आमुख: हक की लड़ाई और संवैधानिक न्याय

लोकतांत्रिक व्यवस्था में संविधान केवल नियमों की पुस्तक नहीं, बल्कि बहुजन और वंचित समाज के आत्मसम्मान, समता और अस्तित्व की ढाल है।

दशकों से प्रशासनिक तंत्र की रूढ़िवादी, पूर्वाग्रह से ग्रसित और जातिवादी मानसिकता यह भ्रांति फैलाती रही है कि ‘सामान्य श्रेणी’ (General Category) केवल एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की बपौती है, और आरक्षित वर्ग के मेधावी युवाओं को उनकी निर्धारित सीमाओं में ही बांधकर रखा जाना चाहिए।

लेकिन सत्य यह है कि योग्यता किसी वर्ग विशेष की जागीर नहीं होती।

हाल ही में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय (IGU), मीरपुर (रेवाड़ी) भर्ती विवाद में दिया गया ऐतिहासिक निर्णय उस प्रशासनिक षड्यंत्र पर करारा तमाचा है, जो आरक्षित वर्ग की प्रतिभाओं को उनके वाजिब हक से वंचित करता रहा है।

यह निर्णय न केवल एक न्यायिक आदेश है, बल्कि बहुजन समाज के युवाओं के लिए एक प्रेरणादायक दस्तावेज है, जो यह सिद्ध करता है कि यदि चेतना जागृत हो और संघर्ष संवैधानिक हो, तो हक छीनने वाली ताकतों को झुकना ही पड़ता है।

प्रकरण की पृष्ठभूमि: प्रशासनिक हठधर्मिता और व्यवस्था का दोहरा चरित्र

इस पूरे मामले की जड़ें दिसंबर 2019 में इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय, मीरपुर (रेवाड़ी) हरियाणा द्वारा विज्ञापित लैबोरेटरी अटेंडेंट के 13 पदों की भर्ती से जुड़ी हैं।

इन 13 पदों में से 6 पद सामान्य (अनारक्षित) श्रेणी के लिए तथा 1 पद आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए आरक्षित रखा गया था।

इस भर्ती में एक प्रतिभागी, मनजीत कुमार ने EWS श्रेणी के तहत पूर्ण निष्ठा और तैयारी के साथ आवेदन किया।

टाइपिंग स्किल टेस्ट और एप्टीट्यूड टेस्ट के आधार पर उसने कुल 37.91 अंक अर्जित किए।

जब अंतिम चयन परिणाम घोषित हुए, तो प्रशासनिक तंत्र की दुर्भावना खुलकर सामने आ गई।

परिणाम सूची में सामान्य श्रेणी में ऐसे कई अभ्यर्थियों का चयन कर लिया गया था, जिनके अंक मनजीत कुमार के 37.91 अंकों से काफी कम थे।

स्वाभाविक रूप से जब मनजीत कुमार ने इस घोर अन्याय का विरोध किया, तो विश्वविद्यालय प्रशासन ने संवेदनहीन और मनमाना तर्क प्रस्तुत किया।

प्रशासन का कहना था कि चूंकि अभ्यर्थी ने EWS कोटे के तहत आवेदन किया था और वह अपनी उस विशेष श्रेणी में मेरिट सूची में तीसरे स्थान पर था, इसलिए उसे केवल 1 आरक्षित पद के दायरे में ही देखा जाएगा; उसे अनारक्षित यानी जनरल श्रेणी की सीट पर अवसर नहीं दिया जा सकता।

यह तर्क स्पष्ट रूप से उस मानसिकता का परिचायक था, जो आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी को अधिक अंक लाने के बावजूद केवल ‘कोटे का बंदी’ बनाए रखना चाहती है।

प्रशासन के इस अन्याय के आगे घुटने टेकने के बजाय मनजीत कुमार व अन्य अभ्यर्थियों ने संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा के लिए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कानूनी संघर्ष का मार्ग चुना।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘ओपन सीट किसी की जागीर नहीं’ माननीय पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बराड़ की एकल पीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई करते हुए विश्वविद्यालय के रवैये को पूरी तरह असंवैधानिक, गैर-कानूनी और मनमाना करार दिया।

अदालत ने अत्यंत तीखे और स्पष्ट शब्दों में संवैधानिक व्यवस्था को रेखांकित करते हुए कहा:

ओपन या जनरल कैटेगरी किसी एक वर्ग विशेष के लिए आरक्षित कोटा नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से खुली मेरिट पर आधारित व्यवस्था है।

उच्च न्यायालय ने इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के मील का पत्थर साबित हुए पूर्व निर्णयों, विशेषकर सौरव यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य तथा बीएसएनएल बनाम संदीप चौधरी मामलों का विस्तृत हवाला दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आरक्षण का नियम यह है कि यदि आरक्षित श्रेणी (SC, ST, OBC, EWS) का कोई भी अभ्यर्थी बिना किसी विशेष आयु या योग्यता संबंधी छूट के केवल अपनी मेधा और परिश्रम से सामान्य कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो उसे स्वतः ही अनारक्षित (Open/General) सीट पर चयनित माना जाएगा।

उसे उसकी जाति या आर्थिक श्रेणी के कोटे तक सीमित रखकर उससे कम अंक वाले अभ्यर्थी को अनारक्षित सीट देना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (अवसर की समानता) का सीधा उल्लंघन है।

विश्वविद्यालय को हाईकोर्ट के 4 कड़े निर्देश: न्याय की संपूर्ण बहाली अदालत ने केवल सिद्धांत प्रतिपादित नहीं किए, बल्कि पीड़ित अभ्यर्थियों को उनका पूर्ण हक दिलाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन को 4 स्पष्ट और बाध्यकारी निर्देश जारी किए:

1 मेरिट के आधार पर तत्काल नियुक्ति

विश्वविद्यालय प्रशासन को निर्देशित किया गया कि वह याचिकाकर्ताओं की मेरिट का पुनः पारदर्शी आकलन करे और उन्हें सामान्य (अनारक्षित) श्रेणी के अंतर्गत अविलंब नियुक्ति पत्र जारी करे।

2 सुपरन्यूमरेरी (अधिसंख्य) पदों का सृजन:

यदि वर्तमान में स्वीकृत पद समाप्त या भर चुके हैं, तो हरियाणा सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन 6 सप्ताह के भीतर विशेष अधिसंख्य (Supernumerary) पद सृजित करे ताकि योग्य याचिकाकर्ता को पदस्थापित किया जा सके।

3 पूर्व चयनित कर्मियों का संरक्षण:

अदालत ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए यह भी निर्देशित किया कि जो अभ्यर्थी पहले से चयनित होकर कार्य कर रहे हैं, उन्हें सेवा से न हटाया जाए; उनकी नौकरी पूरी तरह सुरक्षित रहेगी।

4 काल्पनिक वरिष्ठता (Notional Seniority) का अधिकार:

सबसे महत्वपूर्ण निर्देश यह था कि नव-नियुक्त होने वाले इन योग्य अभ्यर्थियों को उसी ऐतिहासिक तिथि से काल्पनिक वरिष्ठता और सेवा लाभ दिए जाएं, जिस तिथि से उनसे कम अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों को नियुक्त किया गया था।

कानूनी विश्लेषण: आरक्षित वर्ग के लिए इसका गहरा संवैधानिक मंतव्य

बहुजन और वंचित समाज को यह मूलभूत अंतर भली-भांति समझना होगा कि आरक्षण एक न्यूनतम गारंटी (Floor) है, अधिकतम सीमा (Ceiling) नहीं।

अनारक्षित (Unreserved)
बनाम आरक्षित

भारत का संविधान किसी ‘सवर्ण कोटे’ की कल्पना नहीं करता।

अनारक्षित वर्ग 100% खुला आकाश है, जिसमें जो भी मेधावी पक्षी सबसे ऊंची उड़ान भरेगा, वह स्थान उसका होगा—चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या वर्ग से आता हो।

कोटे की सुरक्षा:
जब एक आरक्षित वर्ग का अभ्यर्थी अपनी मेहनत से ओपन मेरिट में सीट हासिल करता है, तो आरक्षित वर्ग की वह मूल सीट उस वर्ग की पिछली पंक्ति में खड़े भाई या बहन के लिए सुरक्षित रह जाती है।

इस प्रकार समाज के दोहरे प्रतिनिधित्व का मार्ग प्रशस्त होता है।

प्रशासनिक दुर्भावना पर रोक
अक्सर चयन बोर्ड और साक्षात्कार कमेटियां आरक्षित वर्ग के मेधावियों को जानबूझकर केवल उनकी श्रेणी की मेरिट तक सीमित कर देती हैं ताकि अनारक्षित सीटों पर कम अंक वालों को समायोजित किया जा सके। उच्च न्यायालय का यह फैसला इस प्रकार के तमाम प्रशासनिक षड्यंत्रों को अमान्य ठहराता है।

बहुजन समाज के लिए वैचारिक आह्वान: संघर्ष, चेतना और संवैधानिक जागरूकता
बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने स्पष्ट कहा था कि “अधिकार मांगने से नहीं मिलते, उन्हें हासिल करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

आज का बहुजन युवा दिन-रात मेहनत करके प्रतियोगी परीक्षाओं में उच्च अंक प्राप्त कर रहा है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर बैठे यथास्थितिवादी तत्व नियमों की गलत व्याख्या करके उसके भविष्य से खिलवाड़ करने का प्रयास करते हैं।

यदि मनजीत कुमार ने विश्वविद्यालय के उस मनमाने जवाब को अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लिया होता, तो आज यह ऐतिहासिक नजीर समाज के सामने न होती।

हमें क्या करना होगा?

1 सजगता और पारदर्शिता:
प्रत्येक भर्ती परीक्षा के बाद चयन सूची, कट-ऑफ मार्क्स और श्रेणीवार आवंटन का बारीकी से अध्ययन करें।

सूचना के अधिकार (RTI) का प्रभावी उपयोग करें।

2 कानूनी साक्षरता:

समाज के प्रत्येक पढ़े-लिखे व्यक्ति और अभिभावक का यह दायित्व है कि वह सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के सेवा संबंधी निर्णयों (जैसे सौरव यादव केस) की जानकारी युवाओं तक पहुंचाए।

3 संगठित कानूनी संघर्ष:

जहां भी मेरिट का गला घोंटा जा रहा हो, वहां हताश होने के बजाय संगठित होकर संवैधानिक संस्थाओं और न्यायालयों का दरवाजा खटखटाएं।

न्यायालय संविधान की प्रस्तावना के अनुसार न्याय देने के लिए बाध्य हैं।

यह फैसला केवल एक भर्ती का निपटारा नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि संविधान की रोशनी में लड़ा गया संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता।

बहुजन समाज को अपनी हीनभावना को त्यागकर मेरिट की खुली दौड़ में सबसे आगे निकलना होगा और अपने वाजिब अधिकारों को सीना ठोक कर हासिल करना होगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)
यह आलेख प्रकाशित समाचार रिपोर्ट, माननीय उच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित विधि सिद्धांतों तथा संवैधानिक प्रावधानों के विश्लेषणात्मक अध्ययन पर आधारित है।

इसका मुख्य उद्देश्य वंचित एवं बहुजन समाज में विधिक व संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना और युवाओं को सकारात्मक व लोकतांत्रिक संघर्ष के लिए प्रेरित करना है। इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के सामाजिक-आर्थिक अध्ययन एवं स्वतंत्र चिंतन का परिणाम हैं। इसे किसी विशिष्ट न्यायिक अथवा व्यक्तिगत प्रकरण में प्रत्यक्ष विधिक परामर्श न माना जाए।

किसी भी विधिक कार्यवाही के लिए संबंधित न्यायालय के मूल आदेश, आधिकारिक सेवा नियमों एवं विधिक विशेषज्ञों के मार्गदर्शन को ही प्रमाणिक माना जाना चाहिए।

लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक, ब्यावर -94622-60179

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