आज जब पीछे मुड़कर अपने जीवन के सत्तर वर्षों को देखता हूं तो लगता है कि मैंने केवल उम्र नहीं गुजारी, बल्कि एक ऐसा समय भी जिया है जो धीरे-धीरे हमारी आंखों के सामने इतिहास बन गया। मैं उस पीढ़ी का आदमी हूं, जिसने बचपन को मोबाइल की स्क्रीन पर नहीं, गलियों की धूल में देखा है; जिसने रिश्तों को सोशल मीडिया पर नहीं, घर के आंगन और नानी के घर की चौखट पर महसूस किया है। हमारी तस्वीरें बहुत कम हैं, लेकिन हमारी यादें इतनी अधिक हैं कि कभी-कभी लगता है, पूरा बचपन आंखें बंद करते ही सामने खड़ा हो जाता है।
मेरे लिए नानी का घर केवल छुट्टियां बिताने की जगह नहीं था। नानी का घर अपनेपन का दूसरा नाम था। वहां पहुंचते ही लगता था जैसे दुनिया कुछ देर के लिए हमारी हो गई है। नानी की आवाज, घर का आंगन, मिट्टी की खुशबू, रिश्तेदारों की आवाजाही और छोटी-छोटी बातों में छिपा प्यार आज भी मन में वैसे ही बसा हुआ है। तब बच्चों को मनोरंजन के लिए किसी साधन की जरूरत नहीं पड़ती थी। घर के बाहर निकलते ही पूरी गली हमारा खेल का मैदान बन जाती थी।
हम गलियों में बचपन जीते थे। न कोई समय की पाबंदी, न हर थोड़ी देर में घर से फोन कि कहां हो। मां की आवाज दूर से आती थी और वही हमारा मोबाइल संदेश होता था—“घर आ जाओ।” हम खेलते-खेलते थक जाते थे, कपड़े मिट्टी से भर जाते थे, घुटनों पर खरोंच लग जाती थी, लेकिन अगले दिन फिर उसी मैदान में पहुंच जाते थे। चोटें भी हमारी कहानी का हिस्सा थीं और मिट्टी भी हमारी दोस्त।
गिल्ली-डंडा हमारे लिए केवल खेल नहीं था। उसमें शरीर की फुर्ती थी, आंख और हाथ का तालमेल था और जीतने की खुशी थी। कंचों की दुनिया भी अपनी थी। छोटी-सी गोली में जाने कितनी प्रतिस्पर्धा, दोस्ती और शरारत समाई रहती थी। मिट्टी में खेलते हुए हमें यह अहसास तक नहीं होता था कि हम प्रकृति के इतने करीब पल रहे हैं। आज बच्चे प्रकृति को स्क्रीन पर देखते हैं, हम प्रकृति के बीच बड़े हुए।
हमारी रातें भी अलग थीं। गर्मियों में कई बार खुले आकाश के नीचे सोना जीवन का सामान्य हिस्सा था। ठंडी हवा चेहरे को छूती थी और ऊपर तारों से भरा आकाश दिखाई देता था। तब आसमान को देखने के लिए किसी विशेष अवसर की जरूरत नहीं थी। हम तारों को गिनते-गिनते सो जाते थे। चांद हमारे कमरे की खिड़की से नहीं, सीधे हमारे सिरहाने उतरता हुआ लगता था।
आज लोग छुट्टी लेकर पहाड़ों पर जाते हैं, नदियों के किनारे पहुंचते हैं और प्रकृति के साथ तस्वीरें खिंचवाते हैं। हमारे लिए नदी कोई पर्यटन स्थल नहीं थी। नदी हमारे जीवन का हिस्सा थी। पहाड़ केवल तस्वीर में दिखाई देने वाली चीज नहीं थे। बारिश किसी मोबाइल कैमरे में कैद करने वाला मौसम नहीं था; बारिश आती थी तो हम भीगते थे, मिट्टी की खुशबू महसूस करते थे और पानी से भरी गलियों में अपने बचपन की नई कहानी लिखते थे।
तालाब हमारे लिए केवल पानी का स्रोत नहीं था। वह हमारी दुनिया का एक हिस्सा था। वहां जाना, दोस्तों के साथ समय बिताना, पानी को देखना और उसके किनारे बैठना—इन सबमें एक ऐसी खुशी थी जिसे आज की सुविधाओं के बीच समझाना कठिन है। तब प्रकृति हमारे जीवन से अलग कोई चीज नहीं थी। हम प्रकृति को देखने नहीं जाते थे, हम उसके भीतर रहते थे।
हमारी पीढ़ी की एक और खूबसूरती थी—हमने यादों को रिकॉर्ड नहीं किया। हमारे पास हर क्षण को मोबाइल में कैद करने की सुविधा नहीं थी। न कोई वीडियो बनता था, न फोटो खींचकर तुरंत दुनिया को बताया जाता था कि हम कहां हैं। किसी जन्मदिन, यात्रा या पारिवारिक मिलन की शायद एक-दो तस्वीरें मिल जाएं तो वही हमारे लिए बहुत थीं।
लेकिन आज सोचता हूं तो लगता है कि तस्वीरें कम होने का अर्थ यादें कम होना नहीं था। शायद उलटा था। हमारे पास तस्वीरें कम थीं, इसलिए हमें यादों को अपने भीतर संभालकर रखना पड़ा। चेहरे कैमरे में नहीं, दिल में सुरक्षित रहे। नानी की आवाज किसी रिकॉर्डिंग में नहीं है, लेकिन आज भी कानों में सुनाई देती है। बचपन की गलियों की कोई वीडियो नहीं है, लेकिन आंखें बंद करते ही वे गलियां दिखाई देने लगती हैं।
आज की पीढ़ी के पास हमारी तुलना में बहुत अधिक सुविधाएं हैं। मोबाइल है, इंटरनेट है, कैमरा है, वीडियो है और दुनिया से जुड़ने के हजारों माध्यम हैं। इसमें कोई बुराई नहीं। समय बदलता है और उसके साथ जीवन के तरीके भी बदलते हैं। लेकिन कभी-कभी मन में सवाल उठता है कि क्या सुविधा बढ़ने के साथ हम अनुभव करने की क्षमता कहीं कम तो नहीं कर रहे?
आज कोई सुंदर दृश्य सामने आता है तो पहले उसे देखने के बजाय कैमरा निकाल लिया जाता है। बारिश होती है तो कई बार बारिश में भीगने से पहले वीडियो बन जाता है। यात्रा में पहुंचते ही तस्वीर खिंचती है। शायद हम वर्तमान को जीने के बजाय भविष्य के लिए उसका रिकॉर्ड बनाने में अधिक व्यस्त हो गए हैं।
हमारे पास भविष्य को दिखाने के लिए बचपन की बहुत कम तस्वीरें हैं, लेकिन जब हम अपने बच्चों और पोते-पोतियों को अपने बचपन की कहानियां सुनाते हैं तो लगता है कि वे तस्वीरों से कहीं अधिक जीवंत हैं। हम उन्हें बताते हैं कि कैसे गली में खेलते थे, कैसे मिट्टी में गिरते थे, कैसे नानी के घर जाने का इंतजार करते थे, कैसे बारिश में भीगना खुशी देता था और कैसे खुले आकाश के नीचे सोते हुए तारों को देखते-देखते नींद आ जाती थी।
सत्तर वर्ष की उम्र में पीछे मुड़कर देखता हूं तो जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति बैंक में जमा पैसा, खरीदी हुई वस्तुएं या रखी हुई तस्वीरें नहीं लगतीं। सबसे बड़ी संपत्ति वे अनुभव हैं जिन्हें किसी कैमरे की जरूरत नहीं पड़ी। वे रिश्ते हैं जिन्हें किसी सोशल मीडिया की जरूरत नहीं थी। वे दोस्तियां हैं जिनका कोई ऑनलाइन रिकॉर्ड नहीं था। वे शामें हैं जिनका कोई वीडियो नहीं बना। वे रातें हैं जिनमें केवल आसमान, तारे और हमारी कल्पनाएं थीं।
शायद सचमुच हम उस आख़िरी नस्ल में शामिल हैं जिसने बचपन को रिकॉर्ड करने के बजाय जिया। हमारी तस्वीरें कम हैं, लेकिन यादें बेहिसाब हैं। हमारे पास पुराने वीडियो नहीं हैं, लेकिन पुराने चेहरे अब भी दिल में सुरक्षित हैं। हमारे पास बचपन का डिजिटल संग्रह नहीं है, लेकिन स्मृतियों का ऐसा संसार है जिसे कोई तकनीक मिटा नहीं सकती।
आज अपने जीवन के सत्तरवें पड़ाव पर खड़ा होकर मुझे अपने उस बचपन पर गर्व भी होता है और उससे गहरा लगाव भी। वह समय लौटकर नहीं आएगा। न वह गली वैसी रहेगी, न वह तालाब, न वह नानी का घर, न वह तारों भरी रातें। लेकिन मन के भीतर एक संसार आज भी वैसा ही है।
वह संसार मुझे बार-बार याद दिलाता है—बचपन की सबसे सुंदर तस्वीर वह नहीं होती जो कैमरे में कैद हो जाए; सबसे सुंदर तस्वीर वह होती है जो उम्र भर दिल में सुरक्षित रहे.

हगामी लाल मेघवंशी
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