
लेखक
सोहनलाल सिंगरिया,
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
भारतीय इतिहास के पन्नों में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल शासन नहीं करते, बल्कि युग परिवर्तन का सूत्रपात करते हैं।
राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज (1874-1922) एक ऐसे ही क्रांतिसूर्य थे, जिन्होंने सदियों से चली आ रही वर्ण व्यवस्था और ऊंच-नीच की जंजीरों को तोड़कर एक ऐसे समाज की नींव रखी, जहाँ मनुष्य की पहचान उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म और गरिमा से हो।
जन्म, वंश और संस्कार
शाहूजी महाराज का जन्म 26 जून 1874 को कोल्हापुर के कागल कस्बे के घाटगे परिवार में हुआ था।
उनके पिता जयसिंहराव घाटगे (आबासाहेब) एक स्वाभिमानी व्यक्तित्व थे और माता राधाबाई के संस्कारों ने उन्हें बचपन से ही संवेदनशील बनाया।
कोल्हापुर की महारानी
आनंदीबाई द्वारा गोद लिए जाने के पश्चात 2 अप्रैल 1894 को उनका राज्याभिषेक हुआ।
वे छत्रपति शिवाजी महाराज के सच्चे वारिस थे, जिन्होंने ‘रैयत’ (जनता) के राज को ही सर्वोपरि माना।
जीवन का टर्निंग पॉइंट: ‘वेदोक्त प्रकरण’ और
क्रांति का शंखनाद
शाहूजी महाराज के जीवन में एक ऐसी घटना घटी जिसने उन्हें ‘शासक’ से ‘क्रांतिकारी’ बना दिया। इसे इतिहास में ‘वेदोक्त प्रकरण’ के नाम से जाना जाता है।
अक्टूबर 1899 की एक सुबह, शाहूजी महाराज पंचगंगा नदी के तट पर स्नान करने गए थे। उनके साथ उनके दरबारी और मित्र भी थे।
परंपरा के अनुसार, राजा के स्नान के दौरान पुरोहित को मंत्रोच्चारण करना था।
महाराज ने गौर किया कि पुरोहित नारायण भट्ट मंत्रों का पाठ तो कर रहा था, लेकिन वह स्नान नहीं किए हुए था और मंत्र भी अत्यंत अशुद्ध एवं ‘पुराणोक्त’ जो शूद्रों के लिए निर्धारित थे, पढ़ रहा था।
जब महाराज ने इसका कारण पूछा, तो पुरोहित ने बड़े अहंकार के साथ कहा— आप एक शूद्र हैं, और शूद्रों के लिए वेदों के मंत्र (वेदोक्त) पढ़ना वर्जित है।
मैं केवल पुराणों के मंत्र ही पढ़ूँगा और इसके लिए मुझे स्नान करने की भी आवश्यकता नहीं है।”
एक शक्तिशाली रियासत के छत्रपति के साथ यह व्यवहार देख महाराज सन्न रह गए। उन्होंने सोचा कि यदि एक ‘राजा’ के साथ जाति के नाम पर ऐसा अपमानजनक व्यवहार हो सकता है, तो मेरी साधारण ‘अछूत’ और ‘पिछड़ी’ जनता की क्या स्थिति होती होगी?
इसी अपमान की अग्नि ने उनके भीतर सामाजिक क्रांति की मशाल जला दी।
उन्होंने समझ लिया कि जब तक धर्म और शिक्षा पर एक विशेष वर्ग का एकाधिकार रहेगा, तब तक बहुजन समाज गुलाम ही रहेगा।
बहुजन क्रांति के शिल्पकार: महान कार्यों का विस्तार
शाहूजी महाराज ने सत्ता का उपयोग किसी महल को सजाने के लिए नहीं, बल्कि समाज को सजाने के लिए किया।
उनके कार्यों को निम्नानुसार समझा जा सकता है
1. आरक्षण के जनक
26 जुलाई 1902 महाराज जानते थे कि बिना प्रशासन में भागीदारी के पिछड़ों का उत्थान संभव नहीं है।
1902 में जब वे इंग्लैंड गए थे, वहीं से उन्होंने एक ऐतिहासिक गजट जारी किया।
उन्होंने कोल्हापुर राज्य की नौकरियों में 50% आरक्षण पिछड़ी जातियों के लिए घोषित कर दिया।
यह पूरे विश्व के इतिहास में सकारात्मक भेदभाव का पहला बड़ा उदाहरण था।
उन्होंने स्पष्ट कहा था— “यदि कोई घोड़ा तेज दौड़ता है और कोई कमजोर है, तो कमजोर को आगे बढ़ाना ही न्याय है।”
2. शिक्षा का सार्वभौमीकरण और छात्रावास आंदोलन
महाराज का मानना था कि शिक्षा ही विकास की रीढ़ है, शिक्षा के माध्यम से ही पिछड़ों को आगे बढ़ाने के लिए
उन्होंने 1917 में ‘नि:शुल्क और अनिवार्य प्राथमिक
शिक्षा’ का कानून पास किया।
उन्होंने महसूस किया कि गाँवों से आने वाले गरीब छात्रों के पास रहने की जगह नहीं है।
इसलिए उन्होंने कोल्हापुर में ‘मराठा’, ‘मुस्लिम’, ‘जैन’, ‘लिंगायत’ और विशेषकर ‘दलितों’ के लिए अलग-अलग छात्रावास बनवाए।
इसे ‘छात्रावासों की जननी’ कहा जाता है।
3. अछूतों और वंचितों का सशक्तिकरण
महाराज ने अस्पृश्यता को समाज का कोढ़ माना।
उन्होंने अपने राज्य में निम्नलिखित क्रांतिकारी कदम उठाए
सार्वजनिक स्थानों पर प्रवेश: स्कूलों, कुओं और अस्पतालों को सबके लिए खोल दिया।
भंगी प्रथा का अंत
उन्होंने सर पर मैला ढोने की कुप्रथा को गैरकानूनी घोषित किया।
महार वतन की समाप्ति
दलितों को गुलामी की जंजीरों में जकड़ने वाले ‘महार वतन’ को समाप्त कर उन्हें भूमि का मालिक बनाया।
अछूतों को रोजगार
उन्होंने अपनी सेना, अंगरक्षक और यहाँ तक कि राजमहल के रसोईघर में भी अछूत समाज के लोगों को नियुक्त किया ताकि समाज को संदेश मिल सके।
4. स्त्री शिक्षा और सशक्तिकरण
महाराज आधुनिक नारीवाद के भी प्रणेता थे। उन्होंने 1917 में ‘पुनर्विवाह अधिनियम’ लागू किया और ‘बाल विवाह’ पर पूर्ण रोक लगाई।
1920 में उन्होंने ‘अंतरजातीय विवाह’ को कानूनी मान्यता दी, जो उस समय के कट्टरपंथियों के गाल पर एक करारा तमाचा था।
उन्होंने महिलाओं के लिए संपत्ति के अधिकार की भी वकालत की।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और शाहूजी महाराज मुक्ति के दो किनारे
शाहूजी महाराज और डॉ बाबासाहेब आंबेडकर का मिलन भारतीय इतिहास की सबसे युगांतकारी घटना है।
महाराज ने बाबासाहेब के भीतर छिपे उस सूर्य को पहचान लिया था जो भविष्य में भारत को प्रकाशित करने वाला था।
मूकनायक की सहायता
जब बाबासाहेब ने ‘मूकनायक’ अखबार शुरू किया, तो महाराज ने बिना मांगे 2500 रुपये की तत्काल सहायता भेजी।
माणगांव परिषद
20-21 मार्च 1920 को कोल्हापुर के माणगांव में अछूतों की एक विशाल सभा हुई।
वहाँ शाहूजी महाराज ने मंच से घोषणा की— “आज मुझे मेरा नेता मिल गया है। डॉ. आंबेडकर न केवल आपके, बल्कि पूरे भारत के नेता होंगे। एक समय आएगा जब वे पूरे देश का मार्गदर्शन करेंगे।
उच्च शिक्षा
उन्होंने बाबासाहेब को उनकी अधूरी शिक्षा पूरी करने के लिए पुनः लंदन भेजने में हर संभव आर्थिक मदद की।
बहुजन समाज के लिए प्रेरणा संदेश
आज जब हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज जो भी संवैधानिक अधिकार हमें प्राप्त हैं, उनकी नींव शाहूजी महाराज ने ही रखी थी।
उन्होंने अपना राजपाठ, अपना स्वास्थ्य और अपना सुख केवल इसलिए दांव पर लगा दिया ताकि आने वाली पीढ़ियाँ सर उठाकर जी सकें।
बहुजन समाज को चाहिए कि वे ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ के मंत्र को सार्थक करें।
शाहूजी महाराज का जीवन हमें सिखाता है कि अपमान को दुख का कारण नहीं, बल्कि बदलाव की शक्ति बनाना चाहिए।
संदर्भ पुस्तकें
लेख की प्रमाणिकता हेतु निम्नलिखित ग्रंथों का अध्ययन किया जा सकता है:
1 राजर्षि शाहू छत्रपति’ – लेखक: धनंजय कीर (एक प्रमाणिक जीवनी)।
2 कोल्हापुर चे शाहू महाराज’ – लेखक: डॉ. जयसिंहराव पवार।
3 शाहूजी महाराज के भाषण’ – संपादन: डॉ. सुनील कुमार।
4 ‘Source Material on Dr. Babasaheb Ambedkar and Rajarshi Shahu Maharaj’ – महाराष्ट्र शासन प्रकाशन।
नमो बुद्धाय, जय भीम, जय भारत, जय संविधान!

लेखक
सोहनलाल सिंगरिया
सामाजिक आर्थिक चिन्तक ब्यावर राजस्थान
