संस्कारों की छांव और उम्मीद की धूप
राजस्थान के अजमेर शहर के बीचों बीच, जहाँ सूबे की मजार की गूँज (अजमेर की पहचान ख्वाजा साहब की उसी दरगाह से है, जो प्रेम, भाईचारे और इंसानियत का संदेश देती है।)और अरावली की पुरानी चट्टानों का इतिहास हवाओं में घुला रहता है, एक छोटा सा मकान था। इस घर की दीवारें तंग थीं, मगर वहाँ रहने वालों के सपनों का आसमान बहुत बड़ा था। शाम के वक्त अजमेर की गलियों में जब ठंडी हवा चलती, तो दरगाह बाजार की चहल-पहल इस घर के आँगन तक पहुँचती थी। इसी घर में रहते थे रमेश जी, उनकी पत्नी कमला, और उनका इकलौता बेटा—आदित्य।
रमेश जी एक छोटी सी दुकान पर मुनीम का काम करते थे। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि कोई विलासिता हो, लेकिन दो वक्त की रोटी और इज्जत की जिंदगी का सुकून था। कमला अनपढ़ थीं। उन्होंने जिंदगी की पाठशाला किताबों से नहीं, बल्कि संघर्षों की भट्टी में तपकर सीखी थी। उनके हाथ के हुनर और ममता ने इस घर को हमेशा जन्नत बनाए रखा था।
आज का दिन इस परिवार के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था। अजमेर के एक सरकारी स्कूल से दसवीं की परीक्षा का परिणाम आया था। आदित्य ने अपनी मेहनत के दम पर 90% अंक हासिल किए थे। पूरे घर में एक अजीब सी चमक और खुशी की लहर दौड़ गई थी।
रमेश जी ने हाथ में मार्कशीट थामे हुए खुशी से अपनी पत्नी को आवाज दी, “कमला! जल्दी से मीठा दलिया बना ले। आज हमारे लाडले ने स्कूल की परीक्षा में 90% अंक प्राप्त किए हैं।”
किचन से काम में व्यस्त कमला दौड़ी-दौड़ी बाहर आईं। उनके चेहरे पर माँ की वह अनमोल मुस्कान थी, जिसके आगे दुनिया के सारे सुख फीके पड़ जाएं। हाँफते हुए उन्होंने कहा, “जल्दी से दिखाइए जी, मुझे भी मेरे लाल का रिजल्ट देखना है।”
तभी आदित्य ने अपनी माँ के हाथ से मार्कशीट छीनते हुए तंज कसते हुए कहा, “बाबा, आप माँ को रिजल्ट क्यों दिखा रहे हैं? क्या यह पढ़-लिख सकती हैं? यह तो अनपढ़ हैं…”
वह शब्द उस छोटे से कमरे में किसी खंजर की तरह चुभ गए। कमला की आँखों में जो खुशी की चमक थी, वह पल भर में आँसुओं के समंदर में डूब गई। उन्होंने अपनी अश्रुपूर्ण आँखों को अपनी पुरानी साड़ी के पल्लू से पोंछा और बिना एक भी शब्द कहे, चुपचाप वापस किचन की तरफ मुड़ गईं, जहाँ मीठे दलिए की खुशबू आ रही थी।
यह सब रमेश जी ने अपनी आँखों से देखा। उनके भीतर एक हूक सी उठी। उन्होंने अपने बेटे आदित्य को अपने पास बुलाया। उनका दिल भारी था, लेकिन आवाज में एक ठहराव और सच्चाई थी।
रमेश जी ने अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखा और बेहद गंभीर और भावुक आवाज में कहा, “हाँ बेटा! तूने बिल्कुल सही कहा… वो अनपढ़ है।”
आदित्य ने हैरान होकर अपने पिता की ओर देखा।
रमेश जी अतीत के पन्नों को पलटते हुए बोले, “जब हमारी शादी हुई थी, तो उसके मात्र तीन महीने के अंदर ही तुम्हारी माँ गर्भवती हो गई थी। उस वक्त हमारी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि मैं एक बच्चे की जिम्मेदारी उठा सकूँ। मैं खुद अंदर से डरा हुआ था और परिपक्व नहीं था। मैंने सोचा कि अभी तक हमने ठीक से एक-दूसरे को जाना भी नहीं है, कहीं घूमना-फिरना नहीं हुआ, तो क्यों न इस बार गर्भपात (अबॉर्शन) करवा लें और आगे का सोचें।”
आदित्य सन्न होकर अपने पिता को सुनने लगा।
रमेश जी ने आगे कहा, “लेकिन तुम्हारी माँ ने तब जिद की थी। उसने कहा था—’नहीं, घूमना-फिरना और आपस में समझना ये सब बातें बाद में होती रहेंगी। जब बच्चा इस दुनिया में आएगा, तो उसकी जिम्मेदारी उठाने की ताकत ईश्वर खुद-ब-खुद दे देगा।’ और फिर तेरा जन्म हुआ… क्योंकि वो अनपढ़ है ना!”
रमेश जी की आँखें भी अब नम हो चुकी थीं। उन्होंने काँपते हुए गले से कहा, “जब तू गर्भ में था, तो डॉक्टरों ने कहा था कि शरीर में कमजोरी है। तेरी माँ को दूध से सख्त नफरत थी, उसकी महक से उसे उल्टी आती थी। लेकिन तुझे एक स्वस्थ और तंदुरुस्त बच्चा बनाने के लिए, उसने नौ महीने तक बिना एक दिन चूके रोज जबरदस्ती दूध पिया… क्योंकि वो अनपढ़ है ना!”
“तुझे सुबह ठीक 7:00 बजे स्कूल पहुँचना रहता था। वो खुद सुबह 5:00 बजे उठ जाती थी। कड़ाके की ठंड हो या अजमेर की चिलचिलाती गर्मी, उसने कभी अपने आराम की परवाह नहीं की। तेरे उठने से पहले तेरा मनपसंद नाश्ता और स्कूल का डिब्बा तैयार मिलता था… क्योंकि वो अनपढ़ है ना!”
“याद है बेटा? जब तू रात को पढ़ते-पढ़ते किताबों के ढेर पर ही सो जाया करता था, तब वो दबी पाँवों आती थी। तेरी बिखरी हुई कॉपी-किताबों को सहेजकर बस्ते में रखती थी, तुझे प्यार से उठाकर बिस्तर पर सुलाती थी, और उसके बाद ही खुद सोने जाती थी। आधी-आधी रात को उठकर बार-बार देखती थी कि कहीं तुझे ठंड तो नहीं लग रही, तुझे चादर से ढकती थी… क्योंकि वो अनपढ़ है ना!”
“बचपन में तू ज्यादातर समय बीमार रहता था। कभी पेट दर्द, कभी तेज बुखार। अजमेर के उन अस्पतालों के चक्कर काटते-काटते उसकी रातों की नींद उड़ जाती थी। रात भर जागकर तेरी सेवा करती और सुबह सूरज उगने से पहले फिर से घर के काम में जुट जाती… क्योंकि बेटा, वो अनपढ़ है ना!”
“तेरे दोस्तों को देखकर जब तेरी इच्छा ब्रांडेड कपड़े पहनने की होती थी, और तू जिद करता था, तो तेरी माँ मेरे पीछे पड़ जाती थी कि बच्चे के लिए नए कपड़े लाओ। लेकिन खुद उसने सालों तक एक ही पुरानी साड़ी में अपनी जिंदगी गुजार दी। कभी अपने लिए एक नई चूड़ी तक की जिद नहीं की… क्योंकि वो अनपढ़ है ना!”
रमेश जी की आवाज अब भर्रा चुकी थी। उन्होंने बेटे की आँखों में देखते हुए कहा, “बेटा, आज की इस दुनिया में जिन्हें तू ‘पढ़े-लिखे’ और सभ्य लोग कहता है ना, वो हर जगह पहले अपना स्वार्थ और मतलब देखते हैं। कौन अपना है, कौन पराया, हर रिश्ते में गणित लगाते हैं। लेकिन तेरी माँ ने आज तक कभी अपना स्वार्थ नहीं देखा, कभी हिसाब नहीं लगाया… क्योंकि वो अनपढ़ है ना!”
“वह रोज सुबह से शाम तक हम सबके लिए खाना बनाती है। सबको भरपेट परोसती है और कई बार काम के चक्कर में खुद खाना ही भूल जाती है। जब हम सब खा लेते हैं, तब जो बचता है, उसे खाकर संतोष कर लेती है। इसलिए बेटा, आज मैं पूरी दुनिया के सामने गर्व से कहता हूँ कि—मेरी पत्नी, तुम्हारी माँ, अनपढ़ है!“
रमेश जी के मुँह से निकली यह एक-एक बात आदित्य के दिल पर हथौड़े की तरह पड़ रही थी। उसे अपने घमंड पर, अपनी नासमझी पर घृणा होने लगी। उसने जिस कागज के टुकड़े (मार्कशीट) पर 90% अंक लाने का गुरुर किया था, उसे आज अपना वह अहंकार सबसे घटिया और तुच्छ लगने लगा।
आदित्य फफक-फफक कर रो पड़ा। वह तुरंत अपनी जगह से उठा, दौड़कर किचन की तरफ गया जहाँ कमला चुपचाप चूल्हे के पास खड़ी आँसू बहा रही थीं।
आदित्य ने पीछे से जाकर अपनी माँ को कसकर अपनी बाहों में जकड़ लिया और उनके सीने से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगा। उसकी सिसकियों से पूरा घर गूँज उठा।
रोते-रोते आदित्य ने कहा, “माँ… मुझे क्षमा कर दीजिए! मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मुझे लगा कि मैं बहुत पढ़-लिख गया हूँ, बहुत समझदार हूँ। लेकिन आज मुझे समझ आया कि मैं तो कागज़ के कुछ टुकड़ों पर 90% अंक लाकर फूल रहा था, जबकि आप मेरे पूरे जीवन को 100% संपूर्ण बनाने वाली इस दुनिया की सबसे पहली और महान शिक्षक हो!”
आदित्य ने अपनी नम आँखों से माँ के हाथों को चूमा और कहा, “माँ, आज मुझे लगता है कि मैं असल जिंदगी में पूरी तरह अशिक्षित हूँ, और आपके पास दुनिया की किसी यूनिवर्सिटी की पीएचडी से भी कई गुना बड़ी, उच्च कोटि की डिग्री है! आज मैंने अपनी इस अनपढ़ माँ के आँचल में एक साथ डॉक्टर, शिक्षक, वकील, बेहतरीन ड्रेस डिजाइनर और दुनिया की सबसे बेहतरीन शेफ (कुक) के दर्शन कर लिए हैं।”
कमला ने अपने काँपते हाथों से अपने बेटे का चेहरा उठाया। उनकी आँखों में अब भी आँसू थे, लेकिन उन आँसुओं में ममता की असीम पावन गंगा बह रही थी। उन्होंने अपने बेटे के सिर पर हाथ फेरा और उसे सीने से लगा लिया। उस स्पर्श में वह सारी दुनिया का सुकून और आशीर्वाद था, जिसे कोई डिग्री खरीद नहीं सकती।
रमेश जी दरवाजे पर खड़े यह सब देख रहे थे। उनकी आँखों के कोने भी नम थे, और चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी।
आज अजमेर के उस छोटे से घर में यह बात साबित हो गई थी कि कागजी डिग्रियाँ और स्कूल की किताबें इंसान को सिर्फ नौकरी दिला सकती हैं, लेकिन इंसानियत, त्याग और जीवन जीना तो वह अनपढ़ माँ सिखाती है, जिसके आँचल की छाँव में पूरी कायनात सिमट जाती है।
हाँ, दुनिया की नजरों में शायद वह अनपढ़ है, मगर दुनिया की बड़े से बड़ी डिग्रियाँ भी एक अनपढ़ माँ के आगे सिर्फ एक रद्दी कागज भर हैं—क्योंकि इस धरती पर मौजूद हर कामयाब और महान इंसान के पीछे सिर्फ और सिर्फ एक माँ का त्याग और उसकी तपस्या होती है।
प्रेरणा:* शिक्षा इंसान को साक्षर बनाती है, लेकिन संस्कार, त्याग और निस्वार्थ प्रेम इंसान को महान बनाते हैं। हमारी माँ हमारी सबसे पहली और जीवनभर की गुरु होती हैं, जिनका कर्ज हम कभी नहीं चुका सकते।

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)।

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