*आरक्षणीय हकों का खात्मा और ठेकेदारी प्रथा के साए में पिसता हुआ लाचार बहुजन समाज।**भूमिका:* फाइलों की चमक और बस्तियों का अंधेराआज जब देश की राजधानी में बैठकर नीति-निर्माता चमकती हुई फाइलों पर हस्ताक्षर करते हैं, और कागजों पर विकास के बड़े-बड़े आंकड़े गढ़े जाते हैं, तब शायद ही किसी ने उन आंसुओं की गिनती की होगी जो हर शाम देश के किसी कोने में चूल्हा न जलने पर चुपचाप बह जाते हैं। भारतीय रेलवे, जो इस देश की जीवनरेखा कही जाती है, और अन्य तमाम केंद्रीय सरकारी विभाग—जो कभी सामाजिक न्याय और समानता के मंदिर हुआ करते थे—आज धीरे-धीरे बहुजन, दलित, आदिवासी और शोषित-वंचित समाज के युवाओं के सपनों के कत्लगाह बनते जा रहे हैं।आज सरकारी महकमों में सीधी और पक्की भर्तियों के दरवाजे बंद करके ‘ठेका प्रथा’ (Outsourcing) का ऐसा नागिन जैसा फन फैला दिया गया है, जिसने एक झटके में संविधान द्वारा दिए गए आरक्षण के अधिकारों को लील लिया है। यह सिर्फ रोजगार छिन जाने का मामला नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से वंचित रहे एक पूरे समाज के आत्मसम्मान, मानसिक शांति और भविष्य की उम्मीदों पर सीधा हमला है। 1. *आरक्षण का खात्मा:*आंबेडकर के सपनों और संविधान की पीठ पर छुरा*बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने हमें संविधान देते समय यह उम्मीद बंधाई थी कि सरकारी नौकरियां सिर्फ आजीविका का साधन नहीं हैं, बल्कि यह सदियों से गुलाम बनाए गए समाज को मुख्यधारा में लाने, उन्हें बराबरी का रुतबा देने और सामाजिक लोकतंत्र स्थापित करने का एक मजबूत जरिया हैं। लेकिन आज, देश की केंद्र सरकार ने एक सुनियोजित साजिश के तहत इस दरवाजे को हमेशा के लिए बंद कर दिया है।रेलवे स्टेशनों पर पटरियां सुधारने से लेकर, बड़े-बड़े दफ्तरों में फाइलें ढोने तक, और सरकारी अस्पतालों में मरीजों की सेवा करने वाले हाथों तक—हर जगह पक्की नौकरियों की जगह ‘ठेके के मजदूर’ थोप दिए गए हैं। जब भर्ती ही ठेकेदार के जरिए होगी, तो वहां आरक्षण के प्रावधान कहां से लागू होंगे? यह सरकार का प्रत्यक्ष रूप से वह षड्यंत्र है जिसके तहत वह बिना किसी संवैधानिक कानून को बदले, पिछले दरवाजे से बहुजन समाज के आरक्षण के अधिकार को खत्म कर रही है। क्या यह देश के संविधान के साथ सीधा विश्वासघात नहीं है?2. “*कल क्या होगा?” का अंतहीन डर और अंदर ही अंदर घुटता इंसान*एक नियमित कर्मचारी के लिए सुबह का सूरज एक नया अवसर लेकर आता है, लेकिन एक ठेका मजदूर के लिए हर सुबह कलेजे पर एक भारी पत्थर लेकर उगती है। रेलवे और अन्य केंद्रीय विभागों में काम करने वाला हमारा बहुजन भाई जब सुबह घर से निकलता है, तो उसके दिल में एक अनकहा खौफ होता है कि पता नहीं आज शाम उसका ठेकेदार उसे काम से निकाल देगा या नहीं।हर महीने की आखिरी तारीख और हर नए टेंडर के आने की सुगबुगाहट इन परिवारों के लिए किसी मौत के परवाने से कम नहीं होती। यह निरंतर बनी रहने वाली अनिश्चितता इंसान को बाहर से भले ही जिंदा रखे, लेकिन अंदर से बिल्कुल खोखला कर देती है। पेट की आग और भविष्य के अंधकार के बीच पिसता हुआ यह इंसान रात-रातभर जागकर सिर्फ यही सोचता है कि अगर कल नौकरी चली गई, तो उसके बच्चों का क्या होगा?3. *परिवार, जिम्मेदारियां और डिप्रेशन की अंधी खाई*जब हाथ में कोई कानूनी सुरक्षा न हो, और जेब में कल का कोई भरोसा न हो, तब एक पिता, एक भाई या एक बेटे होने का फर्ज निभाना सबसे बड़ी सजा बन जाता है। बहुजन समाज के इन ठेका मजदूरों के घरों में जब कोई बच्चा अपनी स्कूल की फीस मांगता है, या घर की बुजुर्ग मां अपनी दवा के लिए कराहती है, तो उस मजदूर की बेबसी का अंदाजा कोई सत्ताधीश नहीं लगा सकता।किराए के मकान का मालिक हर महीने दरवाजे पर खड़ा होता है और सरकार आंखें मूंदकर बैठी रहती है। इस आर्थिक लाचारी और मानसिक दबाव (Anxiety) ने लाखों युवाओं को गहरे डिप्रेशन के दलदल में धकेल दिया है। कई बार तो तनाव इतना बढ़ जाता है कि इंसान आत्महत्या तक के लिए मजबूर हो जाता है। सरकार के एसी कमरों में बैठे बाबुओं को क्या कभी इन गरीब परिवारों की चीखें सुनाई नहीं देतीं?4. *दोयम दर्जे का अहसास और घुटती हुई आवाज़*समान या उससे भी कहीं अधिक कठिन शारीरिक श्रम करने के बावजूद, जब एक ठेका मजदूर को यह बार-बार महसूस कराया जाता है कि वह सिर्फ एक ‘अस्थायी वस्तु’ है, तो उसके आत्मसम्मान पर ऐसी गहरी चोट लगती है जो कभी नहीं भरती। पक्के कर्मचारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने के बावजूद उसे कैंटीन में, बैठने की व्यवस्था में और समाज की नजरों में अछूतों जैसा या दोयम दर्जे का व्यवहार झेलना पड़ता है।अगर वह अपने हक के लिए अपनी आवाज उठाने की कोशिश भी करे, तो ठेकेदार के गुर्गे और विभाग के अधिकारी तुरंत उसे बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। यह घुटती हुई आवाज और दबी हुई चीखें आज देश के हर केंद्रीय विभाग और रेलवे यार्ड की दीवारों पर गूंज रही हैं। 5. *अंधी और बहरी सरकार को सीधी फटकार:* कब तक चलेगा यह क्रूर खेल?आज हम केंद्र सरकार से यह सवाल पूछने के लिए मजबूर हैं—**अंधेरे में धकेले जा रहे इन वंचित परिवारों का खून चूसकर आप कौन सा ‘अमृतकाल’ मना रहे हैं?**देश की संपत्ति को चंद पूंजीपतियों के हवाले करने और सरकारी विभागों में पक्की नौकरियों का गला घोंटने का यह खेल अब और नहीं चलेगा। आपने रेलवे और अन्य केंद्रीय संस्थानों को ठेकेदारी की मंडी बना दिया है, जहां इंसान की कोई कीमत नहीं है, सिर्फ मुनाफे का सौदा होता है। क्या बहुजन और वंचित समाज के युवाओं का जन्म सिर्फ अमीरों के महलों के बाहर पसीना बहाने और जिल्द की जिंदगी जीने के लिए हुआ है?आपके ये खोखले दावे और फाइलों में दर्ज झूठे न्यूनतम वेतन के आंकड़े उन भूखे बच्चों के आंसुओं को नहीं छिपा सकते, जो आपके सिस्टम की भेंट चढ़ रहे हैं। शर्म आनी चाहिए उस व्यवस्था को, जो अपने ही देश के मेहनतकश नागरिकों को दो जून की रोटी और सम्मानजनक जीवन देने में असमर्थ है, और ऊपर से उन्हें ‘गुलाम’ की तरह जीने पर मजबूर कर रही है।*समापन:* श्रम कल्याण का अधूरा सच और न्याय की अंतिम पुकारसिर्फ कागजों पर वेतन बढ़ा देने या चुनावी भाषणों में गरीबों के हमदर्द होने का नाटक करने से इस भयानक संकट का समाधान नहीं होने वाला। जब तक जीवन में स्थायित्व (Job Security), बच्चों के भविष्य की गारंटी और एक इंसान की तरह जीने का अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक हर तरह का श्रम कल्याण और विकास का ढिंढोरा केवल एक सफेद झूठ है।अब समय आ गया है कि इस देश का बहुजन और वंचित समाज अपनी इस खामोशी को तोड़े। ठेका प्रथा के इस अमानवीय और मानसिक शोषण को जड़ से खत्म करने के लिए अब सड़कों पर उतरकर ठोस और आर-पार की नीतियां बनानी होंगी। यदि सरकार ने अभी भी अपनी आंखें और कान बंद रखे, तो यह सुलगता हुआ गुस्सा एक ऐसी सुनामी बनकर उठेगा, जो इन दमनकारी और जनविरोधी नीतियों को हमेशा के लिए जलाकर खाक कर देगा। न्याय और समानता की इस लड़ाई में, हर शोषित की आवाज अब बुलंद होगी—*क्योंकि अब और सहन करना मुमकिन नहीं है!*शेर*”*कल की फिक्र, नौकरी का डर, और सांसों पर पहरा है,***ठेके की इस चक्की में, बहुजन का जीवन बहरा है।*

संकलनकर्ता* हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966 हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)।*स्रोत और संदर्भ:*विकास त्रिपाठी की थ्रेड्स पर पोस्ट से प्रेरित एवंभारतीय रेलवे और केंद्रीय विभागों में बढ़ती ठेका प्रथा, आरक्षण के हनन और वंचित समाज के मानसिक तनाव पर आधारित ज़मीनी हकीकत।*अस्वीकरण:*यह आलेख या जानकारी किसी भी सरकार, दल या विशेष विचारधारा का विरोध करने के उद्देश्य से नहीं लिखी गई है। इसका एकमात्र उद्देश्य वंचित समाज को उनकी वास्तविक स्थिति से अवगत कराना और उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करना है।
