भूमिका
आजादी के दशकों बाद भी जब हम अपने महान देश भारत की ओर देखते हैं, तो दिल में एक अजीब सी कसक और बेचैनी उठती है। जिस भारत की परिकल्पना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी—एक ऐसा देश जहाँ हर नागरिक भूखा न सोए, जहाँ बच्चों के हाथों में किताबों की तख्तियाँ हों, अस्पतालों में गरीबों को इलाज मिले और युवाओं के सपनों को उड़ान भरने के लिए रोजगार के पंख मिलें—आज वह देश अपनी ही बनाई हुई कुरीतियों की दलदल में फँसता नजर आ रहा है। यह समय सिर्फ सरकारों को कोसने का नहीं है, बल्कि हम सभी को शीशे के सामने खड़े होकर खुद से यह सवाल पूछने का है कि क्या हमने अपने मताधिकार और लोकतंत्र के साथ न्याय किया है? आज देश की जो दुर्दशा हो रही है, उसके लिए सिर्फ राजनेता ही दोषी नहीं हैं, बल्कि कहीं न कहीं हम आम जनता की भूल और हमारी खामोशी भी उतनी ही जिम्मेदार है।

प्रजातंत्र का यह सीधा और अकाट्य नियम है कि जैसी जनता होती है, वैसे ही उसके प्रतिनिधि और सरकार के मुखिया होते हैं। अगर समाज में जात-पात और धर्म का जहर घुला होगा, तो संसद और विधानसभाओं में पहुँचने वाले चेहरे भी उसी जहर का प्रतिनिधित्व करेंगे। जब तक हम जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा की संकीर्ण दीवारों से बाहर नहीं निकलेंगे, तब तक देश की मूल समस्याओं का समाधान होना नामुमकिन है। आज सबसे बड़ा संकट यही है कि आम नागरिक ने मुद्दों पर सोचना छोड़ दिया है। चुनाव आते ही हमारे जज्बात भड़का दिए जाते हैं, कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर। और हम भावनाओं के ज्वार में बहकर अपने असल मुद्दों को भूल जाते हैं।
सांप्रदायिकता और जातिवाद इस देश के लिए किसी दीमक की तरह हैं जो अंदर ही अंदर इसे खोखला कर रहे हैं। जब एक इंसान मंदिर और मस्जिद के झगड़े में उलझा होता है, या फिर अपनी जाति की श्रेष्ठता साबित करने में अपनी ऊर्जा नष्ट कर रहा होता है, तब वह यह भूल जाता है कि महंगाई का बोझ उसकी भी रसोई पर उतना ही भारी पड़ रहा है जितना किसी दूसरे का। क्या गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमत किसी विशेष जाति या धर्म को देखकर बढ़ती है? क्या बेरोजगारी किसी एक समुदाय के युवाओं को देखकर दरवाजे पर दस्तक देती है? अस्पताल की कतार में खड़े होकर जब कोई गरीब तड़पता है, तो क्या उसकी बीमारी उसकी जाति पूछकर उसे दर्द देती है? बिल्कुल नहीं। फिर भी हम इन बुनियादी सच्चाइयों से आँखें मूंदकर उन नारों के पीछे भागते हैं जो आखिरकार-हमारे ही बच्चों का भविष्य निगल जाते हैं।

क्षेत्रीयतावाद का रोग भी हमारे राष्ट्र की एकता को कमजोर कर रहा है। ‘हम और वे’ की यह भावना हमें एक मजबूत राष्ट्र के रूप में उभरने से रोकती है। जब तक हम खुद को पहले भारतीय और बाद में किसी क्षेत्र विशेष का निवासी नहीं मानेंगे, तब तक देश के विकास में एकरूपता नहीं आ सकती। एक राज्य का नागरिक दूसरे राज्य के नागरिक को दुश्मन की नजर से देखने लगे, तो यह किसी बाहरी ताकत से ज्यादा खतरनाक स्थिति है। अलगाव की यह मानसिकता हमारे लोकतंत्र की जड़ें काट रही है।

इन तमाम बुराइयों से भी ज्यादा खतरनाक आज एक और नया चलन बन गया है, और वह है मुफ्त की रेवड़ियों का लोभ-लालच। यह सच है कि देश में गरीबों और जरूरतमंदों की बड़ी संख्या है, और कल्याणकारी योजनाएं होना सरकार का दायित्व है। लेकिन जब योजनाओं के नाम पर नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय स्थायी रूप से आश्रित और अक्षम बना दिया जाता है, तो वह देश की अर्थव्यवस्था और समाज दोनों के लिए आत्मघाती साबित होता है। थोड़ा सा अनाज, कुछ मुफ्त की चीजें या तात्कालिक लाभ के चक्कर में जब जनता अपने भविष्य का सौदा कर लेती है, तो वह अपनी रीढ़ की हड्डी खुद तोड़ देती है। मुफ्त की रेवड़ियों का यह लालच असल में जनता को कमजोर करने का एक षड्यंत्र है, ताकि वह अपने हक की बड़ी लड़ाइयां लड़ना भूल जाए।
जब जनता इन तुच्छ प्रलोभनों और भावनात्मक मुद्दों में उलझ जाती है, तब शासन करने वालों की जवाबदेही खत्म हो जाती है। परिणाम यह होता है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सुरक्षा जैसे गंभीर विषय हाशिए पर चले जाते हैं। आज हमारे देश के सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छिपी नहीं है, जहाँ गरीबों के बच्चे बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। बेहतर शिक्षा अब आम आदमी की पहुँच से बाहर होती जा रही है, और उसे निजी संस्थानों के हवाले किया जा रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं का हाल यह है कि एक गंभीर बीमारी आ जाने पर पूरा परिवार कर्ज के बोझ तले दब जाता है, जमीन-जायदाद बिक जाती है। हमारे देश के युवा आज डिग्री हाथ में लेकर दर-दर भटक रहे हैं, क्योंकि रोजगार के सृजन पर ठोस काम करने के बजाय चुनावी मौसम में वादों के झुनझुने थमा दिए जाते हैं। और बात जब सुरक्षा की आती है, तो कानून व्यवस्था की कमजोरियाँ हर रोज किसी न किसी की चीख बनकर सामने आती हैं।

लेकिन इन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन विषयों पर संसद से लेकर सड़क तक सवाल कौन पूछेगा? क्या राजनेता खुद आगे आकर अपनी नाकामी स्वीकार करेंगे? कभी नहीं। लोकतंत्र में जनता ही असली पहरेदार होती है। यदि जनता ही मुद्दों से भटक जाएगी, तो राजनेताओं से सवाल कौन पूछेगा? अगर आज हम शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और रोजगार पर सवाल उठाना बंद कर देंगे, तो सत्ता में बैठे लोग निरंकुश हो जाएंगे।
यही वह मोड़ है जहाँ हमें अपनी समीक्षा करनी होगी। हमें यह समझना होगा कि हम सांप्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रीयतावाद, लोभ-लालच और मुफ्त की रेवड़ियों से जितनी दूर रहेंगे, हमारा समाज उतना ही मजबूत और सुखी होगा। जितनी जल्दी हम इन फालतू के बंधनों को तोड़कर बाहर आएंगे, उतनी ही जल्दी हम अपने जनप्रतिनिधियों की कॉलर पकड़कर उनसे पूछ सकेंगे कि हमारे बच्चों के लिए स्कूल क्यों नहीं बने, हमारे युवाओं को रोजगार क्यों नहीं मिला, और अस्पताल में दवाइयां क्यों नहीं हैं।

समापन
यदि आज हमने इस आत्ममंथन को टाल दिया, यदि आज भी हम अपनी आँखें मूंदे रहे, तो इस देश को नीलाम होने से कोई नहीं बचा सकता। देश की बर्बादी बाहर के दुश्मनों से नहीं, बल्कि हमारी अपनी आंतरिक मूर्खता और उदासीनता से होगी। प्रजातंत्र कोई भीख में मिलने वाली चीज नहीं है, यह एक जिम्मेदारी है। यदि हम अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। समय अभी भी है, संभलने का और एकजुट होकर अपने असली अधिकारों के लिए खड़े होने का। फैसला अब जनता के हाथ में है कि वह बिकाऊ बनना चाहती है या फिर इस देश की भाग्यविधाता।
शैर
“रहबर की सियासत ने ये क्या दौर निकाला है,
खुद बिकने को बेताब यहाँ खुद का हवाला है।”


संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)।

स्रोत और संदर्भ:
यह आलेख समकालीन भारतीय राजनीति और सामाजिक व्यवस्था के संकट पर आधारित एक स्वतंत्र वैचारिक टिप्पणी है।

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