आज के दौर में एक अजीब विडंबना देखने को मिलती है—अखबार पढ़ना सब चाहते हैं, लेकिन घर पर मंगवाने की पहल बहुत कम लोग करते हैं। हर पढ़ा-लिखा व्यक्ति देश-दुनिया की जानकारी रखना चाहता है, लेकिन जब हॉकर या एजेंसी वाला घर-घर जाकर अखबार शुरू करवाने की बात करता है, तो अक्सर जवाब मिलता है—“अखबार पढ़कर क्या करेंगे?”
यही वह सोच है, जो धीरे-धीरे हमारी सूचना की जड़ों को कमजोर कर रही है। विचार करने वाली बात यह है कि जब उसी घर में किसी की नौकरी लगती है, कोई पुरस्कार मिलता है या कोई सामाजिक समस्या सामने आती है, तब स्थानीय पत्रकार से कहा जाता है—“हमारी खबर छापनी है।” लेकिन क्या हमने कभी सोचा कि जिस अखबार में हम अपनी खबर देखना चाहते हैं, क्या हम उसके नियमित पाठक भी हैं? सच्चाई यह है कि हम बिना योगदान के अपेक्षा रखते हैं और यही विरोधाभास अखबार संस्कृति को कमजोर कर रहा है। समाचार पत्र, जिसे अंग्रेज़ी में News Paper कहा जाता है, केवल कागज़ का पुलिंदा नहीं है, बल्कि यह “North, East, West, South — Past and Present Events Report” यानी चारों दिशाओं की भूत और वर्तमान घटनाओं का सजीव दस्तावेज़ है। यह ज्ञान का ऐसा स्रोत है, जो न केवल सूचना देता है बल्कि सोचने, समझने और विश्लेषण करने की क्षमता भी विकसित करता है। आज जब मोबाइल और सोशल मीडिया का दौर है, तब जानकारी की बाढ़ तो आई है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न भी उतना ही बड़ा है। सोशल मीडिया पर वायरल खबरें अक्सर अधूरी या भ्रामक होती हैं, जबकि अखबार की खबरें तथ्यात्मक, संपादित और जिम्मेदार पत्रकारिता का परिणाम होती हैं। यही कारण है कि समाचार पत्र की प्रामाणिकता आज भी सर्वोपरि मानी जाती है। आर्थिक दृष्टि से देखें तो अखबार का मासिक खर्च मात्र 150 से 200 रुपये के बीच होता है—जो आज के समय में बहुत बड़ा बोझ नहीं है। विडंबना यह है कि कई लोग प्रतिदिन गुटखा, तंबाकू या अन्य अनावश्यक चीज़ों पर 200 रुपये तक खर्च कर देते हैं, लेकिन वही राशि यदि अखबार पर खर्च की जाए तो पूरे परिवार को ज्ञान और जागरूकता का खजाना मिल सकता है।
विशेष रूप से स्कूली बच्चों, कॉलेज विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए अखबार किसी वरदान से कम नहीं है। सामान्य ज्ञान, समसामयिक घटनाएं, सरकारी योजनाएं, रोजगार के अवसर, खेल, साहित्य, कृषि और उद्योग से जुड़ी जानकारी—ये सब एक ही जगह पर व्यवस्थित रूप में उपलब्ध होती हैं। सबसे बड़ी बात, अखबार पढ़ने से बच्चों की मोबाइल पर निर्भरता कम होती है और उनमें पढ़ने की आदत विकसित होती है—जो उनके बौद्धिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। गांवों और कस्बों की स्थिति तो और भी चिंताजनक है। जहां 1500–2000 घरों की आबादी, 12वीं तक के स्कूल, सैकड़ों सरकारी कर्मचारी और दर्जनों दुकानें मौजूद हैं, वहां केवल 40–50 अखबारों का आना इस बात का संकेत है कि हम सूचना के महत्व को नजरअंदाज कर रहे हैं। वहीं, कई युवा नेता और सामाजिक कार्यकर्ता समय-समय पर अपनी खबरें छपवाने के लिए पत्रकारों से संपर्क करते हैं, लेकिन खुद अखबार मंगवाने की पहल नहीं करते—यह एक गंभीर आत्ममंथन का विषय है। अगर अखबार का असली महत्व समझना हो, तो किसी सेवानिवृत्त या जागरूक बुजुर्ग को अखबार पढ़ते हुए देखिए—वे हर खबर को गहराई से, तल्लीनता के साथ पढ़ते हैं और उस पर विचार करते हैं। यह केवल पढ़ना नहीं, बल्कि समाज और देश से जुड़ने का माध्यम है। एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि हर घर में अखबार शुरू होता है, तो गांव के किसी पढ़े-लिखे बेरोजगार युवक को रोजगार का अवसर मिलता है। हॉकर के रूप में शुरुआत करके कई लोग आज राज्य और राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार बने हैं। इस तरह अखबार केवल ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि रोजगार का माध्यम भी है। आज जरूरत इस बात की है कि हम अपनी प्राथमिकताओं को पुनः निर्धारित करें। जहां एक ओर एक परिवार का इंटरनेट खर्च 1500 रुपये तक पहुंच जाता है, वहीं मात्र 150–200 रुपये में अखबार पूरे परिवार को सार्थक और विश्वसनीय जानकारी दे सकता है। इसलिए आवश्यक है कि हर परिवार यह संकल्प ले— घर में अखबार जरूर मंगवाएंगे और बच्चों को मोबाइल की लत से दूर कर ज्ञान की ओर प्रेरित करेंगे। अतः अखबार केवल खबरों का संग्रह नहीं, बल्कि समाज का आईना, लोकतंत्र का स्तंभ और जागरूक नागरिक बनने की पहली सीढ़ी है। इसे अपनाइए, पढ़िए और आगे बढ़ाइए—क्योंकि एक जागरूक समाज ही एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण करता है।

✍️ गणपत मेघवाल सामाजिक कार्यकर्ता ,नाड़सर ,भोपालगढ़, जोधपुर
मो-9928320549,ganpatwriter@gmail.com
