
सपनों का भारत, अपमानित श्रम और विश्वगुरु बनने की अधूरी और खोखली महत्वाकांक्षा?
भारतीय समाज को आईना दिखाने के लिए किसी विदेशी उदाहरण की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए, लेकिन इतिहास कभी-कभी बाहर से आकर हमें खुद को समझने का मौका देता है। अब्राहम लिंकन की वह प्रसिद्ध घटना, जब संसद में उनके पिता के पेशे को नीचा दिखाने की कोशिश की गई, केवल अमेरिका की कहानी नहीं है। वह हर उस समाज के लिए रिफ़्लेक्शन (आत्मचिंतन) है, जहाँ श्रम को अपमान और जन्म को सम्मान से जोड़ा जाता है। लिंकन ने अपने उत्तर में जिस आत्मसम्मान और इज़्ज़त (सम्मान) के साथ श्रम का पक्ष लिया, वह किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरी मानवीय चेतना की जीत थी।
लिंकन के उस उत्तर से “डिग्निटी ऑफ लेबर” की कॉन्सेप्ट (अवधारणा) सामने आई, जिसने अमेरिकी समाज की दिशा बदल दी। वहाँ काम कोई शर्म की चीज़ नहीं बना, बल्कि पहचान बन गया। इसके उलट भारत में श्रम आज भी सामाजिक हैसियत (ओहदा) का पैमाना नहीं बन सका। यहाँ सवाल यह नहीं कि आप क्या करते हैं, सवाल यह है कि आप किस जाति में पैदा हुए। यही सोच भारतीय समाज को भीतर से कमजोर करती है।
भारत में खेत में काम करने वाला किसान, नाली साफ करने वाला सफाईकर्मी, ईंट ढोने वाला मज़दूर—ये सब हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन सामाजिक सम्मान के पैमाने पर सबसे नीचे। यहाँ जो जितना पसीना बहाता है, उसे उतना ही अंडरवैल्यूड (कम आंका हुआ) माना जाता है। यह केवल आर्थिक अन्याय नहीं, बल्कि मानसिक जुल्म (अत्याचार) है, जो पीढ़ियों से चला आ रहा है।
विडंबना यह है कि भारत का संविधान समानता की बात करता है, लेकिन समाज की मेंटैलिटी (मानसिकता) आज भी सामंती बनी हुई है। जो खुद हाथ से काम करता है, उसे “छोटा” कहा जाता है और जो श्रम से भागता है, उसे “बड़ा”। यही कारण है कि यहाँ सफाई करने वाला गंदा माना जाता है और गंदगी फैलाने वाला सभ्य। यह सामाजिक तज़ाद (विरोधाभास) हमें आगे बढ़ने नहीं देता।
अमेरिका में लोग गर्व से अपने पेशे को पहचान बनाते हैं—वहीं भारत में लोग अपने काम को छिपाने की कोशिश करते हैं। यहाँ नाम के आगे जाति जोड़ना स्टेटस (प्रतिष्ठा) माना जाता है, जबकि काम जोड़ना अपमान। यह सोच नवाचार, उद्यमिता और आत्मनिर्भरता की सबसे बड़ी दुश्मन है। जब तक श्रम को सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक “मेक इन इंडिया” जैसे नारे केवल नाराज़ (खोखले शब्द) बनकर रहेंगे।
हम विश्वगुरु बनने की बात करते हैं, लेकिन हमारे समाज में श्रमिक आज भी हाशिये पर है। बिना श्रम के सम्मान के कोई भी देश सुपरपावर (महाशक्ति) नहीं बन सकता। भारत की असली समस्या संसाधनों की नहीं, बल्कि सोच की है। जब तक श्रम करने वाले को सामाजिक वक़ार (गरिमा) नहीं मिलेगी, तब तक विकास केवल आंकड़ों में रहेगा, ज़मीन पर नहीं।
अब समय आ गया है कि भारत भी लिंकन की तरह साफ शब्दों में कहे—काम छोटा नहीं होता, सोच छोटी होती है। श्रम का अपमान दरअसल राष्ट्र का अपमान है। अगर हमें सच में एक शक्तिशाली, समतामूलक और आत्मसम्मानी भारत चाहिए, तो हमें अपनी इस फ़ितरत (स्वभाव) को बदलना होगा। वरना हम सपने देखते रहेंगे और दुनिया आगे निकलती ?
