों में बदल जाते हैं, तो उनका नैतिक आधार कमजोर हो जाता है। यह प्रवृत्ति केवल आर्थिक शोषण ही नहीं, बल्कि शिक्षा की गरिमा पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। स्कूलों से यह अपेक्षा है किस्कूल बनो मंदिर, ‘तिजारत’ नहीं; ‘फेयरनेस’ से ही सम्मान मिलेगा समाज में।

जब स्कूल किसी विशेष दुकान से किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने के लिए मजबूर करता है, तो यह ‘जबरदस्ती’ (बलपूर्वक) है, जिसे अंग्रेजी में ‘मोनोपॉली’ (एकाधिकार) कहा जाता है। यह व्यवस्था अभिभावकों की स्वतंत्रता का हनन करती है और बाजार में प्रतिस्पर्धा को समाप्त कर देती है। शिक्षा का अधिकार इस बात की गारंटी देता है कि हर बच्चे को समान अवसर मिले, लेकिन ऐसी नीतियाँ इस अधिकार का उल्लंघन करती हैं और एक असमान व्यवस्था को जन्म देती हैं।किताबों पर ‘कमीशन’ बंद करो, ‘रूल्स’ मानो, नहीं तो कार्रवाई तय है।

इस तरह के माहौल में पढ़ने वाला बच्चा हमेशा ‘खतरा’ (भय) महसूस करता है और उसके भीतर ‘कॉन्फिडेंस’ (आत्मविश्वास) की कमी हो जाती है। जब बच्चे के मन में यह डर बैठ जाता है कि छोटी-सी गलती पर उसका नाम काट दिया जाएगा, तो वह खुलकर प्रश्न नहीं पूछ पाता। शिक्षा का असली उद्देश्य बच्चों में जिज्ञासा और साहस पैदा करना है, लेकिन डर के कारण यह गुण दब जाते हैं और बच्चा केवल परीक्षा पास करने तक सीमित रह जाता है।बच्चों को मत डराओ, ‘खौफ’ नहीं; ‘केयर’ से ही उज्ज्वल भविष्य बनता है।

शिक्षा हमेशा ‘इज्जत’ (सम्मान) के साथ दी जानी चाहिए, न कि ‘फोर्स’ (बल) के माध्यम से। जब स्कूल प्रशासन अभिभावकों को आदेश देने के बजाय संवाद करता है, तो विश्वास का रिश्ता बनता है। लेकिन जब स्कूल अपनी शर्तें थोपते हैं, तो यह रिश्ता कमजोर हो जाता है। शिक्षक और संस्थान यदि अपने कर्तव्यों को समझें, तो वे बच्चों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं, अन्यथा वे केवल एक कठोर व्यवस्था का हिस्सा बनकर रह जाते हैं।
अभिभावकों का ‘शोषण’ रोको, ‘ट्रांसपेरेंसी’ अपनाओ, तभी विश्वास कायम रहेगा हमेशा।

कानून की दृष्टि से देखें तो भारत में कोई भी नियम स्कूलों को इस प्रकार की आर्थिक बाध्यता थोपने की अनुमति नहीं देता। यह ‘नाइंसाफी’ (अन्याय) है, जिसे ‘इल्लीगल’ (अवैध) कहा जा सकता है। CBSE और विभिन्न राज्य बोर्डों ने स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं कि स्कूल किसी विशेष विक्रेता से सामान खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। इसके बावजूद नियमों का उल्लंघन होना यह दर्शाता है कि निगरानी व्यवस्था में कहीं न कहीं कमी है।
शिक्षा अधिकार है, ‘बिज़नेस’ नहीं; ‘जस्टिस’ से ही स्कूल की पहचान बनेगी।

यह समय है कि समाज इस ‘साजिश’ (षड्यंत्र) को समझे और इसके खिलाफ आवाज उठाए। यदि अभिभावक एकजुट होकर विरोध करें, तो इस व्यवस्था को बदला जा सकता है। हमें इसे एक ‘मूवमेंट’ (आंदोलन) के रूप में लेना होगा, जहाँ हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझे। जागरूकता ही वह पहला कदम है, जो किसी भी अन्याय को समाप्त करने की दिशा में ले जाता है।
अभीभावकों सतर्क रहना चाहिए और स्कूल पर ध्यान रखें की किमुनाफा’ छोड़ो, शिक्षा सुधारो; ‘रिफॉर्म’ ही स्कूलों को सम्मान दिलाएगा समाज में।

अगर आज हम चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ी को शिक्षा के नाम पर ‘तिजारती’ (व्यापारिक) केंद्रों में भेजना पड़ेगा। शिक्षा कोई ‘लक्ज़री’ (ऐश्वर्य वस्तु) नहीं है, बल्कि यह एक बुनियादी अधिकार है। इसे पैसे के आधार पर नियंत्रित करना समाज में असमानता को बढ़ावा देता है। हर बच्चे को समान अवसर मिलना चाहिए, चाहे उसकी आर्थिक स्थिति कैसी भी हो।

जिस व्यवस्था की नींव ‘खौफ’ (डर) और ‘कमीशन’ (दलाली) पर टिकी हो, वहाँ से निकलने वाला छात्र एक जागरूक नागरिक नहीं बन सकता। वह केवल एक ‘कस्टमर’ (ग्राहक) बनकर रह जाता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी दिलाना नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार और संवेदनशील इंसान बनाना है। जब यह उद्देश्य खो जाता है, तो पूरी शिक्षा प्रणाली पर सवाल उठने लगते हैं।

प्राइवेट स्कूलों की मनमानी केवल उनकी अपनी शक्ति का परिणाम नहीं है, बल्कि इसमें कहीं न कहीं प्रशासनिक ढिलाई और ‘मिलीभगत’ (सांठगांठ) की आशंका भी दिखाई देती है। जब स्कूल खुलेआम अभिभावकों पर महंगी किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य शुल्क थोपते हैं, और इसके बावजूद उन पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकार की निगरानी व्यवस्था कमजोर है या जानबूझकर ‘साइलेंस’ (चुप्पी) साधी जा रही है। नियम और कानून मौजूद होने के बावजूद उनका पालन न होना इस बात का संकेत है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं लापरवाही या संरक्षण है। यदि सरकार ईमानदारी से नियम लागू करे और शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई करे, तो ऐसी मनमानी पर रोक लग सकती है। इसलिए पारदर्शिता, जवाबदेही और सख्त निरीक्षण बेहद आवश्यक है।

आखिर में यह कहना सही होगा कि हमें शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। ‘इंसाफ’ (न्याय) और ‘रिफॉर्म’ (सुधार) के बिना यह संभव नहीं है। सरकार, अभिभावक और समाज को मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जहाँ शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना हो, न कि लाभ कमाना। तभी हम एक ऐसे समाज का निर्माण हम कर पाएँगे, जहाँ हर बच्चा बिना डर के सीख सके और अपने सपनों को साकार कर सके।

शेर:
जो ‘इल्म’ के नाम पर करते हैं सौदे और डर का कारोबार,
वो स्कूल नहीं साहब, हैं बस लालच के खुले बाज़ार।

संकलनकर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। को 9829 230966

स्रोत व संदर्भ :
लेख शिक्षा अधिकार कानून RTE, CBSE दिशा-निर्देश, अभिभावक अनुभव, मीडिया रिपोर्ट्स, सामाजिक विश्लेषण और वर्तमान निजी स्कूल व्यवस्था पर आधारित है।

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