साहित्यिक संदर्भ:
मूल पुस्तक

मांझल रात
राजस्थानी लोक-कथावां रो प्रसिद्ध संग्रह

मूल लेखिका:
पद्मश्री रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत

लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति) सोहन लाल सिंगारिया
प्राचार्य (RES) ब्यावर

मंगलाचरण एवं भूमिका

मरुधरा री आ पावन धरती केवल रजवाड़ां री तरवारां, गढ़ां री कांगूरां अर महलां रा ठाठ-बाट ताई सीमित कोनी।

ईं माटी री असली सुगंध झोंपड़ियां मांय पसीनो बहावण आळा श्रमजीवियां, माटी खोद’र ताल-तलैया बणावण आळा कारिगरां अर आपरै सत-सील माथै प्राण न्यौछावर करण आळी सतवंती नारियां रै चरित्रां मांय समायी थकी है।

‘जसमल ओड़न’ री आ अमर गाथा केवल एक पनिहारी या मजूरी करण आळी लुगाई री व्यथा कोनी, बल्कि निरंकुश सामंती राजसत्ता, कामंध अहंकार अर अकूत धन-दौलत रै सामै एक श्रमजीवी नारी रै अडिग सतीत्व, स्वाभिमान अर सामाजिक प्रतिरोध री बुलंद हुंकार है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर माथै विख्यात लोकनाट्य ‘भवाई’ मांय जसमल ओड़न रो वेश आज भी जन-जन रै हिवड़ै मांय स्वाभिमान रो मंतर फूँकै है।

१. अकाल रो तांडव अर ओड़ समाज रो पाटन कूच

मरुधरा मांय जदी दुष्काल आपरा विकराल डैणा पसारै, तो धरती रा काळजा फाट ज्यावै।

आकास सूं अंगारा बरसै, रूख-पंछी बिलखै अर कुंआ-बावड़ियां पाताल पूग ज्यावै।

जीव-जंतु अर मनख दाणा-पाणी सारू भटकाव मांय पड़ ज्यावै।

अैड़े ई एक दोहरे अकाल रै बखत मारवाड़-जैसलमेर री रेतीली धरती रा ओड़ समुदाय माथै विपदा रो पहाड़ टूट पड़्यो।

ओड़—जकी कौम आपरी कुदाली अर फावड़ां सूं बंजर माटी मांय पाळ बांध’र अमृत समान सरोवर खोदण मांय माहिर मानी जावती।

जदी आपरी मायड़ भौम माथै मजूरी नीं मिली, तो भूख सूं बिलखता टाबरां अर डांगरां रो पेट भरण सारू ओड़ां आपरा बोरिया-बिस्तर, गदहा, गाडा अर तगाड़ियां संभाली अर गुजरात रै पाटन नगर कानी कूच कियो।

दिनूगै सूं संझा तांई धूप-लू मांय पांयरू चालता। सांझ ढळतां ई मारग मांय विसाव करतो, अलाव चेततो अर बाजरे री सोगा-रोटियां सिकती।

दुखों रा पहाड़ माथै हुवता थकां ई ओड़ समाज री जिजीविषा डिगी कोनी।

रात रै सन्नाटै मांय जदी ढोलक री थाप बजती, तो औरत-मर्द थकावट बिसार’र लोकगीत गावता अर नाचकूद कर मन रो भार हळको करता।

इणी कारवां मांय ओड़ रूपा रो घर हो, अर रूपा री धणियाणी ही—जसमल।

२. रूप री मूरत अर सील री सरवर: जसमल

विधाता जणै आपरी सारी कला अर लावण्य नै निचोड़’र जसमल री काया रची ही।

जसमल साक्षात कुंदन ही। मस्तक माथै सूरज री पहली किरण सो तेज, म्रगनयनी सी चंचल अर गहरी आंखियां, गेहुंओ रंग अर कद-काठी ऐड़ी जणै साक्षात मरु-लक्ष्मी माटी मांय उतर आयी हुवै।

जदी वो माथै सूं पसीनो पोंछती, तो उणरी सादगी आगै महलां री रूपवती राणियां रो रूप भी फीको पड़ जावतो।

पण जसमल रो असली गहणो उणरो हाड-मांस कोनी हो, उणरो असली सिंगार हो उणरो ‘सील’ (पातिव्रत धर्म अर आत्मसम्मान)।

गरीब घर मांय जलमी, मजूरी करण आळी आ ओड़न आपरै भरतार रूपा सूं अगाध प्रेम करती।

रूपा ओड़ रो शरीर मजूरी सूं काबर-काबर हुय चुक्यो हो, पण जसमल रै वास्ते वो ई उणरो संसार अर परमेश्वर हो।

रूप रो घमंड जसमल कनै फटक्यो तक कोनी हो; उणरो मन गंगा जळ सो निर्मल अर हिमालय सो अडिग हो।

३. पाटन मांय सहस्रलिंग तळाव रो निर्माण
गुजरात रो शासक सिद्धराज जयसिंह (किंवा आख्यान मांय वर्णित राव खंगार) पाटन मांय आपरी कीर्ति अमर करण खातर विशाल ‘सहस्रलिंग तळाव’ रो निर्माण करवा रह्यो हो।

हजारूं मजदूर, पाषाण-शिल्पी अर ओड़ ईं महायज्ञ मांय रात-दिन माटी उपणण लागा हा।

मारवाड़ सूं आया ओड़ां नै भी तळाव खोदण री मजूरी मिली।

जेठ री तपती धूप मांय जठै तावड़ो अंगारा बरसावतो, वठै जसमल आपरै पति रै सागे तगाड़ी उठावती, गदहा माथै माटी लादती अर पाळ बांधती।

माटी-धूळ सूं सनी जसमल जदी पाळ माथै चालती, तो उणरै पांय री पायल री रुणझुण मजूरी रै पसीने नै संगीत बणा देती। श्रम साधना मांय लीन जसमल रो रूप तळाव रै काठै अणूठो दीपतो।

४. राजा री काम-दृष्टि अर वासना रो बवंडर

एक दिन पाटन रो राजा असवार हुय’र तळाव रै काम रो मुआयजो करण नीकळ्यो।

तुर्की अर अरबी नसल रा घमंडी घोड़ा, लाल मखमल री जीन, जरदोजी पोशाक अर हाथ मांय सोने री मूठ आळी तलवार। सत्ता रै मद मांय चूर राजा जदी तळाव री पाळ कनै पूग्यो, तो अचानक उणरी निजर सरोवर रै काठै मुंडो धोवती जसमल माथै जा पड़ी।

जसमल आपरा हाथ-पग धोय’र पाणी री छींटां मुखड़े माथै लेय रही ही।

उणरे मुख माथै टपकती पाणी री बूँदां मोती बण’र दमकै ही। राजा री आंखियां जठै अटकी, वठै ही थंभ गी।

घोड़े री लगाम हाथ सूं ढीली पड़ गी अर राजा चित्रां लिख्यो सो थिर हुय गयो।

राज-मद, रूप-मद अर सत्ता री निरंकुशता राजा रै विवेक नै लील गी। वो मन ही मन विचारण लाग्यो— “आ विधाता री अद्भुत रचना एक दरिद्र ओड़ रै झोंपड़े मांय माटी क्यूं खोद रही है? ईं अप्सरा रो ठिकाणो आ कंकर-माटी कोनी, आ तो म्हारे राजमहलां रो सिंगार अर पाट-राणी बणण जोग है!

५. प्रलोभन रो विष अर जसमल री स्वाभिमानी फटकार

राजा जसमल रै सामै पूग्यो अर सामंती दंभ सूं भरियो मीठो विष घोलतां बोल्यो— “हे सुंदरी! थूं कुण है?

थारी आ सुकोमल काया ईं कठोर माटी अर धूप खातर कोनी बणी।

ईं काले-कलूटे, दरिद्र ओड़ नै छोड़। म्हारे सागे पाटन रै राजमहलां मांय चाल।

थनै पटरानी रो दरजो देसूं, रेशम रा चीर पहरावसूं, नौलखा हार अर रतन जड़ित झरोखां थारो इंतजार करै है। थूं महलां मांय राज कर, मजूरी री ठोकर क्यूं खावै?

राजा रा अै लंपट बोल सुण’र जसमल रो रगत खौल उठ्यो।

उणरी भृकुटि तन गी, आंखियां मांय तेज उतर आयो अर वो सतीव्वता नारी सिंहणी री भांत गरज उठी— “खबरदार राजा!

आपरी मर्यादित जीभ नै वश मांय राख। थूं राजा हुय’र प्रजा री रक्षा करण रो वचन भूल गयो अर पर-नारी माथै कुदृष्टि डाळ रह्यो है?

थारै महलां रा वैभव, रेशम रा चीर अर सोने-चांदी रा टुकड़ा म्हारै पांय री धूळ बराबर है!

म्हारो ओ ओड़, म्हारो पति म्हारो परमेश्वर है। म्हारी कुदाली, म्हारो पसीनो अर म्हारो झोंपड़ो थारे महलां सूं लाख गुणा पवित्र है। म्हारा गदहा थारै ईं घमंडी घोड़ां सूं घणा वफादार है!

थारो राज-सुख तनै मुबारक, आपरी वासना रो थूक म्हारै माथै मत फेंक!

६. सत्ता रो दमन अर ओड़ समुदाय रो संकट
एक साधारण मजदूर ओड़न रै मुख सूं ऐड़ी धिक्कार सुण’र राजा रो अहंकार तिलमिला गयो।

राज-सत्ता जदी वासना मांय आंधळी हुवै, तो उणनै तर्क अर नैतिकता कोनी दीसै।

राजा सोच्यो कै एक मजूरी करण आळी नारी री आ मजाल कै वो गुजरात रै छत्रपति नै ना कहवै?

राजा धमकी दी— “ओड़न! थूं म्हारी ताकत नै जाणे कोनी। जे थूं राजी-खुशी म्हारी नीं बणी, तो थारै आख्यां रै सामै थारै पूरे ओड़ समाज नै गाजर-मूली री भांत कटवा देसूं!

ओड़ समाज माथै संकट रा बादल घिर आया। राजा रा सिपाही तळाव नै घेर लियो।

रूपा ओड़ अर ओड़ समुदाय रा लोग थर-थर कांपण लागा, पण जसमल रो धेर्य अडिग रह्यो।

उण ओड़ भाईयां नै कह्यो— “डरो मत भाईयों! देह सूं पैला धरम अर सतीत्व हुवै।

जे आज म्हूं झुक गी, तो काल नै कोई सत्ताधीश मजूरां री बहु-बेटियां री आबरू नै सुरक्षित कोनी रहण देला।

७. महा-बलिदान (सील री रक्षा सारू आत्मोत्सर्ग)
राजा वासना रै उन्माद मांय अंधो हुय’र जसमल नै जबरन बंदी बणावण सारू अगाड़ी बढ़्यो।

सैना ओड़ मजूरां माथै टूट पड़ी। जदी जसमल देख्यो कै लंपट राजा मर्यादा री सारी सीमावां लांघ चुक्यो है अर अब देह री रक्षा रो कोई मारग कोनी बच्यो, तो उण आपरै कमर सूं तेज धार आळी कटार खींची।

जसमल राजा नै ललकारतां थकां चीखी— “अधर्मिया! थूं म्हारै जीते-जी म्हारै तन नै छूवण रो सपनो भी मत देखजे।

आ मरुधरा री बेटी आपरी आबरू रो सोदो महलां रै सुख खातर कदैय कोनी करै!

इत्तौ कह’र जसमल बिना एक पल गंवाया आपरी छाती मांय कटार घोंप ली।

सतीत्व रो रगत धरती माथै बहवण लाग्यो।

चारूपासे हाहाकार मच गयो। धरती कांप उठी अर आकास सूं जणै बिजळियां कड़क उठी।

मरती बखत जसमल पाटन रै राजा अर उणरै तळाव नै श्राप दियो— “पापी राजा!

जणी तळाव रै अभिमान मांय थूं म्हारी आबरू लूटणी चाही, वो थारो सहस्रलिंग तळाव कदैय पाणी सूं कोनी भरावे! ईं मांय केवल धूळ उड़ेला अर थारो राज-वंश निर्वंश हुय’र खाक मांय मिल जावेला!

जसमल आपरो प्राण त्याग दियो। एक साधारण ओड़न आपरै शील अर स्वाभिमान री वेदी माथै आत्मोत्सर्ग कर अमरता नै वरण कर लियो।

८. जसमल ओड़न री गाथा रो सामाजिक, आर्थिक एवं वैचारिक चिंतन प्राचार्य सोहनलाल सिंगारिया रै वैचारिक दृष्टिकोण सूं

जसमल ओड़न री आ अमर गाथा केवल एक विरह या करुण अंत री लोक-वार्ता कोनी, ईं कथा मांय गूंजता सामाजिक-आर्थिक अर नैतिक सवाल आज रै युग मांय भी उत्ता ई प्रासंगिक है

1 श्रम री गरिमा बनाम सामंती उन्माद

जसमल ओड़न साबित कर दियो कै महलां मांय रेशम ओढ़ण आळा शासकां सूं घणी ऊंची निष्ठा, चरित्र अर स्वाभिमान झोंपड़ियां मांय पसीनो बहावण आळा श्रमजीवियां रो हुवै। मेहनत री कमाई खावण आळो समाज कदैय अनैतिक प्रलोभनां आगै सीस कोनी झुकावै।

2 स्त्री स्वाभिमान रो सार्वभौमिक रूप

इतिहास मांय अक्सर राजमहलां री राणियों, पद्मिनी, कर्मावती,रै जौहर री गाथावां गाईजती रही, पण जसमल ओड़न री गाथा सिद्ध कियो कै सत, शील अर त्याग कोई महलां री बपौती कोनी।

माटी खोदण आळी एक श्रमजीवी नारी भी आपरी अस्मिता सारू सर्वोच्च बलिदान देय सकै है।

3 सत्ता रो नैतिक पतन अर प्रतिरोध

जदी राजा रक्षक सूं भक्षक बण ज्यावै, तो उणरो विनाश तय हुवै। जसमल रो कटार घोंपणो वास्तव मांय सामंती व्यवस्था अर पुरुषवादी निरंकुशता रै मुंह माथै करारी चपत हो। ओ मूक जनता रो सत्ता रै सामै प्रखर प्रतिरोध हो।

4 लोक-संस्कृति मांय जीवंत चेतना

आज भी गुजरात अर राजस्थान री लोक-संस्कृति, भवाई नृत्य अर लोक-गीत जसमल ओड़न री पवित्रता अर शूरवीरता री साख भरै है।

जसमल नारी अस्मिता री अमर मशाल है।

उपसंहार
जसमल ओड़न आपरै बलिदान सूं मरुधरा अर पाटन री धरती माथै सत रो ऐड़ो दीप जलायो जको जुग-जुगांतर तांई प्रकाश देतो रहैला।

आ कथा आपां नै सिखावै है कै भौतिक साधन, सत्ता रो डर अर संपदा रो प्रलोभन मनख रै चरित्र अर आत्मसम्मान सूं बड़ो कदैय कोनी हुय सकै।

जसमल ओड़न रो नाम लोक-इतिहास मांय ध्रुवतारे री भांत सदैव चमकतो रहैला।

साहित्यिक संदर्भ:
मूल पुस्तक: मांझल रात

राजस्थानी लोक-कथावां रो प्रसिद्ध संग्रह

मूल लेखिका: पद्मश्री रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत

लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहनलाल सिंगारिया
प्राचार्य (RES)
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक, ब्यावर 9462260179

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