“बेरोज़गार आदमी का कोई त्योहार नहीं होता,ये गरीबी है दोस्त इसका कोई ऐतबार नहीं होता! — गरीबी का सबसे कड़वा सच है।बेरोज़गार आदमी का कोई त्योहार नहीं होता”—यह पंक्ति किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की खामोश तहरीर (लिखित पुकार) है। जब चारों ओर रोशनी, सजावट और सेलिब्रेशन (उत्सव) का शोर होता है, तब एक बेरोज़गार व्यक्ति के भीतर सन्नाटा उतर आता है। उसके लिए त्योहार कैलेंडर की तारीख़ भर है, जेब की हकीकत नहीं। बाज़ार की चमक उसकी आँखों में चुभती है, क्योंकि वह जानता है कि यह रौनक उसके हिस्से की नहीं। वह भीड़ में शामिल तो होता है, पर भीतर से अलग-थलग रहता है। उसकी मुस्कान उधार की होती है और चिंता असली।”बेरोज़गारी आत्मसम्मान पर सबसे गहरी चोट करती है। लगातार असफल प्रयास इंसान को भीतर से मायूसी (निराशा) की तरफ धकेलते हैं। हर इंटरव्यू के बाद लौटते कदमों में रिजेक्शन (अस्वीकृति) की टीस होती है। वह घर आकर बच्चों की आँखों में उम्मीद देखता है और खुद से नज़रें चुरा लेता है। त्योहार की आहट उसके लिए खुशी नहीं, एक और परीक्षा बन जाती है। वह सोचता है—क्या इस बार भी वादे अधूरे रहेंगे?*गरीबी का स्वभाव अनिश्चित होता है; इसका कोई एतबार (विश्वास) नहीं। आज जो थोड़ा है, कल वह भी न रहे—यह डर हर समय साथ चलता है। जब जेब खाली हो और मन में इनसिक्योरिटी (असुरक्षा) भरी हो, तब दीयों की लौ भी फीकी लगती है। बच्चे पटाखों की बात करते हैं, पत्नी नए कपड़ों की, और वह राशन की सूची गिनता है। उसके लिए त्योहार खर्चों का हिसाब है, खुशियों का नहीं।*समाज अक्सर बेरोज़गार को आलसी मान लेता है, जबकि सच यह है कि वह रोज़ संघर्ष करता है। उसकी जद्दोजहद (संघर्ष) किसी को दिखाई नहीं देती। वह सुबह उम्मीद के साथ निकलता है, शाम को थककर लौटता है। हर जगह अप्लिकेशन (आवेदन) भरता है, पर जवाब कम ही आते हैं। त्योहार पर रिश्तेदारों के सवाल उसके घाव कुरेदते हैं—“कुछ काम मिला?” वह मुस्कुरा देता है, पर भीतर से टूटता जाता है।*परिवार की जिम्मेदारियाँ सबसे भारी बोझ बन जाती हैं। बूढ़े माता-पिता की दवाइयाँ, बच्चों की फीस, घर का किराया—सब कुछ उसकी चिंता बढ़ाते हैं। यह फिक्र (चिंता) उसे रात भर जगाए रखती है। त्योहार का बजट (व्यय योजना) बनाते-बनाते वह समझ जाता है कि कुछ इच्छाएँ फिर टल जाएँगी। वह अपनी जरूरतें सबसे अंत में रखता है, क्योंकि उसे परिवार की आँखों की चमक बचानी है।*बच्चों की मासूमियत सबसे ज्यादा चुभती है। जब वे उम्मीद से कहते हैं—“इस बार कुछ खास करेंगे ना?”—तो उसका दिल तड़प (पीड़ा) उठता है। वह जानता है कि घर की रियलिटी (वास्तविकता) अलग है। फिर भी वह उन्हें निराश नहीं करना चाहता। कई बार वह छोटी-सी चीज़ लाकर भी त्योहार मनाने की कोशिश करता है, ताकि बच्चों के मन में अभाव की स्थायी छाप न रह जाए।”बेरोज़गारी केवल आर्थिक नहीं, मानसिक संकट भी है। धीरे-धीरे भीतर खलिश (चुभन) घर कर जाती है। आत्मविश्वास गिरता है और कॉन्फिडेंस (आत्मविश्वास) डगमगाने लगता है। वह खुद को समाज से अलग-थलग महसूस करता है। त्योहारों की भीड़ में भी उसे अपनी कमी का एहसास होता है। उसे लगता है जैसे दुनिया आगे बढ़ रही है और वह पीछे छूट गया है।*कई बार व्यवस्था की कमियाँ भी इस स्थिति को जन्म देती हैं। अवसर सीमित हों और उम्मीदें असीमित, तो असंतुलन बढ़ता है। यह सामाजिक नाइंसाफी (अन्याय) व्यक्ति को तोड़ देती है। जब रोजगार का सिस्टम (प्रणाली) निष्पक्ष न हो, तब योग्य लोग भी हताश हो जाते हैं। त्योहार की रोशनी तब तक अधूरी है, जब तक हर हाथ को काम और हर घर को सम्मान न मिले।*फिर भी आशा की एक लौ जलती रहती है। हर असफलता के बाद वह फिर कोशिश करता है। उसके भीतर एक उम्मीद (आशा) है कि अगला दिन बेहतर होगा। वह नए ऑपर्च्युनिटी (अवसर) की तलाश में रहता है। त्योहार उसके लिए भले अधूरा हो, पर सपने अभी भी जिंदा हैं। यही जिद उसे हारने नहीं देती।*अंततः सवाल केवल रोजगार का नहीं, मानवीय संवेदना का है। जब समाज में हमदर्दी (सहानुभूति) होगी और सहयोग का सपोर्ट (सहारा) मिलेगा, तब कोई भी व्यक्ति त्योहार से वंचित नहीं रहेगा। जरूरत है कि हम बेरोज़गारी को कलंक नहीं, चुनौती समझें। जिस दिन हर हाथ को काम और हर दिल को सम्मान मिलेगा, उस दिन यह पंक्ति बदल जाएगी। तब त्योहार सच में सबका होगा—और गरीबी का अंधेरा केवल एक पुरानी याद रह जाएगा।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी रिटायर डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
