एक शराबी की आत्मकथा :
मेरी महफिल में दुनिया थी, मगर मेरे दर्द में कोई नहीं !मैं एक शराबी हूँ। यह मेरी पहचान बन गई है, लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि आखिर मैं ऐसा बना क्यों? मेरी बोतल दिखाई देती है, मेरा लड़खड़ाता शरीर दिखाई देता है, मेरी लड़खड़ाती जुबान दिखाई देती है, लेकिन मेरे भीतर जो कुछ टूट चुका है, उसे देखने की फुर्सत किसी के पास नहीं है।
लोग मुझे शराबी कहते हैं। कुछ मेरा मजाक उड़ाते हैं, कुछ मुझसे दूरी बनाते हैं और कुछ मुझे देखकर नाक-भौं सिकोड़ते हैं। मगर कोई मेरे भीतर उतरकर यह जानने की कोशिश नहीं करता कि जिस आदमी को आज शराब का सहारा लेना पड़ रहा है, उसकी जिंदगी में कभी ऐसे भी दिन रहे होंगे, जब उसने बिना किसी सहारे के अपने सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष किया होगा।मैं यह नहीं कहता कि शराब पीना मेरी मजबूरी है। मैं अपनी गलतियों से इनकार भी नहीं करता। लेकिन मेरी कहानी का एक पक्ष वह भी है, जिसे दुनिया अक्सर देखना ही नहीं चाहती।
शाम होते ही मेरे अपने बढ़ जाते हैं ,शाम ढलती है, तो मेरे आसपास लोगों की भीड़ जमा होने लगती है। कोई मुझे गले लगाता है, कोई कंधे पर हाथ रखता है और कोई गिलास उठाकर कहता है, ”भाई, तू अकेला नहीं है। हम सब तेरे साथ हैं। दुनिया चाहे जो कहे, हम तुझे कभी नहीं छोड़ेंगे।”
उनकी बातें सुनकर कुछ देर के लिए मुझे लगता है कि शायद मैं गलत हूँ। शायद दुनिया उतनी बुरी नहीं, जितनी मुझे दिखाई देती है। शायद मेरे पास भी ऐसे लोग हैं, जिन्हें मेरी परवाह है। मैं भी हँसता हूँ, अपनी परेशानियाँ सुनाता हूँ और उनकी बातों में अपना दुख भुलाने की कोशिश करता हूँ।उस छोटी-सी महफिल में हर कोई मेरा अपना होता है। कोई मुझे समझदार बताता है, कोई मेरी अच्छाइयों की तारीफ करता है और कोई मेरे दुखों को अपना दुख बताता है।
लेकिन उस समय मैं यह नहीं समझ पाता कि नशे की मेज पर किए गए वादों और जिंदगी की जिम्मेदारियों के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है।शराब की महफिल में अपनापन जताना आसान है, लेकिन किसी के बुरे समय में उसका हाथ थामना कठिन।
रात गहराती है। एक-एक करके सब उठने लगते हैं। किसी को अपने बच्चों के पास जाना है, किसी को पत्नी की प्रतीक्षा समाप्त करनी है, किसी को सुबह काम पर जाना है। सबके पास लौटने के लिए कोई न कोई घर है, कोई न कोई अपना है, कोई न कोई जिम्मेदारी है।और मैं?मैं वहीं बैठा रह जाता हूँ, उस खाली गिलास को देखते हुए, जिसमें कुछ देर पहले मुझे अपनी दुनिया दिखाई दे रही थी।
नशा उतरता है, तो सच्चाई सामने आती है
जब आखिरी साथी भी चला जाता है, तब महफिल की सारी आवाजें एकाएक खामोश हो जाती हैं। मेज पर बिखरे गिलास, शराब की गंध और कमरे में फैला सन्नाटा मुझे घेर लेते हैं।कुछ देर पहले जो लोग मुझे दुनिया का सबसे खास इंसान बता रहे थे, वे अब अपनी-अपनी दुनिया में लौट चुके होते हैं।कभी मुझे उल्टी करते हुए अकेले रात काटनी पड़ती है। कभी नशे में बेसुध होकर पड़ा रहता हूँ। कभी लड़खड़ाते कदमों से घर लौटता हूँ और कभी रास्ते में ही सोचने लगता हूँ कि आखिर मैं अपनी जिंदगी के साथ कर क्या रहा हूँ?
सबसे ज्यादा दर्द तब होता है, जब मैं अपने आपसे नजरें नहीं मिला पाता।मैं जानता हूँ कि घर में मेरे लिए चिंता करने वाले लोग हैं। मेरी हरकतों से दुखी होने वाले लोग हैं। मेरी प्रतीक्षा करते-करते थक जाने वाली आँखें हैं। शायद कोई मेरे लौटने की आहट सुनता है, लेकिन दरवाजा खुलते ही मेरे नशे को देखकर उसकी आँखों में चिंता के साथ निराशा भी उतर आती है।
मैं कभी उनकी नाराजगी को समझ नहीं पाया। मुझे लगता रहा कि वे मुझे समझते नहीं, मेरी आजादी में बाधा डालते हैं और मेरे दुखों की परवाह नहीं करते।आज सोचता हूँ तो लगता है कि शायद वे मेरी जिंदगी बचाने की कोशिश कर रहे थे और मैं इसे अपनी जिंदगी में दखल समझ रहा था।जिस परिवार को हम अपनी परेशानी समझने लगते हैं, कभी-कभी वही परिवार हमारी जिंदगी की आखिरी उम्मीद होता है।
मेरी गलती केवल शराब नहीं, मेरी सोच भी थी,मैंने दूसरों से अपनापन माँगा, लेकिन अपने घर में मौजूद अपनापन पहचानने में देर कर दी। मैंने उन लोगों पर भरोसा किया, जिनके साथ मेरा रिश्ता कुछ घंटों की महफिल तक सीमित था। मैंने उन लोगों को अपना हमदर्द मान लिया, जिन्हें शायद मेरी जिंदगी की अगली सुबह से कोई मतलब नहीं था।लेकिन सच यह भी है कि सारी जिम्मेदारी दूसरों पर डालकर मैं स्वयं को निर्दोष नहीं बता सकता।
मेरे फैसलों ने भी मेरी जिंदगी को नुकसान पहुँचाया। जब मुझे अपने दुखों का सामना करना चाहिए था, तब मैंने उनसे बचने का रास्ता चुना। जब मुझे किसी से खुलकर बात करनी चाहिए थी, तब मैंने बोतल उठा ली। जब मुझे अपने रिश्तों को सँभालना चाहिए था, तब मैं उन्हीं रिश्तों से दूर भागता रहा।धीरे-धीरे शराब मेरे लिए एक पेय नहीं रही। वह मेरी आदत बनी, मेरी जरूरत महसूस होने लगी और फिर मेरी जिंदगी पर हावी हो गई।
मैंने यह भी नहीं देखा कि मेरे आसपास के लोग कितने बदल गए हैं। जो कभी मेरे साथ बैठकर हँसते थे, वे अब मुझसे बचने लगे। जिनसे मैं अपने दुख बाँटता था, उन्होंने मेरी बातों को गंभीरता से लेना बंद कर दिया। मेरी कही हुई सच्ची बात भी लोगों को नशे में कही गई बात लगने लगी।सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं थी कि लोग मुझ पर विश्वास करना छोड़ रहे थे। सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि धीरे-धीरे मैं स्वयं पर विश्वास खोता जा रहा था।
समाज से मेरा एक सवाल है ?मैं समाज से पूछना चाहता हूँ कि शराबी को देखकर उसका मजाक उड़ाना कितना आसान है! उसे निकम्मा कहना कितना आसान है! उससे मुँह फेर लेना कितना आसान है!लेकिन क्या कभी किसी ने यह जानने की कोशिश की कि वह इस स्थिति तक पहुँचा कैसे? क्या किसी ने उसके दुख को गंभीरता से सुना? क्या किसी ने उसे शराब छोड़ने के लिए उचित सहायता दिलाने की कोशिश की?
यह सवाल शराब पीने को उचित ठहराने के लिए नहीं है। शराब की लत व्यक्ति और परिवार, दोनों को नुकसान पहुँचा सकती है। इसके लिए जिम्मेदारी स्वीकार करना और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सहायता लेना आवश्यक है।लेकिन किसी व्यक्ति की गलती को उसकी पूरी पहचान बना देना भी उचित नहीं है।
हमें यह समझना होगा कि नशे की समस्या से जूझ रहे व्यक्ति को अपमानित करने के बजाय उसकी समस्या को पहचानना जरूरी है। परिवार को सहारा चाहिए, बच्चों को सुरक्षित वातावरण चाहिए और उस व्यक्ति को भी उपचार तथा सुधार का अवसर मिलना चाहिए।सहानुभूति का अर्थ गलत व्यवहार को स्वीकार करना नहीं है। सहानुभूति का अर्थ है गलत व्यवहार के परिणाम स्पष्ट रखते हुए व्यक्ति को उससे बाहर निकलने का रास्ता दिखाना।
अभी मेरी कहानी का अंत नहीं हुआ,आज मैं अपनी जिंदगी के उस मोड़ पर खड़ा हूँ, जहाँ पीछे मुड़कर देखने पर पछतावा दिखाई देता है और आगे देखने पर एक कठिन रास्ता।मैं जानता हूँ कि केवल एक भावुक संकल्प से शराब की लत समाप्त नहीं हो जाती। इसके लिए दृढ़ निर्णय, परिवार का सहयोग और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की मदद आवश्यक हो सकती है। मैं अपनी स्थिति को स्वीकार करके बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाना चाहता हूँ।
मैं अपने परिवार से क्षमा माँगना चाहता हूँ, लेकिन केवल शब्दों से नहीं। मैं अपने व्यवहार में बदलाव लाकर उन्हें यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि मेरी जिंदगी अभी समाप्त नहीं हुई है।मैं चाहता हूँ कि मेरे बच्चे मुझे केवल एक शराबी के रूप में याद न रखें। वे यह भी जानें कि उनका पिता गलतियों के बावजूद उनसे बाहर निकलने की कोशिश कर सकता था। मैं चाहता हूँ कि मेरे अपने मुझे देखकर निराश होने के बजाय एक दिन यह कह सकें कि उन्होंने मुझे टूटते हुए भी देखा और फिर अपने जीवन को सँभालने का प्रयास करते हुए भी।
अब मैं समझ गया हूँ कि जिंदगी में भीड़ जुटाना उपलब्धि नहीं है। असली उपलब्धि है ऐसे रिश्ते बनाना, जिनमें विश्वास हो, जिम्मेदारी हो और एक-दूसरे के दुख को समझने की ईमानदार कोशिश हो।मेरी जिंदगी ने मुझे एक कड़वा सबक दिया है—महफिल में साथ बैठने वाले अनेक हो सकते हैं, लेकिन जीवन को सँभालने के लिए सच्चे सहयोग और अपने निर्णयों की जिम्मेदारी की जरूरत होती है।
आज भी जब शाम ढलती है, तो मेरे सामने दो रास्ते होते हैं। एक वह, जिस पर चलकर मैं कुछ घंटों के लिए अपने दुख भूल सकता हूँ और फिर उसी अकेलेपन में लौट सकता हूँ। दूसरा वह, जिस पर चलने के लिए मुझे अपने दुखों का सामना करना होगा, अपनी गलतियों को स्वीकार करना होगा और धीरे-धीरे अपने जीवन को बदलना होगा।
मैं अब दूसरे रास्ते को चुनना चाहता हूँ,क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरी जिंदगी का आखिरी सच केवल इतना रह जाए कि मैं शराब पीता था और एक दिन अकेला मर गया।मैं चाहता हूँ कि मेरी कहानी किसी दूसरे व्यक्ति के लिए चेतावनी बने, किसी परिवार के लिए समझ बने और किसी निराश इंसान के लिए उम्मीद बने।
मैं शराब का गुलाम बनकर नहीं, अपनी गलतियों से लड़कर जीना चाहता हूँ।और अगर मेरी यह कहानी किसी एक इंसान को भी शराब के सहारे अपने दुखों से भागने के बजाय उनका सामना करने की प्रेरणा दे सके, तो शायद मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी हार भी किसी दूसरे की जीत का कारण बन जाएगी।
शेर
महफिल में सबने कहा कि हम तेरे साथ हैं,
रात ढली तो दर्द था, तन्हाई थी और हम थे।

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड,
डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)।
स्रोत एवं संदर्भ
डाक्टर यति की थ्रेड्स पर पोस्ट से प्रेरित एवं विश्व स्वास्थ्य संगठन, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और भारतीय मनोरोग सोसायटी के दिशा-निर्देशों से शराब की लत, मनोदशा, पारिवारिक प्रभाव और उपचार संबंधी जानकारी ली गई।
