लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक चिंतक एवं विश्लेषक

प्रस्तावना
धम्म की वास्तविक परिभाषा
मानवता के इतिहास में तथागत बुद्ध का प्रादुर्भाव एक ऐसी वैचारिक क्रांति थी, जिसने मनुष्य को स्वर्ग-नरक, भाग्य और अदृश्य शक्तियों की दासता से मुक्त कर उसे स्वयं के जीवन का स्वामी बनाया।

अक्सर लोग ‘धम्म’ को ‘धर्म’ (Religion) का पर्यायवाची समझ लेते हैं, जबकि बुद्ध का धम्म कोई मजहब, पंथ या कर्मकाण्डों का जाल नहीं है।

परमनिरात्मा तथागत बुद्ध के द्वारा प्रशस्त किया गया मार्ग ही धम्म है।

यह मार्ग अंधविश्वास की बैसाखियों पर नहीं, बल्कि यथार्थ की ठोस जमीन पर खड़ा है।

धम्म वह पद्धति है जो मनुष्य को अज्ञान के अंधेरे से निकालकर प्रज्ञा (Wisdom) के प्रकाश की ओर ले जाती है।

1. ईश्वर और भाग्यवाद से मुक्ति आत्म-निर्भरता का संदेश
तथागत बुद्ध ने मनुष्य को किसी काल्पनिक ईश्वर या पूर्व-निर्धारित भाग्य के भरोसे नहीं छोड़ा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि मनुष्य के दुःख और सुख का कारण कोई अलौकिक शक्ति नहीं, बल्कि उसके अपने कर्म और चित्त की अवस्था है।

अत्त दीपो भव,अपना दीपक स्वयं बनो
बुद्ध का यह उद्घोष बहुजन समाज के लिए सबसे बड़ा मंत्र है।

जब तक मनुष्य यह मानता रहेगा कि उसकी गरीबी, लाचारी या सामाजिक स्थिति किसी ‘ईश्वर’ की देन है, तब तक वह गुलामी की जंजीरें नहीं तोड़ पाएगा।

बुद्ध ने सिखाया कि संसार में दुःख है, उसका कारण (तृष्णा और अज्ञान) है, और उस दुःख का निवारण भी संभव है। यह ‘कार्य-कारण’ का सिद्धांत ही धम्म की वैज्ञानिकता
का आधार है।

2. कर्मकाण्ड बनाम आचरण: धम्म जीने की विधि है
आज समाज में धर्म के नाम पर यज्ञ, बलि, पूजा-पाठ और आडंबरों का बोलबाला है।

बुद्ध का धम्म इन सबका खंडन करता है। धम्म कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे केवल किताबों में पढ़ा जाए या जिसे सिर पर ढोया जाए।

धम्म तो जीने की एक कला है।

बुद्ध ने स्पष्ट कहा कि केवल वाद-विवाद या शास्त्रों के ज्ञान से मुक्ति नहीं मिलेगी। वास्तविक मुक्ति तभी संभव है जब मनुष्य अपने भीतर के राग (Attachment), द्वेष (Hatred) और मोह (Illusion) को समाप्त करे।

धम्म का अर्थ है
सत्य को समझना, अहंकार को त्यागना और करुणा के साथ जीवन जीना। यदि आपके आचरण में नैतिकता (शील) नहीं है, तो आपकी प्रार्थनाएँ व्यर्थ हैं।

3. आर्य अष्टांगिक मार्ग: संतुलित जीवन का आधार
बुद्ध ने मानवता को ‘आर्य अष्टांगिक मार्ग’ दिया, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 2500 साल पहले था। यह मार्ग किसी संप्रदाय का झंडा उठाने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं के परिष्कार के लिए है:

1 सम्यक दृष्टि
सत्य और असत्य के बीच भेद करने की समझ।

2 सम्यक संकल्प
मानसिक और नैतिक विकास
का दृढ़ निश्चय।

3 सम्यक वाणी
सत्य, मृदु और अर्थपूर्ण संवाद।

4 सम्यक कर्म
अहिंसा और परोपकार पर
आधारित कार्य।

5 सम्यक आजीविका
ईमानदारी और न्यायपूर्ण
तरीके से जीविकोपार्जन।

6 सम्यक व्यायाम (प्रयास)
मन के बुरे विचारों को रोकने और अच्छे विचारों को लाने का प्रयत्न।

7 सम्यक स्मृति
सजगता और जागरूकता
के साथ जीना।

8 सम्यक समाधि
चित्त की एकाग्रता और शांति।

यह अष्टांगिक मार्ग ही धम्म का जीवंत स्वरूप है।
जो इस पथ पर चलता है, वह अपने भीतर की अशुद्धियों को जलाकर
निर्मलता की ओर बढ़ता है।

4. अनात्म और प्रतीत्यसमुत्पाद: वैज्ञानिक समझ
बुद्ध का धम्म ‘अनात्म’ (Anatta) और ‘अनित्यता’ (Anicca) के सिद्धांत पर टिका है।

जिसे हम स्थायी ‘आत्मा’ या ‘मैं’ समझते हैं, वह वास्तव में परिवर्तनशील तत्वों का एक प्रवाह मात्र है। बुद्ध ने सिखाया कि संसार की हर वस्तु ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ (Dependent Origination) के नियम से बंधी है, अर्थात हर चीज किसी कारण से उत्पन्न होती है और कारण के समाप्त होने पर लुप्त हो जाती है।

जब मनुष्य “मेरा” और “मैं” की पकड़ ढीली करता है, तो उसका अहंकार नष्ट होता है।

अहंकार का नाश ही दुखों की समाप्ति का द्वार है।

यही वह ‘परमनिरात्मा’ दृष्टि है जो व्यक्ति को मानसिक गुलामी
से मुक्त करती है।

5. सामाजिक क्रांति और समतामूलक समाज
बहुजन समाज के लिए बुद्ध का धम्म केवल आध्यात्मिक शांति का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का घोषणापत्र है।

बुद्ध ने जन्म-आधारित वर्ण व्यवस्था और ऊँच-नीच के पाखंड को जड़ से उखाड़ फेंका।

उन्होंने घोषित किया
न जच्चा वसलो होति,
न जच्चा होति ब्राह्मणो।

कोई भी व्यक्ति जन्म से नीच या
जन्म से ब्राह्मण नहीं होता, वह अपने कर्मों से ही श्रेष्ठ या अधम बनता है।

बुद्ध के संघ के द्वार राजा से लेकर रंक तक और पंडित से लेकर अछूत समझे जाने वाले व्यक्ति तक, सबके लिए समान रूप से खुले थे।

धम्म मनुष्य को स्वतंत्र, विवेकशील और समतामूलक बनाता है।

यह समाज में करुणा (Compassion) और मैत्री (Metta) का संचार करता है, जिससे एक न्यायपूर्ण राष्ट्र का
निर्माण होता है।

6. चित्त की शुद्धि परिवर्तन का केंद्र बुद्ध का धम्म मनुष्य के चित्त (Mind) को केंद्र में रखता है।

यदि चित्त मलिन है, तो व्यक्ति का आचरण और समाज दोनों दूषित होंगे। बुद्ध ने सिखाया कि बाहर की दुनिया को बदलने से पहले अपनी भीतर की दुनिया को देखो।

यदि मन में घृणा है, तो समाज में हिंसा होगी।

यदि मन में करुणा है, तो समाज में शांति होगी।

धम्म हमें अपने मन को साधने की शिक्षा देता है। जब मनुष्य जागरूक होकर अपने विचारों का निरीक्षण करता है, तब वह अंधविश्वासों और कुरीतियों की बेड़ियों को स्वयं ही काट देता है।

निष्कर्ष
धम्म को जीवन में उतारें
अतः यह निर्विवाद सत्य है, कि परमनिरात्मा तथागत बुद्ध के द्वारा प्रशस्त किया गया मार्ग ही धम्म है।

यह वह मार्ग है जो मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर, हिंसा से करुणा की ओर और मानसिक दासता से निर्वाण (परम स्वतंत्रता) की ओर ले जाता है।

तथागत का धम्म किसी को डराने या लालच देने का नाम नहीं है, बल्कि यह एक ‘क्रांतिकारी जीवन-पथ’ है।

यह धम्म का झंडा उठाकर केवल गर्व करने के लिए नहीं है, बल्कि इसे अपने व्यवहार, अपनी सोच और अपने चरित्र में उतारने के लिए है।

जैसा कि कहा गया है—धम्म बोला नहीं जाता, धम्म जिया जाता है।

आज बहुजन समाज को आवश्यकता है कि वह पाखंडी कर्मकाण्डों को त्यागकर बुद्ध की वैज्ञानिक दृष्टि और बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर द्वारा दिखाए गए धम्म के मार्ग को अपनाए। तभी एक प्रबुद्ध भारत का सपना साकार होगा।
नमो बुद्धाय, जय भीम!
जय भारत, जय संविधान!

लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक चिन्तक एवं विश्लेषक

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