समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी उस अदृश्य दबाव के साथ जीवन जी रहा है, जिसे हम शोषण, असमानता और उपेक्षा के नाम से जानते हैं। वंचित समाज की मनोदशा को समझना केवल आर्थिक या सामाजिक स्थिति को समझ लेना नहीं है, बल्कि उसके भीतर पल रहे उन जटिल भावों को पहचानना है, जो उसके व्यवहार में झलकते हैं। यह एक ऐसी कैफ़ियत (स्थिति) है, जहाँ व्यक्ति अपने ही अस्तित्व से जूझता हुआ दिखाई देता है और अपने भीतर की बेबसी (लाचारी) को छिपाने के लिए बाहरी आक्रामकता का सहारा लेता है।

अक्सर देखा जाता है कि शोषित वर्ग का व्यक्ति समाज में अपनी छवि सुधारने के लिए घर के भीतर कठोरता दिखाता है। वह अपनी पत्नी और बच्चों को डांटता है, ताकि बाहर वह स्वयं को सशक्त दिखा सके। यह व्यवहार उसकी हक़ीक़त (सच्चाई) नहीं, बल्कि एक दिखावा होता है, जो उसकी अंदरूनी कमजोरी को ढकने का प्रयास करता है। यह एक प्रकार का कॉम्प्लेक्स (हीनता ग्रंथि) है, जो उसे अपनों के प्रति ही कठोर बना देता है।

महिलाओं के व्यवहार में भी यह प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जब एक महिला घर में या समाज में उपेक्षित महसूस करती है, तो वह अपनी खीझ बच्चों या परिवार के अन्य सदस्यों पर उतारती है। यह उसकी तल्ख़ी (कड़वाहट) का परिणाम होता है, जो उसे परिस्थितियों से मिलती है। समाज ने उसे जिस प्रकार से पाला-पोसा है, उसमें उसकी शख्सियत (व्यक्तित्व) को स्वतंत्र रूप से विकसित होने का अवसर ही नहीं मिला।

वंचित समाज में एक और प्रवृत्ति देखने को मिलती है—अपने ही वर्ग के लोगों को नीचा समझना। दलित होकर दलित को तुच्छ समझना, या स्त्री होकर स्त्री को कमतर आंकना, यह सब उसी मानसिकता का हिस्सा है। यह एक प्रकार का डिस्क्रिमिनेशन (भेदभाव) है, जो बाहर से भीतर आकर जड़ें जमा लेता है। व्यक्ति यह समझ नहीं पाता कि वह स्वयं उसी व्यवस्था का शिकार है, जिसका वह समर्थन कर रहा है।

बच्चों के संदर्भ में यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। जब माता-पिता अपने बच्चों की तुलना दूसरों से करते हैं, तो यह बच्चों के भीतर लो सेल्फ एस्टिम (आत्मसम्मान की कमी) को जन्म देता है। एक छोटी बच्ची का उदाहरण इस बात को स्पष्ट करता है, जो यह महसूस करती है कि शिक्षक उसे प्यार नहीं करते। लेकिन जब गहराई में देखा गया, तो यह उसकी पारिवारिक स्थिति का परिणाम था, जहाँ उसे अपनी ही बहन से कमतर महसूस कराया जाता था। यह एक प्रकार का इल्ज़ाम (आरोप) नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव है।

मनुष्य की एक बड़ी समस्या यह है कि वह अपने अनुभवों को सार्वभौमिक सत्य मान लेता है। वह अपनी फ़ितरत (स्वभाव) के अनुसार दुनिया को देखने लगता है और यही उसकी सबसे बड़ी भूल होती है। हर व्यक्ति का अनुभव अलग होता है, और यही इंडिविजुअल (व्यक्तिगत) अंतर समाज की वास्तविकता को परिभाषित करता है। लेकिन जब यह समझ विकसित नहीं होती, तो व्यक्ति दूसरों पर अपने विचार थोपने लगता है।

कमजोर व्यक्तित्व की एक खास पहचान होती है—वह अपने भावों को सीधे व्यक्त नहीं कर पाता। उसे अपनी बात मनवाने के लिए ऊंची आवाज या आक्रामक व्यवहार का सहारा लेना पड़ता है। यह एक प्रकार का लाउड (ऊँचा और आक्रामक) व्यवहार है, जो उसकी असुरक्षा को छिपाने का प्रयास करता है। वास्तव में, यह उसकी रंजिश (द्वेष) और असंतोष का परिणाम होता है।

तानाशाही प्रवृत्ति भी इसी मानसिकता का विस्तार है। जो व्यक्ति भीतर से कमजोर और डरा हुआ होता है, वह बाहरी दुनिया में अपनी ताकत का प्रदर्शन करता है। वह किसी भी प्रकार के विरोध को सहन नहीं कर पाता और उसे दबाने का प्रयास करता है। यह व्यवहार उसकी जजमेंट (निर्णय क्षमता) की कमी को दर्शाता है, जहाँ वह सही और गलत के बीच संतुलन नहीं बना पाता।

इसके विपरीत, एक मजबूत व्यक्तित्व अपने भावों को सहजता से व्यक्त कर पाता है। वह दूसरों के सामने स्वयं को वल्नरेबल (संवेदनशील और खुला) बना सकता है, जो एक कठिन लेकिन आवश्यक गुण है। किसी की प्रशंसा करना, दूसरे के व्यक्तित्व का सम्मान करना, यह सब उसी व्यक्ति के लिए संभव है, जो भीतर से संतुलित और आत्मविश्वासी हो। यह एक प्रकार की इज़्ज़त (सम्मान) है, जो संबंधों को मजबूत बनाती है।

वंचित समाज में संबंधों की जटिलता का एक और कारण है—नियंत्रण को प्रेम समझ लेना। जब एक व्यक्ति दूसरे को नियंत्रित करने की कोशिश करता है, तो वह इसे अपने अधिकार के रूप में देखता है। पुरुषों में यह प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है, जहाँ वे यह स्वीकार नहीं कर पाते कि कोई महिला उन्हें नियंत्रित कर सकती है। लेकिन यह भी एक सामाजिक संरचना का परिणाम है, जहाँ महिलाओं को पहले ही इन्फैंटिलाइज़ (बच्चे जैसा बना देना) कर दिया जाता है।

अक्सर यह देखा जाता है कि जो व्यक्ति बाहर अपमानित होता है, वह घर के भीतर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहता है। यह उसकी नफ़रत (घृणा) और कुंठा का परिणाम होता है, जो वह सुरक्षित स्थान पर निकालता है। लेकिन यह व्यवहार रिश्तों को कमजोर करता है और परिवार के भीतर तनाव को बढ़ाता है। यह एक प्रकार का एक्सपीरियंस (अनुभव) आधारित प्रतिक्रिया है, जो धीरे-धीरे आदत बन जाती है।

समाज में स्त्री की परवरिश भी इस समस्या का एक महत्वपूर्ण कारण है। उसे मानसिक रूप से कमजोर बनाए रखा जाता है, लेकिन उससे अपेक्षाएँ बहुत अधिक रखी जाती हैं। यह एक विरोधाभास है, जो उसके व्यवहार में असंतुलन पैदा करता है। वहीं, संपन्न वर्ग की महिलाओं को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता मिलती है, जिससे वे भावनात्मक रूप से अधिक स्थिर होती हैं और अनावश्यक भावनात्मक उलझनों में नहीं पड़तीं।

अंततः यह समझना आवश्यक है कि संबंधों के टिकने में केवल प्रेम ही पर्याप्त नहीं होता। व्यवहार कुशलता, सम्मान और समझदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। व्यक्ति प्रेम को भूल सकता है, लेकिन सामाजिक अपमान को नहीं। यही कारण है कि समाज में संबंधों की जटिलता बढ़ती जा रही है। वंचित समाज की मनोदशा को समझने के लिए हमें उसकी बाहरी कठोरता के पीछे छिपी आंतरिक पीड़ा को पहचानना होगा—तभी हम एक अधिक संवेदनशील और न्यायपूर्ण समाज की ओर बढ़ सकते हैं।

शेर:
भीतर की हार को छुपाने को अपनों पर ही वार हुआ,
जो खुद से हारा इंसान था, वही सबसे ज्यादा कठोर हुआ।

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।9829 2 30966

स्रोत व संदर्भ :
शैली किरण की फेसबुक पोस्ट से प्रेरित एवं
सामाजिक असमानता, वंचित वर्ग अनुभव, मनोवैज्ञानिक अध्ययन, पारिवारिक व्यवहार, लैंगिक भूमिका, आत्मसम्मान, सामाजिक दबाव, व्यक्तिगत अवलोकन, समकालीन भारतीय संदर्भ आधारित लेखन

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