
लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक चिन्तक एवं विश्लेषक
प्रस्तावना
इतिहास के झरोखे से एक शाश्वत संकल्प
23 मार्च 1931 की वह धुंधली शाम भारतीय इतिहास के आकाश पर केवल एक तिथि नहीं, बल्कि शौर्य, बौद्धिकता और आत्मोसर्ग का एक देदीप्यमान नक्षत्र है।
आज 2026 में, जब भारत अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष की ओर अग्रसर है, शहीद-ए-आजम भगत सिंह की 95वीं पुण्यतिथि हमें आत्मचिंतन का एक गंभीर अवसर प्रदान करती है।
एक शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता के दृष्टिकोण से, भगत सिंह का व्यक्तित्व मात्र एक सशस्त्र विद्रोही का नहीं था; वे एक युगद्रष्टा थे, जिन्होंने अपनी अल्पायु में ही वह वैचारिक आधारशिला रखी, जिस पर आधुनिक, प्रगतिशील और समतामूलक भारत की भव्य इमारत खड़ी की जा सकती है।
भगत सिंह का जीवन हमें यह सिखाता है कि “क्रांति” केवल व्यवस्था परिवर्तन नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना का परिष्कार है।
उनका मानना था कि जब तक विचार स्पष्ट न हों, तब तक क्रिया निष्फल है।
वंशानुगत देशभक्ति और प्रारंभिक जीवन
भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907 को अविभाजित पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गाँव में हुआ था। उनके जन्म के क्षण से ही उनके जीवन में संघर्ष और राष्ट्रप्रेम का समावेश हो गया था।
जिस दिन उनका जन्म हुआ, उसी दिन उनके पिता सरदार किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह जेल से रिहा हुए थे, जिसके कारण उनकी दादी ने उन्हें ‘भागों वाला’ (भाग्यशाली) पुकारा। जो आगे चलकर भगत सिंह नाम पड़ा
माता-पिता और पारिवारिक प्रभाव
उनके पिता सरदार किशन सिंह और माता विद्यावती कौर ने उन्हें बचपन से ही वह नैतिक बल प्रदान किया, जो किसी भी महान व्यक्तित्व के निर्माण के लिए आवश्यक है।
उनके चाचा अजीत सिंह ने अंजुमन-ए-मुहिब्बान-ए-वतन संस्था बनाई थी और पगड़ी संभाल जट्टा जैसे किसान आंदोलनों का नेतृत्व किया था। ऐसे क्रांतिकारी परिवेश में पले-बढ़े बालक के मन में बचपन से ही यह बात बैठ गई थी कि जीवन की सार्थकता केवल निजी सुखों में नहीं, बल्कि राष्ट्र की वेदी पर सर्वस्व अर्पण करने में है।
शिक्षा और बौद्धिक आधार
भगत सिंह की शिक्षा महज प्रमाणपत्रों को हासिल करने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि ज्ञान की वह खोज थी जो सत्य के निकट ले जाती है। उन्होंने लाहौर के दयानंद एंग्लो-वैदिक (DAV) स्कूल में पढ़ाई की और बाद में नेशनल कॉलेज, लाहौर में प्रवेश लिया।
नेशनल कॉलेज उस समय बौद्धिक विमर्श और राष्ट्रवाद का केंद्र था।
यहाँ उन्होंने न केवल अकादमिक विषयों को पढ़ा, बल्कि विश्व इतिहास, समाजशास्त्र और दर्शनशास्त्र का गहन अध्ययन किया।
वे उर्दू, हिंदी, पंजाबी, अंग्रेजी और संस्कृत के मर्मज्ञ थे। उनकी शिक्षा ने उन्हें यह सिखाया कि बंदूकों से अधिक शक्तिशाली विचार होते हैं।
उन्होंने कॉलेज के दिनों में ही नौजवान भारत सभा’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य युवाओं को सांप्रदायिकता से दूर रखकर राष्ट्र निर्माण में लगाना था।
ऐतिहासिक संदर्भ
सांडर्स वध और प्रतिरोध की अग्नि
भगत सिंह के जीवन की वह ऐतिहासिक घटना जिसने उनके नाम को घर-घर में पहुँचा दिया, वह थी ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जे.पी. सांडर्स का वध। 1928 में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय की मृत्यु ने भगत सिंह के हृदय में प्रतिशोध और परिवर्तन की ज्वाला जला दी।
यद्यपि भगत सिंह व्यक्तिगत हिंसा के समर्थक नहीं थे, परंतु राष्ट्र के स्वाभिमान की रक्षा के लिए उन्होंने 17 दिसंबर, 1928 को सांडर्स को मारकर यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय युवा अब और अपमान सहने के लिए तैयार नहीं है।
इसके पश्चात उनका भेष बदलकर लाहौर से निकलना उनकी रणनीतिक निपुणता का प्रमाण था।
नास्तिकता: एक सचेत चुनाव और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
भगत सिंह का सबसे गंभीर और बौद्धिक पक्ष उनकी नास्तिकता थी, जिसे उन्होंने जेल की कालकोठरी में मैं नास्तिक क्यों हूँ?
शीर्षक के अंतर्गत लिपिबद्ध किया।
यह लेख केवल ईश्वर के अस्तित्व को नकारना नहीं था, बल्कि यह मानव बुद्धि की स्वायत्तता की घोषणा थी।
1. तर्क की सर्वोच्चता और संशयवाद
भगत सिंह ने तर्क दिया कि मनुष्य को किसी भी बात को केवल इसलिए स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए क्योंकि वह किसी धर्मग्रंथ में लिखी है या पूर्वजों द्वारा कही गई है।
उन्होंने लिखा, “जो व्यक्ति प्रगति के लिए खड़ा है, उसे हर पुरानी बात की आलोचना करनी होगी, उसमें अविश्वास करना होगा और उसे चुनौती देनी होगी।” उनका मानना था कि तर्क और आलोचना एक क्रांतिकारी के दो सबसे
अनिवार्य गुण हैं।
2. ईश्वर की अवधारणा और सामाजिक अन्याय
उन्होंने एक दार्शनिक प्रश्न उठाया, यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान और न्यायप्रिय है, तो संसार में इतनी विषमता, निर्धनता और पीड़ा क्यों है? क्या वह इन सब दुखों को बैठकर देखता रहता है?
भगत सिंह ने इसे “ईश्वर की अक्षमता” या “अस्तित्वहीनता” माना।
उनके अनुसार, ईश्वर का विचार उन लोगों के लिए एक मानसिक सहारा हो सकता है जो कमजोर हैं, लेकिन एक क्रांतिकारी के लिए यह विचार एक बेड़ी है जो उसे भाग्यवादी बनाता है।
3. वैज्ञानिक चेतना और प्रकृतिवाद
भगत सिंह का दृष्टिकोण पूर्णतः वैज्ञानिक था। उन्होंने मनुष्य को प्रकृति की ही एक परिष्कृत कृति माना। उनके लिए प्रकृति ही सत्य थी और विज्ञान ही उस सत्य को समझने का मार्ग। उन्होंने मृत्यु के भय को भी तर्क से परास्त किया।
जहाँ अन्य लोग फांसी से पहले ईश्वर का नाम लेते हैं, वहाँ भगत सिंह ने मार्क्स और लेनिन के विचारों का चिंतन किया। उनकी नास्तिकता ‘मानवता’ के प्रति उनके अगाध प्रेम से उपजी थी, जहाँ मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का विधाता है, न कि किसी काल्पनिक शक्ति की कठपुतली।
सामाजिक न्याय और जातिवाद पर प्रहार
एक देशभक्त और दूरदर्शी राष्ट्रभक्त के रूप में भगत सिंह ने भारतीय समाज की सबसे बड़ी बुराई जातिवाद’ और छुआछूत को बहुत पहले पहचान लिया था।
उनके लेख ‘अछूत का सवाल
में जो पीड़ा और आक्रोश झलकता है, वह आज भी हमें आईना दिखाता है।
1. सामाजिक समानता की अनिवार्यता
भगत सिंह ने स्पष्ट कहा कि जब तक हम अपने ही भाइयों को नीच कहकर दुत्कारेंगे, तब तक हम अंग्रेजों से आजादी मांगने के हकदार नहीं हैं। उन्होंने इस विरोधाभास पर प्रहार किया कि हम कुत्तों को अपनी गोद में बिठा सकते हैं, लेकिन एक इंसान का स्पर्श हमें अपवित्र कर देता है।
वे मानते थे कि जाति व्यवस्था श्रम का विभाजन नहीं, बल्कि श्रमिकों का विभाजन है, जो समाज को भीतर से खोखला कर रही है।
2. आत्मसम्मान और संगठन
उन्होंने दलित और शोषित वर्गों का आह्वान करते हुए कहा था कि उन्हें अपनी मुक्ति के लिए स्वयं उठना होगा। वे केवल दया के पात्र नहीं हैं, बल्कि वे समाज की आधारशिला हैं।
भगत सिंह का विचार था कि जब तक सामाजिक ढांचा लोकतांत्रिक नहीं होगा, तब तक राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।
उनके लिए सामाजिक न्याय का अर्थ था, जन्म के आधार पर विशेषाधिकारों का पूर्ण अंत।
3. धर्मनिरपेक्षता और बंधुत्व
वे सांप्रदायिकता को सबसे बड़ा शत्रु मानते थे। उनका स्पष्ट मत था कि धर्म व्यक्तिगत विश्वास का विषय होना चाहिए और उसे राजनीति या सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
दंगे और झगड़े हमें उस असली लड़ाई से भटकाते हैं जो गरीबी और गुलामी के खिलाफ है।
जातिवाद के विरुद्ध जंग
आज भी यदि विवाह, सामाजिक मेलजोल या अवसरों में जाति बाधक बनती है, तो हम भगत सिंह के सपनों से दूर हैं। 2026 का भारत तभी विकसित कहलाएगा जब प्रत्येक नागरिक की पहचान उसकी प्रतिभा और मानवीय मूल्यों से होगी, न कि उसके सरनेम से।
समानता का अर्थ: केवल कानून के समक्ष समानता पर्याप्त नहीं है, बल्कि अवसर की समानता और आर्थिक न्याय भी आवश्यक है।
भगत सिंह एक ऐसे भारत का सपना देखते थे जहाँ किसी बच्चे को उसकी गरीबी के कारण शिक्षा से वंचित न रहना पड़े।
बंधुत्व और सांप्रदायिक सदभाव
आधुनिक भारत को घृणा और विभाजन की राजनीति से ऊपर उठकर उस ‘मानवतावाद’ को अपनाना होगा जिसके लिए भगत सिंह जिए और मरे।
प्रकृति ने हमें जो विविधता दी है, वह हमारी कमजोरी नहीं,
शक्ति बननी चाहिए।
विचारों की अमरता और हमारा दायित्व
23 मार्च 1931 को फांसी के फंदे पर झूलते समय भगत सिंह की आयु मात्र 23 वर्ष, 5 महीने और 23 दिन थी। उन्होंने फांसी को गले लगाकर यह सिद्ध कर दिया कि विचारों को मारा नहीं जा सकता। वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन वे मेरे विचारों को नहीं मार सकते। वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, लेकिन वे मेरी आत्मा को नहीं कुचल पाएंगे।
हमारे लिए भगत सिंह एक ऐसा प्रतीक हैं, जो हमें निरंतर याद दिलाते हैं कि शांत बैठकर अन्याय सहना भी एक अपराध है।
हमें एक ऐसा समाज बनाना है जहाँ वैज्ञानिक चेतना का प्रकाश हो, जहाँ तर्क अंधविश्वास पर भारी पड़े, और जहाँ ‘मनुष्यता’ ही एकमात्र धर्म हो।
एक शिक्षाविद के रूप में, मेरा मानना है कि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ जब भगत सिंह के ‘नास्तिकता’ के साहस और ‘सामाजिक न्याय’ के संकल्प को पढ़ेंगी, तभी एक सचेत राष्ट्र का निर्माण होगा। प्रकृति ने हमें जो जीवन दिया है, उसे दूसरों के अधिकारों की रक्षा में लगाना ही सबसे बड़ा इंकलाब है शहीद भगत सिंह अमर रहें!
इंकलाब जिंदाबाद!
लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक चिन्तक एवं विश्लेषक
