​परिचय:

वंचित समाज के संस्कार: झूठी परंपराओं के जरिए आत्मसम्मान छीनने का खौफनाक खेल।

​परिचय:
अदृश्य जंजीरों का खामोश दर्द
​गुलामी सिर्फ लोहे की जंजीरों और पत्थरों की चारदीवारी तक सीमित नहीं होती। असली और सबसे भयानक गुलामी वह होती है, जो इंसान के जिस्म को छूने से पहले उसकी रूह, उसकी सोच और उसकी चेतना को जकड़ लेती है। जब कोई आपसे कहे कि “गुलामी पहले सोच में उतरती है, फिर जीवन में दिखाई देती है,” तो यह महज़ शब्दों का खेल नहीं, बल्कि सदियों से सिसकते हुए वंचित समाज की छाती पर लिखा हुआ एक खौफनाक और खारा सच है।
​हम अक्सर उन लोगों को देखते हैं जो दूसरों के इशारों पर अपनी जिंदगी जीते हैं, हर पल अपमान का घूंट पीते हैं, लेकिन उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं होती। बल्कि इसके उलट, उन्हें ऐसा लगता है कि वे अपनी मर्जी के मालिक हैं। यही इस सामंतवादी और शोषक व्यवस्था का सबसे बड़ा और क्रूर खेल है। इंसान को हमेशा जबरदस्ती डराकर या चाबुक के जोर पर गुलाम नहीं बनाया जाता; कभी-कभी उसे ऐसी मानसिकता में ढाल दिया जाता है कि वह खुद-ब-खुद अपनी गुलामी को अपनी स्वतंत्रता, अपने भाग्य और अपना धर्म समझने लगता है।

​पुनर्जन्म और कर्मों का छलावा:
न्याय के नाम पर अन्याय का पोषण
​वंचित समाज के इस अंतहीन दर्द और पीड़ा की शुरुआत होती है उस सुनियोजित झूठ से, जिसे तथाकथित उच्च समाज और सामंतवादी सोच ने पीढ़ियों से लोगों के जेहन में घोल रखा है। सोचिए, उस इंसान पर क्या गुजरती होगी जिसे यह विश्वास दिला दिया जाए कि उसकी मौजूदा लाचारी, उसकी भूख, उसका अपमान और उसका संघर्ष किसी और का नहीं, बल्कि उसके ही ‘पिछले जन्म के बुरे कर्मों’ का फल है।जैसे कि तुमने पिछले जन्म में अच्छे कर्म नहीं किए, इसलिए तुम्हें वंचित समाज में जन्म मिला है।”
​यह वाक्य सिर्फ एक ताना नहीं है, बल्कि वंचितों की हर उस सिसकी का गला घोंटने का एक ब्रह्मस्त्र है जो वे उठाना चाहते हैं। जब किसी भूखे, वंचित और शोषित इंसान को बचपन से ही यह पाठ पढ़ाया जाता है कि उसकी इस दयनीय स्थिति के जिम्मेदार वे खुद हैं—भगवान या भाग्य का विधान है—तो उसका अंदर का विद्रोही दम तोड़ देता है। वह सवाल पूछना बंद कर देता है। वह अन्याय के खिलाफ उठने वाले हर सवाल को अपनी ही ‘किस्मत की खोट’ मानकर चुपचाप सहने लगता है।
​यहीं से सामंतवादी सोच अपना दूसरा वार करती है। वे बड़े ही शातिर तरीके से यह स्थापित करते हैं कि वंचित समाज का इस धरती पर आने और जीने का एकमात्र मकसद तथाकथित उच्च समाज की सेवा करना है। उन्हें यह समझाया जाता है कि यही तुम्हारा कर्तव्य है, यही तुम्हारा धर्म है। और यदि तुम इस जन्म में पूरी निष्ठा के साथ इस गुलामी को निभाओगे, बिना किसी उफ के उनकी सेवा करोगे, तो शायद अगले जन्म में तुम्हें भी तथाकथित उच्च जाति में जन्म लेने का ‘सौभाग्य’ मिल जाएगा।
​यह विचार कितना क्रूर और अमानवीय है!
एक इंसान को इस जन्म में इंसान होने का हक नहीं दिया जाता, बल्कि उसे अगले जन्म के एक झूठे और काल्पनिक लालच में इस जीवन की पूरी नर्क जैसी यातनाएं चुपचाप सहने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। यह वंचितों की चेतना पर किया गया ऐसा प्रहार है, जो उन्हें जीते-जी लाश बना देता है।
संस्कार’ के नाम पर आत्मसम्मान का कत्ल
​वंचित समाज के दर्द की दास्तान यहीं खत्म नहीं होती। इस सामंतवादी व्यवस्था ने समाज के नियमों को कुछ इस तरह गढ़ा कि वंचित वर्ग के लिए हर स्वाभिमानी कदम को ‘अपराध’ और हर झुकाव को ‘संस्कार’ बता दिया गया।
​तथाकथित उच्च समाज ने यह नियम बना दिया कि वंचित वर्ग का यह कर्तव्य है कि वह रास्ते में चलते हुए, किसी आयोजन में या आम जीवन में तथाकथित उच्च वर्ग को देखते ही सबसे पहले झुककर नमस्कार करे, उनके पैर छुए और जमीन पर अपनी निगाहें नीची रखे। जबकि मानवीय गरिमा और बराबरी के उसूलों के हिसाब से ऐसा कुछ भी सही नहीं है। खून का रंग सबका लाल है, सांसें सबकी एक जैसी हैं, फिर एक इंसान दूसरे इंसान के पैरों में झुकने के लिए मजबूर क्यों किया जाए?
​लेकिन सदियों के मानसिक शोषण के बाद, वंचित समाज के लोगों के दिमाग में यह बात इतनी गहराई से बिठा दी जाती है कि वे खुद इसे अपना ‘संस्कार’ और अपनी ‘संस्कृति’ मान बैठते हैं। वे भूल जाते हैं कि उनके भी दो हाथ-पैर हैं, उनका भी एक दिल है जो सम्मान से धड़कना चाहता है। वे अपनी ही मर्जी से अपने बच्चों को यह सिखाते हैं कि “बेटा, हमें इनसे दबकर ही रहना है।”
​जब एक समाज अपने ही बच्चों को झुकना सिखा दे, तो उसे बाहरी बंदूकों या तलवारों की जरूरत नहीं पड़ती। वे लोग खुद अपने पैरों में ऐसी मानसिक बेड़ियाँ पहन लेते हैं जिन्हें वे आभूषण समझने की भूल कर बैठते हैं।

जब बेड़ियों से ही प्यार हो जाए:
विचारों की अदृश्य गुलामी ​यही वह मोड़ है जहाँ इंसान वैचारिक गुलामी के सबसे गहरे अंधकार में डूब जाता है। जैसा कि इस सच्चाई में गहराई से झलकता है:
​”इंसान को हमेशा जबरदस्ती गुलाम नहीं बनाया जाता, कभी-कभी उसे ऐसी सोच में ढाल दिया जाता है कि वह खुद ही अपनी गुलामी को अपनी स्वतंत्रता समझने लगता है।”
​यह स्थिति किसी भी इंसान के लिए सबसे दयनीय और दर्दनाक होती है। कल्पना कीजिए उस शख्स की, जो दूसरों के इशारों पर नाचता है, जिसकी मेहनत का पसीना कोई और पीता है, जिसे हर मोड़ पर अपमानित किया जाता है, लेकिन शाम को घर लौटकर उसे यह संतोष होता है कि उसने अपने ‘मालिक’ की सेवा बहुत अच्छे से की है। उसके पैरों में पड़ी जंजीरें उसे चुभती नहीं हैं, बल्कि उसे लगता है कि ये जंजीरें ही उसकी सुरक्षा का कवच हैं।
​शरीर की गुलामी तो दिख जाती है, उसके निशान पीठ पर उभर आते हैं, खून की बूंदें जमीन पर गिरती हैं, और दुनिया उसे देखकर सहम जाती है। लेकिन विचारों की गुलामी इतनी चुपचाप, इतनी खामोशी से इंसान के भीतर उतरती है कि इंसान उम्र भर मुस्कुराते हुए अपनी ही तबाही का जश्न मनाता रहता है। उसे पता ही नहीं चलता कि उसका दिमाग, उसकी इच्छाएं, उसकी सोच सब कुछ किसी और के रिमोट से कंट्रोल हो रहा है।
​निष्कर्ष:
सोच की आज़ादी ही सच्ची आज़ादी है
​आज इस बात को गहराई से समझने और स्वीकार करने की जरूरत है कि सवाल यह नहीं है कि आपके हाथ-पैर खुले हैं या आप किसी कारखाने या खेत में जंजीरों से बंधे हैं। असली और सबसे बड़ा सवाल यह है:
​”तुम्हारी सोच पर अधिकार किसका है?”
​जब तक वंचित समाज इस सामंतवादी पाखंड, पुनर्जन्म के झूठे छलावे और तथाकथित संस्कारों के जाल को नहीं समझेगा, तब तक वह कागजी आजादी और संविधान के पन्नों के बावजूद भीतर से गुलाम ही रहेगा। यह दर्द सिर्फ एक वर्ग विशेष का नहीं, बल्कि पूरी मानवता का कलंक है।
​अब समय आ गया है कि वंचित समाज अपनी इस वैचारिक निद्रा से जागे। उस हर झूठ को सिरे से खारिज करे जो उसे इंसान होने के अधिकार से वंचित करता है। अपने बच्चों के मन से यह डर निकाल फेंके कि वे किसी से कम हैं या किसी के गुलाम पैदा हुए हैं।
​जिस दिन वंचित समाज की सोच इन मानसिक बेड़ियों को तोड़कर आजाद हो जाएगी, उसी दिन से इस धरती पर वास्तविक समता, स्वतंत्रता और न्याय के सूरज का सच्चा उदय होगा। तब जाकर यह दर्द आंसुओं में नहीं, बल्कि जीत की एक नई इबारत में बदल जाएगा!

उठो, अपनी सोच के पहरेदार खुद बनो,* *
क्योंकि तुम्हारी चेतना की स्वतंत्रता ही तुम्हारे कल का भविष्य तय करेगी।

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)।

स्रोत और संदर्भ
लादू लाल मैणसित गंगरार की थ्रेड्स पर पोस्ट से प्रेरित एवं डॉ. अंबेडकर के विचारों, सामंतवादी शोषण के इतिहास, और समाज में सदियों से चली आ रही मानसिक गुलामी, उसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों और उससे मुक्ति की वैचारिक यात्रा ।

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