भारतीय अर्थव्यवस्था इन दिनों एक बेहद नाजुक और चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। देश के पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने हाल ही में द वायर (The Wire) को दिए गए एक साक्षात्कार में भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति और सरकारी नीतियों की तीखी आलोचना की है। उनके अनुसार, आज भारत के सामने जो आर्थिक संकट खड़ा है, वह केवल बाहरी या वैश्विक कारणों का परिणाम नहीं है, बल्कि यह देश की आंतरिक संरचनात्मक कमजोरियों और नीतिगत विफलताओं का नतीजा है।
यह आलेख श्री गर्ग के विश्लेषण के आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था, विदेशी निवेश के पलायन, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव और सरकार के नीतिगत प्रबंधन की गहराई से समीक्षा करता है।

  1. विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) का भारी पलायन और घटता भरोसा

भारतीय शेयर बाजारों से विदेशी निवेशकों (FIIs) द्वारा लगातार पैसा निकाला जाना आज अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बन गया है। स्थिति इतनी गंभीर है कि अक्टूबर 2026 के शुरुआती हफ्तों में ही शेयर बाजारों से 50,000 करोड़ रुपये से अधिक की निकासी हो चुकी है।
सुभाष चंद्र गर्ग का स्पष्ट मानना है कि वैश्विक निवेशक अब भारतीय अधिकारियों द्वारा मुद्रा, विदेशी मुद्रा भंडार और शेयर बाजार के प्रबंधन के तरीके पर अपना भरोसा खोते जा रहे हैं। जब वैश्विक निवेशकों को यह महसूस होने लगता है कि किसी देश की नीतियां दूरदर्शी नहीं हैं, तो वे अपनी पूंजी को सुरक्षित स्थानों पर ले जाना बेहतर समझते हैं। अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में बढ़ती ब्याज दरों और वहां मिल रहे आकर्षक रिटर्न के मुकाबले भारतीय बाजारों का प्रदर्शन निवेशकों को लुभाने में नाकाम साबित हो रहा है।

  1. मुद्रा और विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ता भारी दबाव
    भारतीय रुपये की गिरती कीमत को संभालने और थामने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को अपने विदेशी मुद्रा भंडार का एक बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ रहा है।
    वीडियो में इस बात का खुलासा किया गया है कि विशेष रूप से एनआरआई डिपॉजिट योजना (FCNRB) के जरिए जुटाए गए 140 बिलियन डॉलर में से लगभग 50% का इस्तेमाल अकेले रुपये की कीमत को संभालने में किया जा चुका है। रुपये को कृत्रिम रूप से थामने के लिए इस तरह विदेशी मुद्रा भंडार का तेजी से उपयोग करना देश की दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है। जब केंद्रीय बैंक को बार-बार बाजार में हस्तक्षेप करना पड़े, तो यह अर्थव्यवस्था की आंतरिक कमजोरी का संकेत देता है।
  2. नीतिगत प्रबंधन में ‘घबराहट’ (Panic) और गलत प्राथमिकताएं
    श्री गर्ग ने सरकार और आरबीआई के नीतिगत प्रबंधन पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि संकट के समय अधिकारियों के निर्णय दूरदर्शिता पर आधारित होने के बजाय घबराहट से भरे होते हैं।
  • हेजिंग को महंगा करना: सरकार और आरबीआई द्वारा अपनाए गए कई अल्पकालिक उपाय, जैसे कि हेजिंग (hedging) को महंगा बनाना, निवेशकों के बीच भारी अनिश्चितता और डर पैदा कर रहे हैं। इससे व्यवसायों और निवेशकों के लिए अपने वित्तीय जोखिमों को प्रबंधित करना कठिन हो गया है।
  • बाजार को जबरन बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना: पूर्व वित्त सचिव ने इस बात की भी कड़ी आलोचना की है कि किस प्रकार चुनाव के पहले राजनीतिक या प्रशासनिक स्तर पर शेयर बाजारों को कृत्रिम रूप से ‘बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने’ (talking up the market) की प्रवृत्ति अपनाई जाती है। यह तरीका न केवल निवेशकों को गुमराह करता है बल्कि लंबे समय में बाजार की विश्वसनीयता को भी ठेस पहुंचाता है।
  1. आंतरिक कमजोरियां:
    भविष्य की तकनीकों में पिछड़ता भारत
    विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत की वर्तमान आर्थिक समस्याओं की जड़ें बाहरी झटकों में नहीं, बल्कि देश की घरेलू संरचनात्मक कमजोरियों में निहित हैं।
  • परिपक्व उद्योगों पर अत्यधिक निर्भरता: आज भी भारत का अधिकांश औद्योगिक ध्यान स्टील, एल्युमीनियम और खाद्य उत्पादों जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित है। ये ऐसे उद्योग हैं जो वैश्विक स्तर पर परिपक्व हो चुके हैं और जिनमें दुनिया भर में उत्पादन का भारी अधिशेष (surplus) है। इन क्षेत्रों से भविष्य में असाधारण आर्थिक विकास की उम्मीद नहीं की जा सकती है।
  • भविष्य के ग्रोथ इंजनों की अनदेखी: दुनिया तेजी से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर निर्माण, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और ऊर्जा संक्रमण (energy transition) जैसी तकनीकों की ओर बढ़ रही है। गर्ग का मानना है कि भारत इन भविष्य के विकास क्षेत्रों में या तो पिछड़ रहा है या उसके पास आवश्यक वैश्विक क्षमता और विभेदक (differentiator) की कमी है। जब तक देश इन आधुनिक तकनीकों में मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार नहीं करता, तब तक दीर्घकालिक और टिकाऊ विकास संभव नहीं है।
  1. निष्कर्ष और आगे की राह
    सुभाष चंद्र गर्ग के इस गंभीर विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि केवल अल्पकालिक वित्तीय पैतरों और ऋण-आधारित योजनाओं (जैसे भारी एनआरआई जमा) के सहारे अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता।
    भारत को इस जटिल आर्थिक संकट से बाहर निकालने के लिए तात्कालिक घबराहट भरी नीतियों से बाहर निकलना होगा। सरकार और नीति निर्माताओं को पारदर्शी, स्थिर और दीर्घकालिक सुधारों पर ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही, देश को पारंपरिक और परिपक्व उद्योगों से आगे बढ़कर सेमीकंडक्टर, एआई और आधुनिक तकनीकी क्षेत्रों में अपनी क्षमता का विस्तार करना होगा। यदि समय रहते इन आंतरिक कमजोरियों को दूर नहीं किया गया, तो भारत की मुद्रा, बाजार और नीतिगत प्रबंधन पर से वैश्विक निवेशकों का भरोसा और अधिक कम हो सकता है, जो देश के आर्थिक भविष्य के लिए एक गंभीर चुनौती साबित होगा।

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)!

स्रोत और संदर्भ:
यह आलेख पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के ‘द वायर’ को दिए गए साक्षात्कार के विश्लेषण पर आधारित है।
अस्वीकरण यह जानकारी केवल सामान्य जागरूकता हेतु है। संकलनकर्ता अर्थशास्त्री होने का दावा नहीं करता एवं किसी सरकार या विचारधारा से कोई पक्षपात या दुर्भावना नहीं है।

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