
लेखक
(संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया, प्राचार्य RES, सामाजिक-आर्थिक चिन्तक एवं विचारक, ब्यावर (राज.) | सम्पर्क सूत्र: 94622-60179
“मैं समाज की सीढ़ी का आखिरी डंडा हूँ, वह कूड़ादान जिसमें हर गंदी व फालतू वस्तु फेंक दी जाती है; लेकिन मैं ही वह सच्चा सिपाही हूँ जो समाज को निरोग, स्वच्छ और जीवित रखने के लिए गंदगी से अहर्निश युद्ध लड़ता है।”
प्राक्कथन एवं भूमिका
मानव सभ्यता के सम्पूर्ण इतिहास में भारतीय उपमहाद्वीप की जाति-व्यवस्था और छुआछूत जैसी अमानवीय कुरीतियाँ सामाजिक असमानता का सबसे क्रूर और घृणित रूप रही हैं।
प्रख्यात दलित चिंतक, विधिवेत्ता और इतिहासकार भगवानदास द्वारा रचित कालजयी पुस्तक ‘मैं भंगी हूँ’ मात्र एक व्यक्ति या समाज का आत्मकथ्य नहीं है, अपितु यह सहस्राब्दियों से उपेक्षित, अपमानित, पददलित और व्यवस्था के अंतिम छोर पर धकेल दिए गए अछूत समुदाय की सामूहिक चीत्कार, ऐतिहासिक विमर्श और स्वाभिमान का घोषणापत्र है।
यह कृति पाठक को झकझोर कर रख देती है और यह सवाल पूछने पर विवश करती है कि जिस समाज ने संपूर्ण मानव समुदाय को महामारियों और गंदगी से बचाकर जीवनदान दिया, उसे ही समाज ने घृणा, तिरस्कार और स्थायी दासता की जंजीरों में क्यों जकड़ दिया?
प्रस्तुत विस्तृत आलेख में इस कालजयी कृति के प्रत्येक ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक और दार्शनिक पहलुओं को क्रमबद्ध और प्रभावशाली शैली में विश्लेषित किया गया है, ताकि नई पीढ़ी अपनी वास्तविक जड़ों, संघर्षों और बौद्धिक चेतना के महत्व को गहराई से आत्मसात कर सके।
भाग 1
सभ्यता का अदृश्य रक्षक — त्याग के बदले घृणा की विडंबना
1.1 सीमा के सैनिक बनाम सफाई के सिपाही की तुलना
पुस्तक का प्रारंभ एक अत्यंत मार्मिक और विचारोत्तेजक तुलना से होता है।
समाज में सेना के जवान और पुलिसकर्मी को देश की बाह्य और आंतरिक सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। उन्हें पदक, सर्वोच्च सामाजिक प्रतिष्ठा, आदर और सम्मान प्राप्त होता है।
उनका जीवन केवल युद्धकाल या संकट के समय खतरे में पड़ता है।
परंतु इसके विपरीत, समाज का सफाईकर्मी (जिसे व्यवस्था ने ‘भंगी’ कहकर बहिष्कृत किया) भी एक सच्चा सिपाही है।
उसका युद्ध किसी सीमा पर नहीं, बल्कि मानव समाज को लील जाने वाली भयानक गंदगी, बदबू, विषाक्त गैसों और संक्रामक महामारियों के विरुद्ध होता है।
वह प्रतिदिन, प्रतिपल अपने स्वास्थ्य, अपनी व्यक्तिगत मर्यादा और अपने जीवन को संकट में डालकर समाज के प्रत्येक नागरिक को स्वस्थ, सुखी और स्वच्छ वातावरण प्रदान करता है।
तुलनात्मक बिंदु
देश का सैनिक / पुलिस
सफाई का सिपाही (अछूत समाज)
सुरक्षा का स्वरूप
देश की बाहरी सीमाओं की दुश्मनों से रक्षा
समाज की आंतरिक गंदगी व महामारियों से रक्षा
जोखिम की अवधि
केवल युद्ध अथवा आपातकाल में
जीवनपर्यंत प्रतिदिन,हर क्षण
शस्त्र व उपकरण
बंदूक, तोप, ढाल, तलवार व आधुनिक अस्त्र
झाड़ू, टोकरा, कुदाल व अपने नंगे हाथ
सामाजिक प्रतिफल
परम आदर, पदक, सम्मान व गौरव
घृणा, तिरस्कार, अस्पृश्यता व सामाजिक बहिष्कार
1.2 दोहरे मानदंड और अस्पृश्यता की पराकाष्ठा
लेखक भारतीय समाज के उस दोगलेपन पर कड़ा प्रहार करते हैं जहाँ पशुओं (गाय, भैंस, श्वान, बिल्ली) के स्पर्श से कोई व्यक्ति या वस्तु अपवित्र नहीं मानी जाती, किंतु जिस इंसान ने नगरों, हवेलियों, मोहल्लों और नालियों की गंदगी अपने सिर पर ढोकर समाज को स्वच्छ रखा, उसकी परछाई तक से तथाकथित सवर्ण जातियाँ ‘अपवित्र’ हो जाती थीं।
यह संवेदनहीनता विश्व के किसी अन्य देश या सभ्यता में देखने को नहीं मिलती।
भाग 2
शोषण का संस्थागत ढांचा —
धर्म और विधानों का षड्यंत्र
अछूत समाज की दरिद्रता और दासता कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि इसे धर्मशास्त्रों, सामाजिक संहिताओं और व्यवस्था के संचालकों द्वारा सुनियोजित तरीके से संस्थागत रूप दिया गया था
चरण 1 शिक्षा और ज्ञान से पूर्ण
वंचना — मनुस्मृति, आपस्तम्ब, गौतम, वशिष्ठ और नारद जैसे शास्त्रकारों ने शूद्रों और अति-शूद्रों के लिए विद्यार्जन के सभी मार्ग पूर्णतः अवरुद्ध कर दिए।
ज्ञान को कुछ विशेष कुलों में कंठस्थ रखकर सुरक्षित किया गया। यह विधान बनाया गया कि यदि कोई अछूत वेदों के मंत्र सुन ले तो उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया जाए।
शोषक वर्ग जानता था कि शिक्षा चेतना को जन्म देती है, चेतना से आत्मसम्मान जागता है और आत्मसम्मान से विद्रोह की ज्वाला भड़कती है।
चरण 2:
पूर्व जन्म के कर्मफल का वैचारिक प्रपंच
शोषित वर्ग में कभी अपने अधिकारों के लिए सोचने की क्षमता न पनपे, इसके लिए ‘पुनर्जन्म और कर्मफल’ का घातक सिद्धांत गढ़ा गया।
उन्हें सदियों तक यह सिखाया गया कि भंगी जाति में जन्म लेना उनके पूर्व जन्मों के घोर पापों का परिणाम है।
यदि वे इस जन्म में मैला ढोने और शोषण सहने का कार्य बिना किसी शिकायत के करेंगे, तभी अगले जन्म में उनका उद्धार संभव होगा।
इस प्रकार विद्रोह की संभावना को धार्मिक भय दिखाकर सदा के लिए कुचल दिया गया।
चरण 3:
भौगोलिक व भौतिक बहिष्कार
अछूत बस्तियों को गाँव और नगर की सीमाओं से बाहर, श्मशानों, गंदे नालों और बंजर भूमि पर बसाया गया।
मुर्दों के कफ़न, फटे चिथड़े, लोहे व मिट्टी के बर्तन, और सवर्णों के घरों से निकली बासी जूठन ही उनकी नियति बना दी गई।
आर्थिक रूप से उन्हें इतना पंगु बना दिया गया कि वे कभी अपनी संतानों के लिए बेहतर भविष्य की कल्पना भी न कर सकें।
चरण 4
आर्थिक दमन के क्रूर कानून कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा अन्य संहिताओं में यह सुनिश्चित किया गया कि यदि किसी अछूत को मार्ग पर झाड़ू लगाते हुए कोई स्वर्ण या धन मिले, तो वह उसका मात्र दसवाँ या सोलहवाँ भाग ही रख सकता है, शेष राजकोष या पुरोहित को देना होगा।
ऋण पर उनसे अन्य वर्णों की तुलना में कई गुना अधिक ब्याज वसूला जाता था ताकि वे कभी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न बन सकें।
भाग 3
अस्मिता का संकट
नामों का भ्रमजाल बनाम छद्म सहानुभूति
इतिहास के विभिन्न कालखंडों में शासकों, धर्माधिकारियों और तथाकथित समाज सुधारकों ने इस समाज की वास्तविक दशा सुधारे बिना केवल नए-नए नाम थोपने का कार्य किया
ऐतिहासिक काल
प्रदत्त नाम / संज्ञाएँ
वास्तविक सामाजिक प्रभाव
वैदिक व पौराणिक काल
चांडाल, अंत्यज, पुक्कास, म्लेच्छ, नाग, दास
नागरिक व मानवाधिकारों से पूर्ण निष्कासन
मुगल सल्तनत काल
खाकरोब (धूल उड़ाने वाला), हलालखोर
बादशाही आदेश से नाम बदला, कार्य की घृणित प्रकृति वही रही
ब्रिटिश काल
जमादार, मेहतर, डिप्रेस्ड क्लास
प्रशासनिक पदों के नाम पर व्यंग्यात्मक प्रयोग, स्थिति जस की तस
सुधारवादी आंदोलन
हरिजन (भगवान के जन)
नाम बदला गया किंतु मैला ढोने की अमानवीय प्रथा को परोपकार बताया गया
क्षेत्रीय विविधता
चूहड़ा, हेला, डुमार, मादगा, महार, मांग, लालबेगी आदि
सम्पूर्ण भारत में भाषा भेद के बावजूद शोषण का एक समान स्वरूप
3.1 बाबासाहेब डॉ. बी. आर. अम्बेडकर का ऐतिहासिक दृष्टिकोण
जब सुधारकों ने सफाई कार्य को ‘माता द्वारा बच्चे की सेवा’ और ‘परोपकार का कार्य’ कहकर गौरवान्वित करने का प्रयास किया, तब आधुनिक भारत के निर्माता बोधिसत्व डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने इस छद्म सहानुभूति की धज्जियाँ उड़ा दीं।
बाबासाहेब ने आह्वान किया कि यदि मैला ढोना इतना ही पवित्र और पुण्यकारी परोपकार है, तो तथाकथित उच्च जातियाँ आगे आकर यह पुण्य क्यों नहीं कमा लेतीं?
उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक जाति-व्यवस्था और अमानवीय पेशों का उन्मूलन नहीं होगा, तब तक नामों का बदलाव केवल दासता को मीठी चाशनी में लपेटने जैसा है।
भाग 4: ऐतिहासिक यथार्थ — मूलनिवासी अस्मिता और पराजय का सच
4.1 ‘भंगी’ शब्द की वास्तविक व्युत्पत्ति
शोषक वर्ग के इतिहासकारों ने यह भ्रामक प्रचार किया कि यह समाज ‘भांग’ पीने के कारण ‘भंगी’ कहलाया।
लेखक इस कुतर्क का ऐतिहासिक खंडन करते हुए बताते हैं कि भांग का अत्यधिक सेवन तो तीर्थस्थलों के पुरोहित और संन्यासी करते रहे हैं।
वास्तव में ‘भंगी’ शब्द ‘भंग’ (टूटा हुआ/विखंडित) से बना है।
यह उस मूलनिवासी योद्धा कौम का टूटा हुआ अंग है जिसने आक्रमणकारियों और वर्णवादी सत्ता के आगे कभी आत्मसमर्पण नहीं किया।
4.2 विजेताओं द्वारा लिखा गया एकपक्षीय इतिहास
इतिहास सदैव सत्ता, राजसत्ता और धन-संपदा के स्वामियों के दृष्टिकोण से लिखा जाता है।
पराजित मूलनिवासियों को जब वनों और सीमाओं पर धकेल दिया गया, तो वे अपनी संगठित शक्ति खो बैठे।
जीवित रहने के लिए उन्हें अपमानजनक समझौते करने पड़े।
इस समाज का इतिहास महलों के अभिलेखों में नहीं, बल्कि उनके अदम्य जीवट, लोक-संस्कृति और सदियों के मूक प्रतिरोध में दर्ज है।
भाग 5:
समता का सूर्योदय
तथागत बुद्ध और धम्म की क्रांति
जब भारत की भूमि कर्मकांडीय हिंसा, पशु-बलि, मिथ्या अंधविश्वासों और जन्म-आधारित भेदभाव के घोर अंधकार में डूबी थी, तब तथागत गौतम बुद्ध ने सामाजिक समता और प्रज्ञा की अद्वितीय क्रांति का सूत्रपात किया
सुनीत चांडाल का ऐतिहासिक उद्धार — श्रावस्ती की सड़कों पर झाड़ू लगाने वाले अछूत सुनीत को जब सब दुत्कारते थे, तब तथागत बुद्ध ने उसे अपने सीने से लगाया और भिक्षु संघ में दीक्षित किया।
राजपुत्रों और धनी सेठों ने सुनीत के चरणों में शीश झुकाया।
बुद्ध ने घोषणा की: ‘जिस प्रकार गंगा, यमुना, अचिरावती और सरयू नदियाँ महासागर में मिलकर अपनी पुरानी पहचान खोकर एक रूप हो जाती हैं, उसी प्रकार बुद्ध के संघ में आकर क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र अपनी जाति भूलकर केवल समता के भिक्षु बन जाते हैं।
सुपिया डोम और सोपाक का सम्मान — श्मशान में लकड़ियाँ देने वाले सुपिया डोम, धनिया कुम्हार और चांडाल कन्याओं को संघ में पूर्ण सम्मान देकर बुद्ध ने सिद्ध किया कि श्रेष्ठता का आधार जन्म या वर्ण नहीं, अपितु आचरण, शील, प्रज्ञा और करुणा है।
चार आर्य सत्य और आष्टांगिक मार्ग — बुद्ध ने काल्पनिक ईश्वर, स्वर्ग और आत्मा के विवादों को दरकिनार कर यथार्थवादी दर्शन दिया। उन्होंने समझाया कि दुःख मानव-निर्मित है, और इसका निवारण सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्मांत, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि के माध्यम से ही संभव है।
भाग 6
मुक्ति और स्वाभिमान का व्यावहारिक मार्ग भगवानदास जी की यह कृति केवल अतीत का विलाप नहीं करती, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए एक ठोस एवं क्रांतिकारी कार्ययोजना प्रस्तुत करती है।
शोषित समाज की पूर्ण मुक्ति के लिए निम्नलिखित तीन स्तंभ अनिवार्य हैं:
मानसिक दासता का पूर्ण परित्याग :
सदियों से आरोपित हीनता की भावना, अंधविश्वासों, पाखंडों और ‘भाग्य/कर्मफल’ के झूठे सिद्धांतों को त्यागना होगा।
जब तक मनुष्य स्वयं को हीन समझेगा, समाज उसे कभी बराबरी का दर्जा नहीं देगा।
आधुनिक व वैज्ञानिक शिक्षा का अर्जन
शिक्षा ही वह दुधारू तलवार है जो अज्ञान और दासता की बेड़ियों को काट सकती है।
बच्चों को केवल साक्षर बनाने के बजाय उन्हें उच्च प्रशासनिक, तकनीकी, विधिक और प्रबंधकीय शिक्षा दिलानी होगी।
आर्थिक आत्मनिर्भरता एवं वैकल्पिक आजीविका
पारंपरिक, घृणित और अमानवीय पेशों को त्यागकर व्यापार, उद्योग, आधुनिक सेवाओं और प्रशासनिक क्षेत्रों में कदम बढ़ाना होगा।
आर्थिक स्वतंत्रता ही सामाजिक प्रतिष्ठा की वास्तविक आधारशिला है।
निष्कर्ष एवं संदेश
‘मैं भंगी हूँ’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि प्रत्येक संवेदनशील नागरिक और शोषित समाज के लिए आत्मावलोकन का दर्पण है।
यह कृति हमें संदेश देती है कि जब तक समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और मानवीय गरिमा प्राप्त नहीं होती, तब तक किसी भी राष्ट्र की स्वतंत्रता और लोकतंत्र अधूरा है।
आइए, तथागत बुद्ध के समता दर्शन और बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर के प्रबुद्ध भारत के संकल्प को आत्मसात करते हुए एक ऐसे न्यायपूर्ण समाज का निर्माण करें जहाँ जन्म के आधार पर नहीं, बल्कि मानवीय गुणों, योग्यता और कर्म के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति का आदर हो।
लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति) सामाजिक-आर्थिक चिन्तक एवं विचारक, ब्यावर (राजस्थान) | सम्पर्क सूत्र: 94622-60179
