आज जब हम अपने आसपास की दुनिया को देखते हैं, तो खबरों और चर्चाओं का एक अलग ही मंजर (दृश्य) दिखाई देता है। लेकिन यदि हम थोड़ी देर के लिए आंखें बंद करके अपने मोहल्ले के लोगों को याद करें, तो सच्चाई कुछ और ही नजर आती है। वह मुस्लिम पड़ोसी जो हर खुशी-दुख में साथ खड़ा रहता है, क्या वह किसी डर या संदेह का कारण है? यह एक तरह का सामाजिक रियलिटी (वास्तविकता) चेक है, जो हमें खुद से करना चाहिए, ताकि हम सच्चाई और भ्रम के बीच फर्क समझ सकें।

हमारे समाज में एक गहरी गुफ़्तगू (बातचीत) की परंपरा रही है, जिसमें लोग दिल खोलकर एक-दूसरे के साथ जुड़ते हैं। लेकिन आजकल यह संवाद कहीं खोता जा रहा है। मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर दिखाई जाने वाली नैरेटिव (कथा) कई बार वास्तविक जीवन से मेल नहीं खाती। जब हम अपने आसपास के मुस्लिम समुदाय को देखते हैं, तो हमें वे मेहनतकश, ईमानदार और शांतिप्रिय लोग ही नजर आते हैं, जो हमारे ही जैसे जीवन जी रहे हैं।

यह बहुत दुखद है कि समाज में एक तरह की नफ़रत (घृणा) को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह नफ़रत धीरे-धीरे हमारे दिलों में जगह बना रही है और हमें एक-दूसरे से दूर कर रही है। जबकि हकीकत यह है कि हमारा समाज विविधताओं से भरा हुआ एक सुंदर सिस्टम (प्रणाली) है, जिसमें हर धर्म और जाति के लोग एक साथ मिलकर रहते हैं। इस विविधता को बनाए रखना ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।

अगर हम इतिहास की ओर देखें, तो हमें हमेशा मोहब्बत (प्रेम) और भाईचारे की मिसालें मिलती हैं। भारत की पहचान ही उसकी डाइवर्सिटी (विविधता) में निहित है। यहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी मिलकर एक साझा संस्कृति का निर्माण करते हैं। यह साझापन केवल शब्दों में नहीं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन में भी दिखाई देता है, जहां त्योहारों और खुशियों को मिलकर मनाया जाता है।

आज जरूरत है कि हम अपने भीतर की इंसानियत (मानवता) को पहचानें और उसे प्राथमिकता दें। जब हम किसी समुदाय के बारे में सुनते हैं, तो हमें अपनी समझ और अनुभव के आधार पर एनालिसिस (विश्लेषण) करना चाहिए। केवल सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करना हमें सच्चाई से दूर ले जाता है। हमें अपने आसपास के लोगों को समझने और उनके साथ जुड़ने की कोशिश करनी चाहिए।

भारत एक ऐसा देश है, जहां बराबरी (समानता) का सिद्धांत संविधान में निहित है। यह देश अपनी सेक्युलर (पंथनिरपेक्ष) पहचान के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है। यहां हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता है और यही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। हमें इस पहचान को बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए।

जब हम अपने दिल से सोचते हैं, तो हमें हर व्यक्ति में एक ख़ुलूस (सच्चाई) नजर आती है। यह सच्चाई हमें जोड़ती है और हमें एक बेहतर समाज की ओर ले जाती है। हमें अपने विचारों में पॉजिटिविटी (सकारात्मकता) लानी चाहिए, ताकि हम नफरत और भेदभाव से दूर रह सकें और एक समावेशी समाज का निर्माण कर सकें

समाज में फैलाई जा रही गलतफहमियों को दूर करने के लिए हमें एक नई सोच (विचारधारा) अपनानी होगी। यह सोच हमें सच्चाई के करीब ले जाएगी और हमें एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील बनाएगी। हमें अपने दृष्टिकोण में चेंज (परिवर्तन) लाना होगा, ताकि हम एक बेहतर और समान समाज की दिशा में आगे बढ़ सकें।

हमारा समाज तभी मजबूत होगा, जब उसमें हर व्यक्ति को सम्मान और अधिकार मिलेगा। यह तभी संभव है, जब हम अपने दिलों में अदब (सम्मान) और एक-दूसरे के प्रति समझ विकसित करें। हमें एक ऐसा प्लेटफॉर्म (मंच) बनाना होगा, जहां सभी लोग अपनी बात खुलकर रख सकें और एक-दूसरे को समझ सकें।

अंततः, हमें यह समझना होगा कि हमारा देश विविधताओं का एक सुंदर संगम है। यहां हर धर्म और संस्कृति का अपना महत्व है। हमें इस विविधता को स्वीकार करते हुए एक ऐसा समाज बनाना है, जहां अमन (शांति) और भाईचारा कायम रहे। यही हमारी सच्ची आइडेंटिटी (पहचान) है, जो हमें दुनिया में अलग बनाती है और हमें गर्व का अनुभव कराती है।

शेर:
नफ़रत की धूप में भी वो मोहब्बत के दरख़्त लगाते रहे,
हमने जाना—मुस्लिम दिल इंसानियत का उजाला फैलाते रहे।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 230966

स्रोत व संदर्भ :
जितेंद्र नरूका की फेसबुक पोस्ट से प्रेरित एवं
सामाजिक सद्भाव, व्यक्तिगत अनुभव, पड़ोस की साझी संस्कृति, भारतीय परंपरा, आपसी विश्वास, जमीनी सच्चाई, मीडिया विमर्श से अलग वास्तविक जीवन अनुभवों पर आधारित विचार।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *