भूमिका

समाज में संवेदनशीलता और समझदारी की बातें करने वाले लोग अक्सर अपने आचरण में उसका उल्टा प्रस्तुत करते हैं। यह विरोधाभास हमें उस दोहरी जिंदगी की ओर ले जाता है, जहाँ कथनी और करनी के बीच गहरी खाई दिखाई देती है। ऐसे लोग ऊपर से ऑनेस्टी (ईमानदारी) का आवरण ओढ़े रहते हैं, पर भीतर से रियाकारी (दिखावटीपन) में डूबे होते हैं। यह पाखंड केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक संरचना को भी प्रभावित करता है। परिणामस्वरूप, सच्चे मूल्यों का ह्रास होता है और विश्वास की नींव कमजोर पड़ने लगती है, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए खतरे का संकेत है।

अपने देश से प्रेम करना और केवल नक्शे से प्रेम करना, इन दोनों में वही अंतर है जो रियलिटी (वास्तविकता) और फसाना (कहानी) में होता है। कुछ लोग देशभक्ति के बड़े-बड़े नारे लगाते हैं, लेकिन जब बात नागरिकों के अधिकारों और उनके सम्मान की आती है, तो उनका व्यवहार बदल जाता है। वे देश के प्रतीकों का सम्मान करते हैं, पर इंसानों की पीड़ा को नजरअंदाज कर देते हैं। यह मानसिकता एक प्रकार का पाखंड है, जिसमें भावनाओं का प्रदर्शन तो होता है, लेकिन संवेदनशीलता का अभाव स्पष्ट दिखता है।

आज के समय में सोशल मीडिया पर इमेज (छवि) बनाना आसान हो गया है, लेकिन असल जीवन में हकीकत (सच्चाई) को निभाना कठिन होता जा रहा है। लोग खुद को संवेदनशील और न्यायप्रिय दिखाने के लिए पोस्ट करते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में वे दूसरों के साथ अन्याय करते नजर आते हैं। यह दोहरा व्यवहार समाज में भ्रम पैदा करता है। उदाहरण के तौर पर, जो व्यक्ति सार्वजनिक रूप से समानता की बात करता है, वही अपने घर में भेदभाव करता है। यह विरोधाभास उसकी सोच और चरित्र की सच्चाई को उजागर करता है।

एक व्यक्ति जो रिस्पेक्ट(सम्मान) की बात करता है, लेकिन अपने अधीनस्थों के साथ तौहीन (अपमान) का व्यवहार करता है, वह समाज के लिए एक नकारात्मक उदाहरण बन जाता है। ऐसे लोग अपनी छवि बचाने के लिए नैतिकता का दिखावा करते हैं, लेकिन उनके कर्म उनकी असलियत को सामने ले आते हैं। यह पाखंड केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि संस्थागत स्तर पर भी देखा जा सकता है, जहाँ नियम और सिद्धांत केवल दिखावे के लिए होते हैं, जबकि व्यवहार में उनका पालन नहीं किया जाता।

जब कोई व्यक्ति फ्रीडम (स्वतंत्रता) की बात करता है, लेकिन दूसरों की जबरदस्ती (बलपूर्वक नियंत्रण) करता है, तो वह अपनी ही विचारधारा का विरोध कर रहा होता है। यह दोहरी मानसिकता समाज में असंतुलन पैदा करती है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग महिलाओं की स्वतंत्रता की बात करते हैं, लेकिन अपने घर की महिलाओं को नियंत्रित रखते हैं। यह व्यवहार दर्शाता है कि उनकी सोच केवल शब्दों तक सीमित है और वास्तविक जीवन में उसका कोई स्थान नहीं है।

ट्रस्ट(विश्वास) किसी भी संबंध की नींव होता है, लेकिन जब कोई व्यक्ति दगाबाजी (विश्वासघात) करता है, तो यह नींव हिल जाती है। पाखंडी लोग अक्सर विश्वास जीतने के लिए मीठी बातें करते हैं, लेकिन अवसर मिलने पर उसी विश्वास को तोड़ देते हैं। यह प्रवृत्ति समाज में असुरक्षा और अविश्वास को जन्म देती है। ऐसे लोग अपने लाभ के लिए दूसरों की भावनाओं का इस्तेमाल करते हैं, जो उनके चरित्र की कमजोरी को दर्शाता है।

जस्टिस (न्याय) की बात करना आसान है, लेकिन नाइंसाफी (अन्याय) के खिलाफ खड़े होना साहस मांगता है। पाखंडी लोग अक्सर न्याय की बातें करते हैं, लेकिन जब उन्हें खुद न्याय करना होता है, तो वे चुप रह जाते हैं। यह मौन भी एक प्रकार का पाखंड है। उदाहरण के तौर पर, कार्यस्थल पर हो रहे अन्याय को देखकर भी अनदेखा करना, केवल अपनी सुविधा के लिए, इस दोहरी मानसिकता का परिचायक है।

कंपैशन (करुणा) का दिखावा करना और भीतर से बेरुखी (उदासीनता) रखना, यह भी एक प्रकार की दोहरी जिंदगी है। ऐसे लोग जरूरतमंदों की मदद का प्रदर्शन करते हैं, लेकिन वास्तव में उनकी कोई मदद नहीं करते। यह व्यवहार समाज में गलत संदेश देता है और सच्ची करुणा की भावना को कमजोर करता है। उदाहरण के लिए, किसी गरीब की फोटो खींचकर उसे सोशल मीडिया पर डालना, लेकिन उसकी वास्तविक मदद न करना, यही पाखंड है।

इंटीग्रिटी (नैतिक अखंडता) का दावा करने वाले लोग जब मुनाफिकत (दोहरेपन) में लिप्त होते हैं, तो उनकी विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है। ऐसे लोग अपने लाभ के अनुसार अपने सिद्धांत बदल लेते हैं। यह प्रवृत्ति समाज में नैतिक पतन का कारण बनती है। उदाहरण के तौर पर, जो व्यक्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाता है, वही अवसर मिलने पर भ्रष्टाचार में शामिल हो जाता है। यह दोहरा व्यवहार समाज के लिए घातक है।

गौ माता के प्रति भारत में कितनी श्रद्धा है जिसको शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। कई बार ऐसी सूचनाओं मिलती है कि कुछ लोग जो धर्म के मर्म को नहीं समझते हैं, गौशालाओं के नाम पर धन जुटाकर सेवा का दावा करने वाले कुछ लोग गंभीर नैतिक विफलता दिखाते हैं। बाहर से वे सर्विस(सेवा) की बात करते हैं, पर भीतर खयानत (धोखा) छिपा होता है। दान का पैसा पारदर्शिता के बिना खर्च होता है, चारा, पानी और इलाज तक पर्याप्त नहीं मिलता। परिणामस्वरूप कई गायें कुपोषण से दम तोड़ देती हैं, और समाज चुप रहता है। जरूरत है कि सरकार सख्त निगरानी तंत्र बनाए, नियमित ऑडिट और जवाबदेही तय करे। समाज भी आंख मूंदकर दान न करे, बल्कि जांचकर सहयोग दे, ताकि वास्तविक सेवा ही प्रोत्साहित हो। लेकिन अपना देश इस मामले में संतोष महसूस कर सकता है क्योंकि कई सामाजिक संस्थाएं इस पवित्र कार्य को अच्छी तरह से निष्पादित कर रहे हैं।

समापन
समाज को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक है कि हम कथनी और करनी में सामंजस्य लाएं। केवल वेल्यूज (मूल्य) की बात करने से कुछ नहीं होगा, उन्हें जीवन में उतारना भी जरूरी है। पाखंड और फरेब (धोखा) से भरी दोहरी जिंदगी आखिरकार व्यक्ति और समाज दोनों को नुकसान पहुंचाती है। हमें ऐसे लोगों को पहचानना और उनसे सीख लेना चाहिए कि सच्चाई और ईमानदारी ही स्थायी रास्ता है। जब हम अपने आचरण में पारदर्शिता लाएंगे, तभी एक स्वस्थ और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण संभव होगा।

शेर:
नक्शों से मोहब्बत का ढोंग बहुत करते हैं लोग,
इंसानों से बेरुख़ी में ही असल चेहरा दिखाते हैं लोग।

संकलन कर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी ,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 230 966

स्रोत व संदर्भ :
समाज अनुभव, व्यवहारिक निरीक्षण, नैतिक चिंतन, सामाजिक विरोधाभास, मानवीय संबंध, जीवन घटनाएं, लोक अनुभव, संवेदनशील लेखन, व्यक्तिगत अवलोकन, समकालीन परिवेश

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