एक बहुजन शराबी की आत्मकथा

दिन में जाति छोटी, शाम को प्याला बराबर!मैं एक बहुजन परिवार में पैदा हुआ। जब से होश सँभाला, तब से दुनिया को अपने और पराए, ऊँचे और नीचे, बड़े और छोटे लोगों में बँटा हुआ देखा। बचपन में मुझे समझ नहीं आता था कि आखिर मेरे भीतर ऐसी कौन-सी कमी है, जिसके कारण कुछ लोग मुझे अपने बराबर नहीं समझते। मेरे हाथ भी दो थे, पैर भी दो थे, मेरी आँखों में भी सपने थे और मेरे सीने में भी दिल धड़कता था। फिर भी मुझे बार-बार यह एहसास क्यों कराया जाता था कि मैं दूसरों से छोटा हूँ? मैंने बचपन में ही सीख लिया था कि इस दुनिया में केवल मेहनत करने से सम्मान नहीं मिलता। कुछ लोगों को सम्मान जन्म से मिलता है और कुछ लोगों को पूरी जिंदगी मेहनत करने के बाद भी अपने सम्मान का प्रमाण देना पड़ता है। मैं भी पढ़ना चाहता था, आगे बढ़ना चाहता था और अपने परिवार का नाम रोशन करना चाहता था। लेकिन मेरे हिस्से में सपनों से ज्यादा संघर्ष आए। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। जरूरतें बड़ी थीं और साधन छोटे। कई बार मन में बहुत कुछ करने की इच्छा होती, लेकिन परिस्थितियाँ मेरे रास्ते में दीवार बनकर खड़ी हो जातीं। धीरे-धीरे मैं बड़ा हुआ। मेरे कंधों पर परिवार की जिम्मेदारियाँ आ गईं। मैंने मजदूरी की, मेहनत की, पसीना बहाया और अपने बच्चों का पेट भरने के लिए दिन-रात एक किया। मैं जानता था कि मेरे बच्चे भूखे नहीं सोने चाहिए। मैं चाहता था कि वे पढ़ें, आगे बढ़ें और उस अपमान को न झेलें, जिसे झेलते हुए मैं बड़ा हुआ था। लेकिन एक बात मुझे भीतर ही भीतर खाए जाती थी। मैं अपने परिवार के लिए कितना भी कर लूँ, समाज के कुछ लोगों की नजर में मेरी हैसियत वही रहती थी। मेरी मेहनत को काम समझा गया, मेरी मजबूरी को मेरी औकात और मेरी जाति को मेरी पहचान बना दिया गया।

मेरी जिंदगी का एक अजीब सच है। दिनभर मैं अपने काम पर रहता हूँ। वहाँ मेरी पहचान मेरे काम, मेरी मजदूरी और मेरी आर्थिक हैसियत से होती है। कई बार मुझे ऐसे लोगों के सामने भी खड़ा होना पड़ता है, जिनसे बात करते हुए मैं अपने शब्दों को तौलता हूँ। मन में डर रहता है कि कहीं मेरी बात का बुरा न मान जाएँ, कहीं मेरी हैसियत याद न दिला दी जाए, कहीं मेरे आत्मसम्मान को ठेस न पहुँचा दी जाए। मैंने कई बार महसूस किया कि कुछ लोगों के साथ बैठकर खुलकर बात करना मेरे लिए आसान नहीं था। मैं अपनी बात कहना चाहता था, लेकिन मन के किसी कोने में एक अदृश्य दीवार खड़ी हो जाती थी। फिर शाम होती थी। काम की थकान शरीर पर होती थी और दिनभर की बातें मन में घूमती रहती थीं। कभी कोई अपमान याद आता, कभी पैसों की चिंता सताती, कभी बच्चों की जरूरतें परेशान करतीं और कभी भविष्य का डर भीतर तक हिला देता। ऐसे ही दिनों में मैंने शराब की महफिलों में बैठना शुरू किया। शुरुआत में मुझे शायद यह भी नहीं पता था कि मैं शराब पीने क्यों बैठता हूँ। दोस्तों के साथ बैठना, कुछ देर हँस लेना, दिनभर की परेशानियाँ सुनाना और दूसरों की बातें सुनना अच्छा लगता था। वहाँ कोई मेरी जाति पूछकर बातचीत शुरू नहीं करता था। कम से कम उस समय मुझे ऐसा महसूस होता था। वहाँ एक ऐसा व्यक्ति भी मेरे साथ बैठा होता था, जिसके सामने दिन में मैं शायद उतनी देर सहज होकर बात नहीं कर पाता। लेकिन शराब के गिलास के सामने हम दोनों बैठते, तो बातचीत का सिलसिला चल पड़ता। वह अपने परिवार की परेशानी बताता, मैं अपनी परेशानी सुनाता। वह अपने कारोबार का दुख कहता, मैं अपनी मजदूरी की कहानी सुनाता। वह अपने बच्चों के भविष्य की चिंता करता, मैं भी अपने बच्चों के सपनों की बात करता। उस समय मुझे पहली बार महसूस होता कि हमारे दुखों में कितनी समानता है। मैं भी पिता हूँ। वह भी पिता है। मेरे घर में भी रोटी की चिंता है। उसके घर में भी कोई न कोई चिंता है। मेरी आँखों में भी भविष्य को लेकर डर है। उसकी आँखों में भी जीवन की उलझनें हैं। फिर हमारे बीच इतनी दूरी क्यों है?

मैंने लोगों को कहते सुना है कि शराब का एक प्याला सात जातियों के लोगों को एक साथ बैठा देता है। जब मैंने अपने जीवन में इसे देखा, तो मेरे मन में कई सवाल उठे। जिस व्यक्ति के साथ मैं दिन में बैठकर खुलकर बात करने में संकोच करता हूँ, वही शाम को मेरे साथ घंटों बैठता है। मेरे हाथ से गिलास लेता है। मेरी बात सुनता है। मेरे मजाक पर हँसता है और कभी-कभी अपनी निजी जिंदगी की ऐसी बातें भी बता देता है, जिन्हें वह शायद हर किसी से नहीं कहता। मैं सोचता हूँ कि जब हम शराब की महफिल में एक-दूसरे के इतने करीब आ सकते हैं, तो सामान्य जीवन में हमारे बीच इतनी दूरी क्यों है? अगर मेरे हाथ से लिया हुआ गिलास उस समय स्वीकार्य है, तो मेरे हाथ से दिया हुआ पानी हमेशा स्वीकार्य क्यों नहीं होता? अगर मेरे साथ बैठकर दुनिया की राजनीति पर चर्चा की जा सकती है, तो गाँव की चौपाल पर मेरे साथ बैठने में संकोच क्यों होता है? अगर मेरी बात शराब के नशे में सुनने लायक है, तो होश में रहते हुए मेरी बात सुनने में परेशानी क्यों होती है? मैं यह नहीं कहता कि हर व्यक्ति ऐसा करता है। मैं यह भी नहीं कहता कि शराब की महफिल में बैठने वाला हर व्यक्ति जातिगत भेदभाव करता है। लेकिन अपने अनुभवों से मैंने इतना जरूर महसूस किया है कि कुछ रिश्तों में जो सहजता शराब की मेज पर दिखाई देती है, वही सहजता सामाजिक जीवन में दिखाई नहीं देती। मुझे शराब से ज्यादा उस बराबरी की तलाश थी, जिसका एहसास कुछ घंटों के लिए उस महफिल में होता था। लेकिन शायद मैं यह समझने में देर कर गया कि कुछ घंटों का अपनापन और जीवनभर का सम्मान दो अलग-अलग चीजें हैं।

जब मैं उस महफिल में बैठता था, तो मुझे लगता था कि यहाँ मेरी बात सुनी जाती है। यहाँ मैं अपनी परेशानी बिना किसी डर के बता सकता हूँ। यहाँ मुझे बार-बार अपनी जाति, गरीबी या सामाजिक स्थिति का परिचय नहीं देना पड़ता। मैं भी अपनी बातों में शामिल होता था। कभी दुनिया बदलने की बातें करता, कभी समाज की बुराइयों पर चर्चा करता, कभी राजनीति पर अपनी राय देता और कभी अपने जीवन के अनुभव सुनाता। कुछ देर के लिए मैं अपने भीतर बैठे उस छोटे बच्चे को भूल जाता था, जिसे कभी अपनी जाति के कारण कमतर होने का एहसास हुआ था। मैं भूल जाता था कि दिन में मुझे कितनी बार अपनी हैसियत का ध्यान रखना पड़ा। मैं भूल जाता था कि घर में पैसों की कितनी कमी है। मैं भूल जाता था कि मेरे बच्चों की फीस भरनी है, घर का राशन लाना है और अगली सुबह फिर मजदूरी पर जाना है। लेकिन शराब का असर खत्म होने के साथ ही मेरी दुनिया फिर सामने खड़ी हो जाती थी। मैंने धीरे-धीरे समझा कि मैं अपने दुखों से लड़ने के बजाय उनसे कुछ समय के लिए भाग रहा था। मुझे लगा था कि शराब मुझे सुकून देती है, लेकिन वह सुकून धीरे-धीरे मेरी जरूरत बनता जा रहा था। जिस महफिल में मैं अपना अकेलापन मिटाने जाता था, उसी महफिल से लौटकर कई बार और ज्यादा अकेला महसूस करता था।

मैं अपनी कहानी में अपने परिवार को कैसे भूल सकता हूँ? मेरी पत्नी ने भी मेरे साथ संघर्ष किया। उसने घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी इच्छाएँ दबाईं। कई बार उसने अपनी जरूरतों से पहले बच्चों की जरूरतों को रखा। उसने चाहा कि मैं परिवार के साथ समय बिताऊँ, बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दूँ और घर की जिम्मेदारियों को समझूँ। लेकिन मैं कई बार उसकी बातों को शिकायत समझ बैठा। जब वह शराब पीने से मना करती, तो मुझे लगता कि वह मेरी परेशानी नहीं समझती। जब वह देर से घर आने पर सवाल पूछती, तो मुझे लगता कि वह मुझ पर शक करती है। जब बच्चे मेरे सामने चुप हो जाते, तो मैं उनकी खामोशी का अर्थ समझने की कोशिश नहीं करता था। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो महसूस होता है कि मेरी पत्नी को केवल शराब से परेशानी नहीं थी। उसे उस भविष्य का डर था, जिसमें परिवार का सहारा धीरे-धीरे कमजोर होता जा रहा था। मेरे बच्चे शायद मुझसे बहुत कुछ कहना चाहते थे। लेकिन कई बार पिता के सामने उनकी बातें अधूरी रह जाती थीं। मैं जिस समाज से सम्मान माँगता था, उसी समाज में अपने घर के लोगों को वह अपनापन नहीं दे पा रहा था, जिसके वे हकदार थे। यह सोचकर मेरा मन भारी हो जाता है। मैं दूसरों से बराबरी चाहता था, लेकिन क्या मैं अपने परिवार की भावनाओं को बराबर महत्व दे रहा था? मैं चाहता था कि लोग मेरी बात सुनें, लेकिन क्या मैं अपने बच्चों की बातें ध्यान से सुनता था? मैं चाहता था कि कोई मुझे समझे, लेकिन क्या मैंने कभी अपनी पत्नी की थकान और चिंता को पूरी तरह समझने की कोशिश की? इन सवालों के जवाब मेरे लिए आसान नहीं हैं। मैं अपनी गलतियों को समाज के सिर पर डालकर निर्दोष नहीं बनना चाहता। मेरी जिंदगी में जो गलत फैसले हुए, उनकी जिम्मेदारी भी मेरी है। लेकिन मैं यह जरूर चाहता हूँ कि मेरे जैसे व्यक्ति की कहानी सुनते समय लोग केवल उसकी गलतियाँ न गिनें। उसके संघर्षों को भी समझें।

मैंने जीवन में सामाजिक अपमान सहा। मैंने आर्थिक अभाव देखे। मैंने ऐसे अवसर भी देखे, जब मुझे लगा कि मेरी मेहनत के बावजूद मेरे लिए रास्ते सीमित हैं। लेकिन अब मैं यह भी समझता हूँ कि शराब मेरी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं थी। शराब पीकर मैं कुछ देर के लिए दुख भूल सकता था, लेकिन मेरे बच्चों की फीस अपने आप नहीं भरती थी। मेरी पत्नी की चिंता समाप्त नहीं होती थी। मेरी आर्थिक स्थिति नहीं बदलती थी और समाज में जातिगत भेदभाव की दीवार भी नहीं टूटती थी। उलटे, धीरे-धीरे मेरा स्वास्थ्य प्रभावित होने लगा, परिवार का विश्वास कमजोर होने लगा और मेरे पास मौजूद समय तथा पैसे भी कम पड़ने लगे। मुझे यह स्वीकार करने में शर्म नहीं होनी चाहिए कि मैं एक ऐसी आदत में उलझ गया, जिससे बाहर निकलने के लिए मुझे मदद की जरूरत पड़ सकती है। शराब की लत केवल इच्छाशक्ति की कमी का मामला नहीं होती। कई बार इसके लिए चिकित्सकीय उपचार, परामर्श और परिवार के सहयोग की जरूरत होती है। जरूरत पड़ने पर मदद लेना कमजोरी नहीं, अपने जीवन और परिवार के प्रति जिम्मेदारी है। मैं चाहता हूँ कि समाज मुझे तिरस्कार से नहीं, इंसान समझकर देखे। लेकिन मैं यह भी चाहता हूँ कि मैं खुद अपनी जिम्मेदारी समझूँ और अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने का प्रयास करूँ।

आज मेरे मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मुझे अपने बराबर समझे जाने के लिए किसी महफिल का सहारा लेना पड़ेगा? क्या मुझे अपनी बात सुनवाने के लिए शराब पीनी पड़ेगी? क्या मुझे किसी ऐसे व्यक्ति से दोस्ती करने के लिए नशे में होना जरूरी है, जो दिन में मेरी जाति के कारण मुझसे दूरी बना सकता है? मैं चाहता हूँ कि मेरे साथ काम करने वाला व्यक्ति मुझे अपना साथी समझे। पंचायत में मेरी बात सुनी जाए। सामाजिक समारोहों में मुझे बराबरी का स्थान मिले। मेरे बच्चों को किसी के सामने अपनी जाति के कारण शर्मिंदा न होना पड़े। मैं चाहता हूँ कि मेरे बच्चे मुझसे यह न पूछें कि पिताजी, कुछ लोग हमारे साथ अलग व्यवहार क्यों करते हैं? मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि कोई भी मनुष्य जन्म से छोटा नहीं होता। समाज की गलत धारणाएँ किसी व्यक्ति की वास्तविक कीमत तय नहीं कर सकतीं। मैं चाहता हूँ कि मेरे बच्चे अपनी पहचान पर गर्व करें, शिक्षा प्राप्त करें, अपने अधिकारों को समझें और सम्मान के साथ जीवन जिएँ। मैं यह भी चाहता हूँ कि मेरे समाज का कोई व्यक्ति अपने दुखों को भुलाने के लिए शराब को अपना स्थायी सहारा न बनाए। हमारे पास बातचीत के लिए घर हों, सहयोग के लिए मित्र हों, समस्याएँ सुलझाने के लिए संगठन हों और नशे की लत से बाहर निकलने के लिए उपचार की सुविधाएँ हों।

मैं नहीं जानता कि मेरी जिंदगी के आने वाले दिन कैसे होंगे। लेकिन अब मैं अपनी कहानी को केवल पछतावे की कहानी बनाकर समाप्त नहीं करना चाहता। मैं अपने बच्चों के लिए बेहतर पिता बनना चाहता हूँ। अपनी पत्नी का विश्वास वापस पाना चाहता हूँ। अपनी गलतियों को स्वीकार करके उनसे बाहर निकलने की कोशिश करना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि मेरे समाज की पीड़ा सुनी जाए और मेरे समाज के लोगों को समान अवसर मिलें। मैं चाहता हूँ कि जिस व्यक्ति के साथ मैं शराब की महफिल में बैठकर घंटों बातें कर सकता हूँ, उसके साथ बिना शराब के भी उतनी ही सहजता से बैठ सकूँ। मैं चाहता हूँ कि मेरा सम्मान मेरे गिलास में भरी शराब से नहीं, मेरे व्यक्तित्व और मेरे मानवीय अधिकारों से तय हो। अब मेरी जिंदगी का सपना केवल इतना नहीं है कि मैं शराब छोड़ दूँ। मेरा सपना यह भी है कि मैं उस हीनभावना से बाहर निकलूँ, जिसे समाज के भेदभाव ने मेरे भीतर गहरा किया है। मैं अपने बच्चों को ऐसा वातावरण देना चाहता हूँ, जहाँ उन्हें अपनी जाति के कारण स्वयं को छोटा समझना न पड़े। क्योंकि आखिर मैं भी इसी मिट्टी का बना हूँ। मेरे शरीर में भी वही खून बहता है। मुझे भी भूख लगती है, मुझे भी दर्द होता है, मुझे भी अपने बच्चों से प्यार है और मुझे भी सम्मान के साथ जीने का अधिकार है।

मैं बहुजन समाज का वह व्यक्ति हूँ, जिसने शराब की महफिल में कुछ पल की बराबरी महसूस की, लेकिन अब मैं अपने जीवन में ऐसी बराबरी चाहता हूँ, जिसके लिए मुझे किसी प्याले की जरूरत न पड़े। मेरी आवाज को मेरी शराब के शोर में दबा मत दीजिए। मेरी कहानी सुनिए। मेरी गलतियों को पहचानिए, लेकिन मेरे भीतर के इंसान को मत मारिए। मुझे शराबी कहकर छोड़ मत दीजिए। मुझे अपनी जिंदगी सँभालने का अवसर दीजिए। और समाज से मेरा आखिरी सवाल है—जब एक ही प्याले के सामने हमारी जातियाँ कुछ देर के लिए पीछे छूट सकती हैं, तो इंसानियत के सामने वे हमेशा के लिए पीछे क्यों नहीं छूट सकतीं?

शेर

दिन में मेरी जाति ने मुझे छोटा बताया,
शाम को प्याले ने कुछ पल बराबर बिठाया।
काश, यह बराबरी नशे की मोहताज न होती,
तो मेरी जिंदगी भी शायद इतनी उदास न होती।


संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)।

स्रोत और संदर्भ
जातिगत भेदभाव पर सामाजिक शोध, बहुजन जीवन के अनुभव, शराब की लत के मनोवैज्ञानिक प्रभाव तथा पारिवारिक संघर्ष संबंधी अध्ययन।

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