लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति) सोहनलाल सिंगारिया

आमुख: संवेदना और विवेक की कसौटी पर हमारा समाज
इक्कीसवीं सदी के वैज्ञानिक युग में जब दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अंतरिक्ष विज्ञान और चिकित्सा के चमत्कारों पर चर्चा कर रही है, तब हमारे देश के दूर-दराज इलाकों से आने वाली कुछ त्रासदियां दिल दहला देती हैं।

धर्म, आस्था और परंपरा के नाम पर शरीर को अमानवीय यातनाएं देना और अंततः अपनी जान गंवा बैठना न तो ईश्वर की आराधना है और न ही कोई आध्यात्मिक उपलब्धि।

यह विशुद्ध रूप से वैज्ञानिक सोच का अभाव, अज्ञानता और अंधविश्वास का वह भयावह चक्रव्यूह है, जिसमें सबसे अधिक हमारा वंचित, भोला-भाला और बहुजन समाज पिस रहा है।

हाल ही में बिहार के सुपौल से सामने आई हृदयविदारक घटना ने एक बार फिर यह कड़वा सच उजागर किया है कि जब तक समाज में विवेक और तार्किकता की अलख नहीं जलेगी, तब तक आस्था के नाम पर ऐसे असमय काल-कवलित होने का सिलसिला थमता नजर नहीं आएगा।

सुपौल की घटना: कलश साधना या देह का संहार?

घटना का विवरण एवं पृष्ठभूमि
बिहार के सुपौल जिले के अंतर्गत त्रिवेणीगंज नगर परिषद क्षेत्र (वार्ड संख्या 4) की रहने वाली लगभग 35 वर्षीय सचिता देवी (सविता देवी) ने स्थानीय त्रिवेणीगंज बाजार स्थित बड़ी दुर्गा मंदिर परिसर में शारदीय नवरात्र के दौरान एक अत्यधिक कठिन अनुष्ठान का संकल्प लिया।

संकल्प यह था कि वे अपनी छाती पर मिट्टी का भारी कलश (घट) स्थापित कर पूरे नौ दिनों तक उसी मुद्रा में लेटकर मां दुर्गा की आराधना करेंगी।

नौ दिनों तक बिना हिले-डुले, भूख-प्यास सहकर और अपनी शारीरिक क्षमताओं को नजरअंदाज करते हुए उन्होंने यह साधना पूरी की।

नौवें दिन अनुष्ठान का विधिवत समापन हुआ, कलश हटाया गया और वे अपने घर लौटीं। परिजनों और श्रद्धालुओं ने इसे चमत्कार और परम भक्ति मानकर जयकारे लगाए।

त्रासद अंत और चिकित्सीय विश्लेषण

घर लौटने के कुछ ही घंटों बाद उनकी हालत गंभीर रूप से बिगड़ने लगी।

सीने में असहनीय दर्द की शिकायत के बाद परिजन उन्हें त्रिवेणीगंज अनुमंडलीय अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

अस्पताल के चिकित्सकों के अनुसार, नौ दिनों तक एक ही मुद्रा में बिना किसी शारीरिक हलचल के लेटे रहने, लगातार निर्जला रहने के कारण शरीर में अत्यधिक पानी की कमी (गंभीर डिहाइड्रेशन), इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बिगड़ने और रक्त संचार बाधित होने से हृदय गति रुक गई
(कार्डियक अरेस्ट)।

जिस शरीर को कुदरत ने जीवन जीने और कर्म करने के लिए दिया था, उसे आस्था के नाम पर नौ दिनों तक अमानवीय पीड़ा देकर मौत के मुंह में धकेल दिया गया।

अंधविश्वास और हठयोग के नाम पर जान गंवाने के प्रमुख भारतीय दृष्टांत

सुपौल की यह घटना कोई अकेली त्रासदी नहीं है।

भारत के अलग-अलग कोनों से समय-समय पर ऐसे वीभत्स उदाहरण सामने आते रहे हैं, जहां हठयोग, तांत्रिक क्रियाओं और अंधविश्वास ने हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ दिया

1 बुराड़ी कांड, दिल्ली (मोक्ष और वट-तपस्या का भ्रम)

वर्ष 2018 में दिल्ली के बुराड़ी में एक ही परिवार के 11 सदस्यों ने अंधविश्वास और ‘साझा मनोविकार’ के तहत एक अनुष्ठान करते हुए सामूहिक फंदे लगाकर जान दे दी।

परिवार को विश्वास दिलाया गया था कि बरगद के पेड़ की तरह लटकने से उन्हें मोक्ष मिलेगा और अलौकिक शक्ति उन्हें बचा लेगी।

यह घटना साबित करती है कि अंधविश्वास केवल अनपढ़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि पढ़े-लिखे परिवारों को भी निगल सकता है।

2 नरबलि और गुप्त धन की चाहत, मदनपल्ले (आंध्र प्रदेश)

वर्ष 2021 में आंध्र प्रदेश के मदनपल्ले में एक उच्च शिक्षित शिक्षक दंपती ने अपनी दो जवान बेटियों (एक एमबीए और दूसरी बीबीए छात्रा) की अंधविश्वास के चलते हत्या कर दी।

माता-पिता का मानना था कि कलियुग समाप्त होकर सतयुग आ रहा है और उनकी बेटियां दैवीय शक्ति से दोबारा जीवित हो उठेंगी।

3 संतान प्राप्ति और बीमारी दूर करने के लिए तांत्रिक बलि

(उत्तर प्रदेश व असम)
देश के ग्रामीण अंचलों में अक्सर ऐसी खबरें आती हैं जहां बीमारी से मुक्ति या पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए ओझाओं और तांत्रिकों के कहने पर मासूम बच्चों की बलि चढ़ा दी जाती है।

असम के चाय बागानों से लेकर उत्तर प्रदेश और उड़ीसा के गांवों तक यह अमानवीय कृत्य अक्सर सामने आता है, जहां तांत्रिकों के पाखंड पर भरोसा कर लोग अपनों का ही गला घोंट देते हैं।

4 अंगारों पर चलना और नुकीले भालों से शरीर भेदना

(दक्षिण व मध्य भारत के मेले)
तमिलनाडु, कर्नाटक और मध्य भारत के कई ग्रामीण धार्मिक मेलों में मन्नत पूरी होने के नाम पर नंगे पांव दहकते अंगारों पर चलना, गालों और जीभ में मोटे त्रिशूल या लोहे के नुकीले कांटे चुभोना आम बात है।

कई बार गंभीर रूप से जलने और सेप्टिक/टेटनस संक्रमण फैलने से निर्दोष ग्रामीणों की मौत हो जाती है या वे आजीवन दिव्यांग हो जाते हैं।

5 सर्पदंश के बाद अस्पताल की जगह झाड़-फूंक पर निर्भरता

भारत में प्रतिवर्ष हजारों लोग जहरीले सांप के काटने के बाद समय पर एंटी-वेनम इंजेक्शन लगवाने के बजाय ओझाओं, गुनियों और भोपों के पास झाड़-फूंक कराने पहुंच जाते हैं।

जब तक जहर पूरे शरीर में फैल नहीं जाता, तब तक झाड़-फूंक का ढोंग चलता रहता है और अंत में व्यक्ति तड़प-तड़प कर दम तोड़ देता है।

बहुजन समाज के लिए विचारणीय प्रश्न:

हमें क्या सोचना चाहिए?

तथागत गौतम बुद्ध, कबीर, सन्त रैदास,ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, पेरियार और बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने आजीवन जिस बहुजन समाज को अज्ञानता और अंधविश्वास के बंधनों से मुक्त कराने के लिए संघर्ष किया, क्या वह समाज आज अपने मार्ग से भटक रहा है?

संविधान का अनुच्छेद 51A (h)

भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक से यह अपेक्षा करता है कि वह अपने भीतर “वैज्ञानिक दृष्टिकोण
(Scientific Temper), मानवतावाद तथा जिज्ञासा एवं सुधार की भावना” का विकास करे।

जब हम छाती पर कलश रखकर या अपने शरीर को प्रताड़ित कर मृत्यु को गले लगाते हैं, तो हम बाबासाहेब के बनाए संविधान की मूल भावना को ही नकार रहे होते हैं।

कर्म बनाम पाखंड
क्या किसी भी धर्म या ईश्वर ने यह कहा है कि अपने प्राणों की आहुति देकर, भूखे रहकर या शरीर को लहूलुहान करके ही कृपा प्राप्त हो सकती है?

जो ईश्वर संपूर्ण सृष्टि का रचयिता माना जाता है, क्या वह अपने ही बनाए इंसान को तड़पते देखकर प्रसन्न हो सकता है?

शिक्षा ही एकमात्र मुक्ति मार्ग
बाबासाहेब आंबेडकर का स्पष्ट संदेश था—
शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।

उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि हठयोग करो, छाती पर कलश रखो या अंधभक्ति में अपनी
जान दांव पर लगा दो।

आज बहुजन समाज को अस्पतालों, आधुनिक प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों और तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता है, न कि ऐसे प्राणघातक अनुष्ठानों की।

जन-जागरण की दिशा में आवश्यक संकल्प

1 अंधविश्वास का सामाजिक बहिष्कार

धर्म और व्यक्तिगत आस्था किसी की भी निजी भावना हो सकती है, परंतु जब आस्था ‘आत्मघाती हठयोग’ या ‘अंधविश्वास’ का रूप ले ले, तो समाज और परिवार के प्रबुद्ध नागरिकों को आगे आकर उसे तत्काल रोकना चाहिए।

2 चिकित्सा विज्ञान पर विश्वास

किसी भी प्रकार की शारीरिक अस्वस्थता या जीवन-संकट के समय केवल और केवल प्रमाणित चिकित्सकों और आधुनिक चिकित्सा पद्धति पर भरोसा करें, तांत्रिकों या चमत्कारों पर नहीं।

3 वैज्ञानिक चेतना का प्रसार

गांवों, ढाणियों और कस्बों में नियमित रूप से जागरूकता गोष्ठियां आयोजित हों।

युवाओं को यह सिखाया जाए कि चमत्कार नाम की कोई चीज नहीं होती; हर घटना के पीछे एक वैज्ञानिक कार्य-कारण संबंध होता है।

4 महिला स्वास्थ्य और सुरक्षा

अक्सर अंधविश्वास और कठिन व्रतों की सबसे बड़ी शिकार महिलाएं बनती हैं। परिवार के मुखियाओं और समाज के चिंतकों का यह दायित्व है कि वे महिलाओं को ऐसी जानलेवा प्रथाओं से बचाएं और उनके पोषण, शिक्षा तथा स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें।

जीवन-पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरक विचार

आस्था अगर जीवन को संवारती है, मानवीय मूल्यों को बढ़ाती है और समाज में करुणा पैदा करती है, तो वह वंदनीय है।

किंतु जो आस्था जीवन ही छीन ले, वह धर्म नहीं बल्कि विनाश का मार्ग है।

सुपौल की सचिता देवी की मौत हमारे पूरे समाज के गाल पर एक जोरदार तमाचा है।

अब समय आ गया है कि आम से लेकर खास तक, प्रत्येक नागरिक अपनी आंखें खोले, विवेक को जाग्रत करे और अंधविश्वास के इस घने अंधेरे को ज्ञान तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण की मशाल से मिटाने का संकल्प ले।

लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहनलाल सिंगरिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक, ब्यावर-94622-60179

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