✍️ लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया सामाजिक एवं आर्थिक चिंतक व विचारक | ब्यावर 📞 94622-60179

⚖️ डिस्क्लेमर
प्रस्तुत लेख पूर्णतः ऐतिहासिक अभिलेखों, ब्रिटिश संसदीय दस्तावेजों, ‘इंडियन स्टेट्यूटरी कमीशन’ (साइमन कमीशन) की मूल रिपोर्ट (1930), बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल की कार्यवाहियों तथा भारत रत्न बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अधिकृत व्याख्यानों व लेखों (Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches, Vol. 2) के अकादमिक विश्लेषण पर आधारित है।

इसका मूल उद्देश्य बहुजन समाज (अनुसूचित जातियों, जनजातियों, पिछड़े वर्गों एवं अल्पसंख्यकों) में संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक न्याय और निष्पक्ष ऐतिहासिक तथ्यों के प्रति जागरूकता व वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रसार करना है। यह लेख किसी जाति, वर्ग, संप्रदाय या संस्था की भावनाओं को आहत करने हेतु नहीं, अपितु इतिहास के उपेक्षित पक्षों को शैक्षणिक एवं प्रेरणादायी रूप में प्रस्तुत करने हेतु संकलित किया गया है।

  1. प्रस्तावना: इतिहास की पुनर्व्याख्या और बहुजन परिप्रेक्ष्य की आवश्यकता

इतिहास का एकांगी दृष्टिकोण
इतिहास केवल सत्ताधीशों, राजा-महाराजाओं और प्रभावशाली संभ्रांत वर्गों के जयघोष का नाम नहीं है।

इतिहास उन करोड़ों मूक, शोषित और हाशिये पर धकेल दिए गए इंसानों के अस्तित्व, संघर्ष और अधिकारों की गाथा भी होता है, जिन्हें सदियों तक व्यवस्था ने मानवीय गरिमा और बुनियादी नागरिक अधिकारों से वंचित रखा।

आधुनिक भारतीय इतिहास में ‘साइमन कमीशन’ एक ऐसा अध्याय है जिसे परंपरागत व राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने अधिकांशतः केवल ‘साइमन गो बैक’ के नारों, हड़तालों, काले झंडों और लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज के संकुचित संदर्भ में ही प्रस्तुत किया है।

किंतु जब हम इस युगांतरकारी घटनाक्रम को सामाजिक न्याय, समता और बहुजन कल्याण (शोषित, अछूत, गैर-ब्राह्मण, किसान, मजदूर व अल्पसंख्यक) के दृष्टिकोण से देखते हैं, तो साइमन कमीशन का परिदृश्य पूर्णतः भिन्न और अत्यंत गौरवशाली नजर आता है।

यह मात्र एक ब्रिटिश प्रशासनिक आयोग नहीं था, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप के करोड़ों अछूतों और वंचितों के लिए सदियों पुरानी सामाजिक गुलामी के बंधनों को तोड़कर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान, मताधिकार और संवैधानिक सुरक्षा को अंतरराष्ट्रीय पटल पर दर्ज कराने का ऐतिहासिक प्रस्थान बिंदु था।

बाबासाहेब डॉ. बी. आर. अम्बेडकर, जस्टिस पार्टी के नेताओं, दीनबंधु सर छोटू राम और राव बहादुर एम. सी. राजा जैसे दूरदर्शी समाज सुधारकों ने साइमन कमीशन के आगमन को एक अभूतपूर्व संवैधानिक अवसर के रूप में देखा।

उन्होंने यह सिद्ध किया कि विदेशी हुकूमत से आजादी जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी देश के भीतर सदियों से चली आ रही सामाजिक-धार्मिक दासता से 80 प्रतिशत बहुजन आबादी की मुक्ति है।

  1. साइमन कमीशन: क्या, कब, क्यों और कैसे?
    (विस्तृत विश्लेषण)

2.1 क्या और कब? (गठन और संरचना)

आधिकारिक नाम: इंडियन स्टेट्यूटरी कमीशन (Indian Statutory Commission)

अध्यक्ष: सर जॉन साइमन (Sir John Simon) – ब्रिटिश लिबरल पार्टी के प्रमुख न्यायविद

गठन की तिथि: 8 नवंबर 1927 (ब्रिटिश संसद द्वारा अधिकृत घोषणा)

सदस्यों की संख्या: कुल 7 सदस्य (सभी ब्रिटिश संसद के दोनों सदनों—हाउस ऑफ लॉर्ड्स और हाउस ऑफ कॉमन्स के सांसद)

उल्लेखनीय सदस्य: क्लीमेंट एटली (Clement Attlee – जो आगे चलकर 1945-1951 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने तथा भारत की आजादी के समय ब्रिटिश पीएम थे)

प्रथम भारत दौरा: 3 फरवरी 1928 से 31 मार्च 1928 तक

द्वितीय भारत दौरा: 11 अक्टूबर 1928 से 13 अप्रैल 1929 तक

रिपोर्ट प्रकाशन: मई 1930 (दो वृहद खंडों में प्रकाशित)

2.2 साइमन कमीशन का गठन ‘क्यों’ हुआ? (कारण एवं पृष्ठभूमि)
साइमन कमीशन के गठन के पीछे तीन प्रमुख संवैधानिक और राजनीतिक कारण थे

मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (1919) की धारा 84-A: ब्रिटिश सरकार द्वारा पारित ‘भारत सरकार अधिनियम 1919’ में यह वैधानिक प्रावधान था कि कानून लागू होने के 10 वर्ष बाद एक सांविधिक आयोग बनाया जाएगा जो इस बात की जांच करेगा कि भारत में प्रांतीय ‘द्वैध शासन’ (Dyarchy) कितना सफल रहा और क्या भारतीयों को और अधिक स्वशासन व प्रशासनिक अधिकार दिए जाने चाहिए।

ब्रिटेन की दलीय राजनीति का दबाव: नियमतः यह आयोग 1929 में बनना था। किंतु ब्रिटेन में 1929 में आम चुनाव होने थे।

तत्कालीन सत्ताधारी कंजर्वेटिव पार्टी को स्पष्ट आशंका थी कि चुनाव में लेबर पार्टी (मजदूर दल) जीत जाएगी। कंजर्वेटिव्स को डर था कि यदि लेबर पार्टी सत्ता में आई तो वह भारतीय कांग्रेस के दबाव में आकर भारतीयों को बहुत अधिक रियायतें दे देगी। अतः कंजर्वेटिव सरकार ने निर्धारित समय से 2 वर्ष पूर्व ही 1927 में साइमन कमीशन का गठन कर दिया।

सांप्रदायिक एवं सामाजिक सुरक्षा की पड़ताल: ब्रिटिश हुकूमत यह भली-भांति जानती थी कि भारत केवल एक समरूप राष्ट्र नहीं है, बल्कि यहां विभिन्न धर्म, जातियां, गैर-बराबरी की व्यवस्था और करोड़ों अछूत व पिछड़े वर्ग हैं।

आयोग का उद्देश्य यह जानना भी था कि भविष्य के संवैधानिक ढांचे में इन वंचित समुदायों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।

2.3 साइमन कमीशन ‘कैसे’ संचालित हुआ? (कार्यप्रणाली)
साइमन कमीशन ने अपनी जांच को निष्पक्ष और व्यापक बनाने के लिए भारत के विभिन्न प्रांतों का सघन दौरा किया।

आयोग ने केंद्रीय विधायिका और प्रत्येक प्रांतीय विधान परिषद से 7-7 सदस्यों की स्थानीय समितियां (Provincial Committees) गठित करने का आग्रह किया ताकि वे आयोग के साथ मिलकर साक्ष्य जुटाएं।

बॉम्बे प्रेसीडेंसी में ऐसी ही संयुक्त समिति के निर्वाचित सदस्य बने डॉ. भीमराव अम्बेडकर।

आयोग ने भारत भर के राजनीतिक दलों, रियासतों, व्यापारिक संगठनों, किसान सभाओं, मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, जस्टिस पार्टी और सबसे बढ़कर दलित एवं बहिष्कृत वर्ग के प्रतिनिधियों से सैकड़ों ज्ञापन, प्रतिवेदन और प्रत्यक्ष गवाहियां दर्ज कीं।

  1. साइमन कमीशन के विरोधी और समर्थक
    दो भिन्न सामाजिक यथार्थ

3.1 विरोध के प्रमुख कारण एवं विरोधी खेमा
साइमन कमीशन का भारत भर में मुख्यधारा के उच्च-जातीय और संभ्रांत नेतृत्व द्वारा व्यापक विरोध किया गया।

विरोध के मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे

सर्व-श्वेत आयोग (All-White Commission): कमीशन के सभी 7 सदस्य अंग्रेज (श्वेत) थे।

कांग्रेस और अन्य दलों का तर्क था कि भारत के भविष्य और संविधान का निर्धारण विदेशी लोग नहीं कर सकते। किसी भी भारतीय को सदस्य न बनाना भारतीयों के आत्मसम्मान पर चोट माना गया।

आत्मनिर्णय के अधिकार की मांग: कांग्रेस का मानना था कि अंग्रेजों को जांच करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है; भारत को तत्काल पूर्ण स्वराज या औपनिवेशिक स्वशासन (Dominion Status) दिया जाना चाहिए।

प्रमुख विरोधी दल व नेता:
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (पं. मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी), लाला लाजपत राय (पंजाब), और मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग का एक गुट।

3.2 समर्थन एवं सहयोग के ठोस कारण:
बहुजन समाज का दृष्टिकोण
जबकि उच्च-वर्गीय नेतृत्व सड़कों पर विरोध कर रहा था, भारत के बहुजन, शोषित, गैर-ब्राह्मण और वंचित वर्गों ने साइमन कमीशन का खुले दिल से स्वागत किया और उसके साथ सक्रिय सहयोग किया।

बहुजन समाज के इस रुख के पीछे अत्यंत गहरे और ऐतिहासिक कारण थे

सामाजिक गुलामी से मुक्ति की प्राथमिकता:

बहुजन विचारकों का मानना था कि विदेशी अंग्रेजों का शासन बुरा हो सकता है, परंतु हजारों वर्षों से चली आ रही जातिवादी, सामंती और अस्पृश्यता की व्यवस्था उससे भी कई गुना अधिक क्रूर और अमानवीय थी।

यदि बिना सामाजिक सुरक्षा और बिना आरक्षण के सत्ता सीधे स्थानीय सवर्णों को सौंप दी जाती, तो अछूतों और शूद्रों पर ‘पेशवाई’ और मनुवादी जुल्म पुनः स्थापित हो जाते।

निष्पक्ष मंच की उपलब्धता: बहुजन नेताओं का मानना था कि चूंकि आयोग में कोई भारतीय सवर्ण सदस्य नहीं था, इसलिए वह सवर्ण-पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर अछूतों, शूद्रों और गैर-ब्राह्मणों की वास्तविक दुर्दशा और सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों का निष्पक्ष मूल्यांकन कर सकता था।

प्रमुख समर्थक दल और संगठन:
डॉ. भीमराव अम्बेडकर के नेतृत्व वाली ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ (बॉम्बे)

दक्षिण भारत की ‘जस्टिस पार्टी’ (गैर-ब्राह्मण आंदोलन – मद्रास प्रेसीडेंसी)

राव बहादुर एम. सी. राजा के नेतृत्व वाली ‘अखिल भारतीय दलित वर्ग संघ’ (All India Depressed Classes Association)

पंजाब की ‘यूनियनिस्ट पार्टी’ (दीनबंधु सर छोटू राम – किसान व पिछड़े वर्ग)

बंगाल का ‘नामशूद्र एवं मतुआ आंदोलन’
(गुरुचंद ठाकुर के अनुयायी)

सर मुहम्मद शफी के नेतृत्व वाला मुस्लिम लीग का धड़ा

  1. साइमन कमीशन के समक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर की ऐतिहासिक भूमिका

साइमन कमीशन के आगमन के समय बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर 37 वर्ष के युवा, प्रखर अर्थशास्त्री एवं बैरिस्टर थे तथा बॉम्बे विधान परिषद के मनोनीत सदस्य थे।

जब बॉम्बे विधान परिषद ने साइमन कमीशन के साथ सहयोग करने के लिए 7 सदस्यीय प्रांतीय समिति का चुनाव किया, तो डॉ. अम्बेडकर को उस समिति का प्रमुख सदस्य चुना गया।

“यदि आप हमें एक ऐसा संविधान देते हैं जिसमें सत्ता केवल ऊंची जातियों के हाथ में केंद्रित हो जाए और शोषितों को अपनी रक्षा के लिए कोई राजनीतिक हथियार न मिले, तो वह स्वतंत्रता हमारे लिए स्वतंत्रता नहीं, बल्कि गुलामी का नया वारंट होगी।” — डॉ. भीमराव अम्बेडकर (साइमन कमीशन के समक्ष साक्ष्य देते हुए, 1928)

4.1 बहिष्कृत हितकारिणी सभा का विस्तृत मांग-पत्र (29 मई 1928)
डॉ. अम्बेडकर ने ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की ओर से 40 से अधिक पृष्ठों का एक अत्यंत शोधपरक, प्रामाणिक और वैज्ञानिक मांग-पत्र (Memorandum) तैयार किया।

इस मांग-पत्र में उन्होंने बॉम्बे प्रेसीडेंसी और पूरे भारत में अछूतों की जनसंख्या, साक्षरता दर, भूमिहीनता, रोजगार की स्थिति और उन पर थोपी गई सामाजिक निरयोग्यताओं के अकाट्य आंकड़े पेश किए।

4.2 पूना में प्रत्यक्ष साक्ष्य और ऐतिहासिक जिरह (23 अक्टूबर 1928)

23 अक्टूबर 1928 को पूना में साइमन कमीशन और बॉम्बे प्रांतीय समिति की संयुक्त बैठक में डॉ. अम्बेडकर ने व्यक्तिगत रूप से गवाही दी।

सर जॉन साइमन, क्लीमेंट एटली और एडवर्ड कैडोगन जैसे दिग्गज ब्रिटिश सांसदों ने उनसे तीखे सवाल पूछे, जिनका बाबासाहेब ने कानून, इतिहास, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के आधार पर ऐसा तार्किक उत्तर दिया कि पूरा कमीशन उनकी विद्वता से स्तब्ध रह गया।

4.3 डॉ. अम्बेडकर द्वारा रखी गई क्रांतिकारी मांगें
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise): उस समय केवल धनी, जमींदार और करदाताओं को ही वोट का अधिकार था।

डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि चूंकि अछूतों को सदियों से संपत्ति और शिक्षा से वंचित रखा गया, इसलिए संपत्ति आधारित मताधिकार उनके खिलाफ है। उन्होंने 21 वर्ष के प्रत्येक वयस्क स्त्री-पुरुष को बिना किसी शर्त के वोट देने का अधिकार मांगा।

जनसंख्या के अनुपात में आरक्षित सीटें: विधानमंडलों, नगरपालिकाओं और स्थानीय निकायों में दलितों और शोषितों को उनकी सटीक जनसंख्या के अनुपात में अनिवार्य आरक्षित सीटें दी जाएं।

पृथक निर्वाचन या संयुक्त निर्वाचन में सुरक्षा: यदि अछूतों को बहुसंख्यक सवर्ण हिंदुओं के अत्याचार से बचाना है, तो उन्हें पृथक निर्वाचन दिया जाए, अथवा संयुक्त निर्वाचन की स्थिति में ऐसी व्यवस्था हो जिससे वे अपने सच्चे प्रतिनिधि चुन सकें।

लोक सेवाओं और सेना में भर्ती का अधिकार: सरकारी नौकरियों, पुलिस और सेना में अछूतों की भर्ती पर लगी अघोषित रोक को तुरंत हटाया जाए और उनके लिए विशेष भर्ती बोर्ड व कोटा निर्धारित किया जाए।

शिक्षा हेतु विशेष बजटीय प्रावधान: दलित बस्तियों में प्राथमिक एवं उच्च शिक्षा के विस्तार हेतु प्रांतीय बजट में अलग से अनिवार्य धनराशि आवंटित की जाए और छात्रवृत्तियां दी जाएं।
सामाजिक बहिष्कार के विरुद्ध दंडात्मक कानून: सार्वजनिक कुओं, धर्मशालाओं, पाठशालाओं, सार्वजनिक मार्गों और चिकित्सालयों में किसी भी नागरिक के प्रवेश को रोकना संज्ञेय अपराध घोषित किया जाए।

4.4 डॉ. अम्बेडकर की पृथक असहमति रिपोर्ट (Dissenting Report – मई 1929)
जब बॉम्बे प्रांतीय समिति के सवर्ण सदस्यों ने अपनी बहुसंख्यक रिपोर्ट में अछूतों के लिए केवल मनोनीत सीटों की सिफारिश की और वयस्क मताधिकार का विरोध किया, तब डॉ. अम्बेडकर ने उस रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने से साफ इनकार कर दिया।

उन्होंने मई 1929 में अपनी एक अलग ‘असहमति रिपोर्ट’ (Dissenting Report) ब्रिटिश सरकार को भेजी, जिसने आगे चलकर 1935 के भारत सरकार अधिनियम की आधारशिला रखी।

  1. साइमन कमीशन के गुण एवं दोष: एक तुलनात्मक वैज्ञानिक विश्लेषण
    विश्लेषण का आधार
    गुण
    (सकारात्मक पहलू – बहुजन हित)
    दोष
    (नकारात्मक पहलू – राष्ट्रीय दृष्टि)

प्रतिनिधित्व एवं सदस्यता
आयोग में स्थानीय सवर्ण नेताओं का प्रभुत्व न होने से अछूतों और अल्पसंख्यकों की समस्याओं को निष्पक्षता से सुना गया।

किसी भी भारतीय को सदस्य न बनाना औपनिवेशिक अहंकार का प्रतीक था और राष्ट्र की संप्रभुता का अपमान था।

सामाजिक न्याय व अधिकार
अछूतों (Depressed Classes) को एक स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता के रूप में मान्यता मिली और आरक्षण की नींव पड़ी।

सुधारों को केवल जांच तक सीमित रखा गया; तुरंत कोई प्रत्यक्ष राहत या कानूनी अधिकार प्रदान नहीं किए गए।

मताधिकार का विस्तार
मताधिकार का दायरा 3% से बढ़ाकर 10-15% करने और उसमें दलितों व महिलाओं को जोड़ने की सिफारिश की गई।

डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित ‘सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार’ को तुरंत पूरी तरह लागू करने से मना कर दिया गया।

प्रशासनिक ढांचा
दोषपूर्ण ‘द्वैध शासन’ समाप्त कर प्रांतों में पूर्ण उत्तरदायी सरकारों (प्रांतीय स्वायत्तता) की पुरजोर वकालत की।

केंद्र स्तर पर कोई उत्तरदायी सरकार नहीं दी गई; गवर्नर जनरल और वायसराय की निरंकुश शक्तियां बरकरार रखी गईं।

  1. साइमन कमीशन से पूना पैक्ट (1932) तक की वैचारिक व राजनीतिक यात्रा

साइमन कमीशन की रिपोर्ट मई 1930 में दो विशाल खंडों में प्रकाशित हुई। इस रिपोर्ट ने भारत के संवैधानिक भविष्य का नक्शा पूरी तरह बदल दिया।

आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने लंदन में तीन ‘गोलमेज सम्मेलनों’ (Round Table Conferences: 1930, 1931, 1932) का आयोजन किया।

गोलमेज सम्मेलन में अम्बेडकर की धमक: चूंकि डॉ. अम्बेडकर ने साइमन कमीशन के समक्ष अपनी असाधारण योग्यता और वंचितों के प्रामाणिक आंकड़ों का लोहा मनवाया था, इसलिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें दोनों गोलमेज सम्मेलनों में दलित वर्ग के अधिकृत और एकमात्र राष्ट्रीय प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित किया।

दूसरे गोलमेज सम्मेलन (1931) में महात्मा गांधी ने दावा किया कि वे और कांग्रेस ही अछूतों सहित पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं और उन्होंने दलितों के राजनीतिक आरक्षण का कड़ा विरोध किया।

किंतु डॉ. अम्बेडकर ने साइमन कमीशन की रिपोर्ट के तथ्यों का हवाला देते हुए ब्रिटिश सत्ता को यह स्वीकार करने पर विवश कर दिया कि अछूत हिंदू समाज की सामाजिक गैर-बराबरी के शिकार हैं और उन्हें अलग संवैधानिक संरक्षण मिलना अनिवार्य है।

इसी का ऐतिहासिक परिणाम था कि 16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश सरकार ने ‘कम्यूनल अवार्ड’ (सांप्रदायिक पंचाट) घोषित किया, जिसमें दलितों को ‘दोहरा वोट’ (Double Vote – एक वोट अपने दलित प्रतिनिधि हेतु और दूसरा सामान्य प्रतिनिधि हेतु) का अधिकार मिला।

बाद में गांधी जी के यरवदा जेल में आमरण अनशन के दबाव के कारण 24 सितंबर 1932 को ‘पूना पैक्ट’ हुआ, जिसमें पृथक निर्वाचन के बदले आरक्षित सीटों की संख्या 71 से बढ़ाकर 148 (दोगुने से भी अधिक) कर दी गई।

इस प्रकार, यदि साइमन कमीशन न आता और डॉ. अम्बेडकर उसके समक्ष शोषितों का पक्ष इतनी मजबूती से न रखते, तो न गोलमेज सम्मेलन में दलितों को आवाज मिलती, न कम्यूनल अवार्ड आता और न ही पूना पैक्ट के जरिए विधायिकाओं में आरक्षण का मार्ग प्रशस्त होता!

  1. बहुजन समाज के लिए प्रेरणा, सीख एवं समकालीन प्रासंगिकता

लेखक के रूप में सामाजिक और आर्थिक चिंतन के आधार पर मेरा बहुजन समाज के प्रत्येक युवा, प्रबुद्ध नागरिक और कार्यकर्ता से यह विनम्र आह्वान है कि वे साइमन कमीशन के इस ऐतिहासिक घटनाक्रम से निम्नलिखित जीवनोपयोगी सबक लें

भावनात्मक नारों के बजाय संवैधानिक दृष्टि अपनाएं:
1928 में जब पूरा देश ‘साइमन गो बैक’ के भावुक नारों में बह रहा था, तब बाबासाहेब अम्बेडकर ने भावनाओं के बजाय कलम, ज्ञान और संवैधानिक रणनीति को चुना।

आज भी बहुजन समाज को भावनात्मक मुद्दों में उलझने के बजाय अपने नीतिगत, बजटीय और संवैधानिक अधिकारों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

ज्ञान, तथ्य और आंकड़ों की अपार शक्ति:

डॉ. अम्बेडकर ने साइमन कमीशन को खोखली दलीलों से नहीं, बल्कि सांख्यिकी, राजस्व आंकड़ों, साक्षरता दरों और ऐतिहासिक प्रमाणों से परास्त किया था।

शिक्षा और बौद्धिक तैयारी ही हमारे अधिकारों की सबसे मजबूत ढाल है।

सत्ता में आनुपातिक हिस्सेदारी की अनिवार्यता
साइमन कमीशन के दौर में यह सिद्ध हो गया कि केवल दूसरों की दया पर निर्भर रहकर न्याय नहीं मिल सकता।

शासन, प्रशासन, न्यायपालिका, कार्यपालिका और आर्थिक संसाधनों में संख्या के अनुपात में भागीदारी (जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी) ही सामाजिक लोकतंत्र की वास्तविक कुंजी है।

21वीं सदी में आरक्षण और संविधान की रक्षा:
आज जब निजीकरण, आउटसोर्सिंग और नीतिगत बदलावों के जरिए बहुजन समाज के आरक्षण और सामाजिक न्याय के ढांचे को कमजोर करने के प्रयास हो रहे हैं, तब हमें साइमन कमीशन के दौर की उसी संगठित और बौद्धिक चेतना की आवश्यकता है जो बाबासाहेब ने हमें विरासत में दी थी।

  1. संदर्भ ग्रंथ सूची (Authentic Bibliography & Historical References)
    प्रस्तुत लेख का संकलन और विश्लेषण निम्नलिखित अधिकृत, ऐतिहासिक एवं संसदीय स्रोतों के गहन अध्ययन के उपरांत किया गया है

Ambedkar, B. R. (1979): Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches (Vol. 2) – ‘Evidence Before the Simon Commission & Report of the Committee Appointed by the Bombay Legislative Council’. Published by Education Department, Government of Maharashtra.
Indian Statutory Commission (1930): Report of the Indian Statutory Commission (Simon Commission Report), Volume I (Survey) & Volume II (Recommendations). His Majesty’s Stationery Office (HMSO), London.
Keer, Dhananjay (1954): Dr. Ambedkar: Life and Mission. Popular Prakashan, Mumbai.
Moon, Vasant (1991): Babasaheb Ambedkar: Source Material on Dr. Babasaheb Ambedkar and the Movement of Untouchables. Government of Maharashtra Publications.
Coupland, Reginald (1944): The Indian Problem: Report on the Constitutional Problem in India (Part I: The Simon Commission and After). Oxford University Press.
Chandra, Bipan; Mukherjee, Mridula et al. (1989): India’s Struggle for Independence. Penguin Books India.
Omvedt, Gail (1994): Dalits and the Democratic Revolution: Dr. Ambedkar and the Dalit Movement in Colonial India. Sage Publications.
Zelliot, Eleanor (1992): From Untouchable to Dalit: Essays on the Ambedkar Movement. Manohar Publications, New Delhi.

“इतिहास गवाह है कि जो कौम अपना सच्चा इतिहास नहीं जानती, वह कभी अपने सुनहरे भविष्य का निर्माण नहीं कर सकती।

अपने अधिकारों को पहचानें, शिक्षित बनें, संगठित हों और संवैधानिक मूल्यों के लिए सतत संघर्षरत रहें।” —

लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया, सामाजिक-आर्थिक चिंतक एवं विचारक, ब्यावर (94622-60179)

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