
1 इतिहास-लेखन का वर्गीय चरित्र और बहुजन विस्मृति का वैचारिक षड्यंत्र
इतिहास कभी भी मात्र घटनाओं का निष्पक्ष संकलन नहीं रहा; वह सदैव सत्ता, संपदा, वर्ण-वर्चस्व और अभिजात्य वर्ग के संरक्षण में लिखा गया आख्यान रहा है।
भारत के स्वाधीनता संग्राम, विशेषकर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का यदि समाजशास्त्रीय और वस्तुनिष्ठ विश्लेषण किया जाए, तो एक कटु सत्य निर्वस्त्र होकर सामने आता है।
औपनिवेशिक अंग्रेज इतिहासकारों और उनके बाद आए देशी सामंती इतिहासकारों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत केवल तथाकथित कहे जाने वाले उच्च वर्ग, जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य समुदाय के आख्यान शामिल थे—को ही राष्ट्रीय पटल पर महिमामंडित किया।
दूसरी ओर, खेतों में पसीना बहाने वाले, जंगलों में प्रकृति से लोहा लेने वाले और सीमाओं पर लहू बहाने वाले वंचित, शोषित, आदिवासी और समग्र बहुजन समाज जिसमें दलित आदिवासी और कमेरा वर्ग के अप्रतिम त्याग, नेतृत्व और बलिदान को जानबूझकर दरकिनार कर दिया गया अथवा उन्हें गौण ‘स्थानीय विद्रोह’ कहकर हाशिए पर फेंक दिया गया।
1857 की क्रांति के समय का यथार्थ यह है कि जब बड़े-बड़े राजे-महाराजे, जागीरदार और साहूकार अंग्रेजों के साथ अपनी पेंशन, उपाधियां, जागीरें और व्यापारिक एकाधिकार बचाने के लिए गुप्त संधियां कर रहे थे, तब भारत का मूलनिवासी, कृषक, दस्तकार और आदिवासी वर्ग बिना किसी व्यक्तिगत रियासत के लालच के अपनी माटी और स्वाभिमान की रक्षा के लिए सिर पर कफन बांधकर रणभूमि में उतरा था।
मध्य भारत के महाकौशल अंचल (वर्तमान मध्य प्रदेश) की पावन धरा रामगढ़ की वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी का संघर्ष इसी ऐतिहासिक पक्षपात को ध्वस्त करने वाला सबसे प्रखर उदाहरण है।
रानी अवंतीबाई का प्रतिरोध केवल विदेशी हुकूमत की पराधीनता के विरुद्ध नहीं था; वह सदियों से स्थापित आंतरिक सामंती शोषण, सामाजिक विषमता और राजमहलों की विलासिता के विरुद्ध एक श्रमजीवी बहुजन महिला का ऐतिहासिक शंखनाद था।
1 जन्म, पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं श्रमजीवी संस्कृति के संस्कार
जन्म, तिथि एवं भौगोलिक परिवेश
वीरांगना अवंतीबाई का जन्म 16 अगस्त 1831 को मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के अंतर्गत आने वाले ग्राम मनकेहणी के एक प्रतिष्ठित कृषक-योद्धा परिवार में हुआ था।
मनकेहणी का क्षेत्र सतपुड़ा और विंध्याचल की घनी पर्वतमालाओं, पथरीले रास्तों और बीहड़ वनों से घिरा हुआ था। इस प्राकृतिक परिवेश ने आरंभ से ही स्थानीय समुदायों को साहसी, स्वावलंबी और जुझारू बनाया।
माता-पिता एवं कुल परंपरा
पिता: राव जुझार सिंह, जो मनकेहणी के अत्यंत स्वाभिमानी, स्वतंत्र चेता और प्रजावत्सल जागीरदार थे। वे तत्कालीन सामंती दरबारी चाटुकारिता से कोसों दूर थे और अपनी प्रजा के साथ आत्मीय संबंध रखते थे।
माता: यशोदा बाई, जो एक अत्यंत धैर्यवान, धर्मपरायण, साहसी और स्वतंत्र विचारों वाली महिला थीं।
कुल/सामाजिक पृष्ठभूमि
लोधी कृषक-योद्धा समुदाय (कमेरा वर्ग), जो ऐतिहासिक रूप से अपनी माटी से गहरा जुड़ाव रखने, अन्न उपजाने और आवश्यकता पड़ने पर तलवार थामकर मातृभूमि की रक्षा करने के लिए विख्यात रहा है।
बाल्यकाल
19वीं सदी के उस अंधकारमय दौर में जब उच्च वर्गीय कुलीनों में महिलाओं को घूंघट, अशिक्षा और गृहस्थी की चारदीवारी तक सीमित रखने की अमानवीय परंपराएं हावी थीं, तब राव जुझार सिंह ने अपनी पुत्री के लालन-पालन में किसी भी प्रकार का लैंगिक या सामंती भेद नहीं किया।
अस्त्र-शस्त्र एवं सैन्य प्रशिक्षण अवंतीबाई को बचपन से ही तलवारबाजी, पट्टेबाजी, द्वंद्वयुद्ध, भाला फेंकना, धनुर्विद्या और अचूक निशानेबाजी की विधिवत शिक्षा दी गई।
अश्व-संचालन में पराकाष्ठा
वे बिना काठी के अत्यंत उद्दंड और तेजतर्रार अरबी व देसी घोड़ों को नियंत्रित करने में पारंगत थीं।
पथरीले बीहड़ों और सघन वनों में तीव्र गति से घोड़ा दौड़ाना उनका सहज स्वभाव था।
रणनीतिक एवं भौगोलिक ज्ञान
पिता के साथ ग्राम पंचायतों और चौपालों में बैठकर वे ग्रामीण न्याय-प्रणाली, भूमि-राजस्व, जल-प्रबंधन और दुर्ग रक्षा की बारीकियों को समझती थीं।
श्रमजीवी चेतना
बचपन से ही उन्होंने गांव के किसानों, चरवाहों, दस्तकारों और वनवासी समुदायों के कठिन जीवन को निकट से देखा, जिससे उनके मन में शोषित वर्गों के प्रति अपार आत्मीयता और शोषणकारी व्यवस्था के प्रति तीव्र विद्रोह की भावना विकसित हुई।
1 रामगढ़ रियासत में प्रवेशदांपत्य, मातृत्व और पारिवारिक संकट
रामगढ़ का ऐतिहासिक एवं सामरिक महत्व:
मंडला जिले के अंतर्गत स्थित रामगढ़ रियासत नर्मदा घाटी और विंध्य पर्वतमाला के संगम पर स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सामरिक दृष्टि से सुरक्षित पहाड़ी रियासत थी।
यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से गोंडवाना साम्राज्य का हृदय स्थल रहा था, जहां वीरांगना महारानी दुर्गावती के अदम्य शौर्य और बलिदान की गाथाएं लोकगीतों में जीवित थीं।
विवाह एवं मातृत्व
सन् 1849 में 18 वर्ष की आयु में अवंतीबाई का विवाह रामगढ़ के प्रतापी राजा लक्ष्मण सिंह के ज्येष्ठ सुपुत्र युवराज विक्रमादित्य सिंह के साथ संपन्न हुआ।
विवाह के कुछ ही वर्षों के भीतर वृद्ध राजा लक्ष्मण सिंह का देहावसान हो गया और विक्रमादित्य सिंह रामगढ़ के राजसिंहासन पर आसीन हुए।
रानी अवंतीबाई रामगढ़ की पटरानी बनीं। उन्होंने दो पुत्रों को जन्म दिया:कुंवर अमान सिंह (ज्येष्ठ राजकुमार)
कुंवर शेर सिंह (कनिष्ठ राजकुमार)
राजा विक्रमादित्य सिंह मूलतः अत्यधिक शांत, दार्शनिक, धार्मिक और वैरागी प्रवृत्ति के व्यक्ति थे।
वे राजदरबार के षड्यंत्रों, कर-वसूली और प्रशासनिक जटिलताओं से दूर रहना पसंद करते थे।
समय बीतने के साथ वे गंभीर मानसिक अवसाद और शारीरिक व्याधियों से ग्रस्त हो गए, जिसके चलते वे दैनिक राजकाज चलाने में पूरी तरह असमर्थ हो गए
इस विषम परिस्थिति में जब रामगढ़ के सामंत, दरबारी और पड़ोसी रियासतों के स्वार्थी तत्व राज्य को हड़पने के मंसूबे बांध रहे थे, तब रानी अवंतीबाई ने राजमहल के अंतःपुर से बाहर निकलकर शासन की संपूर्ण बागडोर अपने हाथों में ले ली।
रानी अवंतीबाई का बहुजन-हितैषी प्रशासनिक ढांचा और क्रांतिकारी सुधार
रानी अवंतीबाई ने सत्ता संभालते ही यह स्पष्ट कर दिया कि उनका शासन सामंती भोग-विलास या जनता के शोषण के लिए नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण के लिए है।
उन्होंने तत्कालीन व्यवस्था में कई युगांतरकारी सुधार किए
कृषक सशक्तिकरण एवं लगान सुधार,दमनकारी करों का उन्मूलन
अंग्रेजों और सामंती बिचौलियों द्वारा किसानों पर लादे गए मनमाने करों, चराई कर और बेगार (बिना मजदूरी के काम) प्रथा को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया।
सिंचाई और कृषि सहायता
रामगढ़ के पहाड़ी अंचल में सूखे और अकाल से बचाव के लिए दर्जनों तालाबों, बावडियों और पक्के कुओं का निर्माण कराया।
निर्धन किसानों को राज्य के अन्न-भंडार से बीज और कृषि यंत्र निःशुल्क उपलब्ध कराए।
आदिवासी अस्मिता और जल-जंगल-जमीन का संरक्षण रामगढ़ की सीमाएं सघन वनों से आच्छादित थीं, जहां गोंड, बैगा, कोल और कोरकू जनजातियां सदियों से निवास कर रही थीं। सामंती व्यवस्था उन्हें हेय दृष्टि से देखती थी, किंतु रानी ने उन्हें राज्य का मुख्य आधार बनाया
आदिवासियों के पारंपरिक वन-अधिकारों में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप पर रोक लगाई गई।
गोंड और बैगा युवाओं के जंगलों और पहाड़ियों के अद्वितीय ज्ञान को पहचानते हुए उन्हें राज्य की अग्रिम सुरक्षा पंक्ति में नियुक्त किया गया और एक विशेष गुरिल्ला दस्ते का गठन किया गया।
स्थानीय दस्तकारों (वंचित या अछूत वर्ग) को संरक्षण एवं आत्मनिर्भरता
राज्य के लोहारों, बढ़इयों, चर्मकारों और शिल्पियों को राजकीय संरक्षण दिया गया।
तोपों, बंदूकों, तलवारों, भालों, तीरों और बारूद का निर्माण रामगढ़ के स्थानीय कारखानों में शुरू कराया गया, जिससे राज्य हथियारों और रसद के लिए बाह्य शक्तियों पर निर्भर न रहे।
1 ब्रिटिश हड़प नीति, ‘कोर्ट ऑफ वार्ड्स’ और रानी की स्वाभिमानी हुंकार
1850 के दशक में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी ने अपनी साम्राज्यवादी व्यपगत नीति (Doctrine of Lapse) के तहत भारतीय रियासतों को जबरन ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने का कुचक्र चलाया।
षड्यंत्र का ताना-बाना:
1 1851 का षड्यंत्र
जबलपुर और मंडला के ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट ने राजा विक्रमादित्य सिंह की अस्वस्थता का लाभ उठाते हुए उन्हें ‘पागल व राज्य संचालन में अक्षम’ घोषित कर दिया।
1855 का आघात
राजा विक्रमादित्य सिंह का असामयिक निधन हो गया।
अंग्रेजों ने दोनों राजकुमारों (अमान सिंह और शेर सिंह) को नाबालिग घोषित कर रामगढ़ रियासत पर ‘कोर्ट ऑफ वार्ड्स’ (Court of Wards) थोप दिया।
1 प्रशासकों की नियुक्ति
ब्रिटिश हुकूमत ने रानी को राजकाज से बेदखल कर पेंशन तय करने का आदेश दिया और रामगढ़ के खजाने व प्रशासन पर कब्जा करने के लिए शेख मोहम्मद और मोहम्मद अब्दुल्ला नामक दो तहसीलदारों को नियुक्त किया।
रानी का ऐतिहासिक विद्रोह स्वाभिमानी रानी अवंतीबाई ने विदेशी व्यापारियों के इस आदेश को गुलामी का प्रतीक मानकर अस्वीकार कर दिया।
उन्होंने दोनों ब्रिटिश तहसीलदारों को भरे दरबार में तलब किया, उनके नियुक्ति-पत्रों को फाड़ दिया और उन्हें अपने सैनिकों के बल पर रामगढ़ की सीमा से बाहर खदेड़ दिया।
रानी ने घोषणा की: “यह रामगढ़ हमारे पुरखों की थाती है, जिसे हमारे किसानों और आदिवासियों ने अपने पसीने से सींचा है।
किसी विदेशी लुटेरे को यह हक नहीं कि वह हमारी माटी का सौदा करे। जब तक अवंतीबाई के शरीर में लहू की एक भी बूंद शेष है, रामगढ़ स्वतंत्र था और स्वतंत्र ही रहेगा।
रानी ने खजाने पर पुन अधिकार कर लिया और सेना को युद्ध स्तर पर तैयार करने का आदेश जारी कर दिया।
(A)1857 का महासंग्राम: कांच की चूड़ियों का संदेश और वंचित, आदिवासी, कमेरा वर्ग का संयुक्त मोर्चा
मई 1857 में जब मेरठ छावनी से क्रांति का दावानल भड़का, तब रानी अवंतीबाई ने पूरे महाकौशल और विंध्य क्षेत्र में क्रांति का नेतृत्व अपने हाथों में लिया।
वे भली-भांति जानती थीं कि अकेले एक रियासत पूरे ब्रिटिश साम्राज्य की तोपों का सामना नहीं कर सकती, इसलिए उन्होंने सामाजिक और क्षेत्रीय सीमाओं को तोड़कर एक विशाल जन-गठबंधन का निर्माण किया।
कांच की चूड़ियों का ऐतिहासिक आह्वान: रानी अवंतीबाई ने अपने गुप्तचरों और विश्वासपात्र दूतों के माध्यम से सोहागपुर, शाहपुरा, गढ़ा-मंडला, विजयराघवगढ़, मैहर, बिछिया और रीवा अंचल के सभी राजाओं, जागीरदारों और मालगुजारों को एक गुप्त संदेश भेजा।
प्रत्येक पत्र के साथ कांच की चूड़ियों का एक-एक जोड़ा भेजा गया था।
पत्र में रानी की ओजस्वी वाणी अंकित थी:मातृभूमि की रक्षा के लिए अपनी कमर कसकर रणभूमि में उतरो और अपनी तलवारें म्यान से बाहर निकालो; या फिर ये कांच की चूड़ियां पहनकर अपने महलों और घरों में छिप जाओ।
यदि सामंतों का पौरुष समाप्त हो चुका है, तो यह वीरांगना अकेले ही फिरंगियों के रक्त से इस माटी का अभिषेक करेगी।
इस तेजस्वी और मर्मभेदी आह्वान ने क्षेत्र के सामंतों और शासकों के आत्मसम्मान को झकझोर दिया। जो राजा भयवश शांत बैठे थे, वे भी लज्जित होकर रानी के मुक्ति मोर्चे में शामिल होने के लिए विवश हो गए।
राजा शंकर शाह का बलिदान और प्रतिशोध की ज्वाला:
इसी दौरान जबलपुर में गोंडवाना राजवंश के 70 वर्षीय प्रतापी गोंड राजा शंकर शाह और उनके वीर पुत्र कुंवर रघुनाथ शाह को अंग्रेजों ने देशभक्ति की कविताएं लिखने के जुर्म में तोप के मुंह से बांधकर उड़ा दिया।
इस बर्बर शहादत ने पूरे आदिवासी और बहुजन समाज के भीतर आक्रोश की आग भड़का दी।
रानी अवंतीबाई ने इस शोक और आक्रोश को संगठित क्रांति में रूपांतरित कर दिया।
4,000 बहुजन लड़ाकों की
मुक्ति वाहिनी
रानी ने बिना किसी जातीय संकीर्णता के समाज के सभी शोषित जिसमें दलित आदिवासी एवम कमेरा वर्गों को मिलाकर 4,000 लड़ाकों की एक विशाल जनसेना तैयार की
लोधी, कुर्मी, अहीर, यादव (OBC): घुड़सवार और पैदल तलवारबाज दस्ते।
गोंड, बैगा, कोल, भील (ST): पहाड़ियों और जंगलों के अचूक तीरंदाज, भालाधारी और गुरिल्ला सैनिक।
दस्तकार, शिल्पी, चर्मकार वर्ग (SC): हथियार निर्माण, दुर्ग सुरक्षा, गुप्तचरी और रसद आपूर्ति की रीढ़।
वीरांगना मुंदो बाई: रानी की छाया और अभिन्न अंगरक्षिका, जिन्होंने महिला लड़ाकों के दस्ते का नेतृत्व संभाला।
1 खैरी का ऐतिहासिक युद्ध: औपनिवेशिक सेना का संहार और रानी का रणकौशल, सन् 1857 के अंतिम महीनों में रानी के बढ़ते प्रभाव को देखकर मंडला के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन वडिंगटन ने एक विशाल ब्रिटिश सेना, अत्याधुनिक तोपखाने और बंदूकधारियों के साथ रामगढ़ को नष्ट करने के लिए कूच किया।
युद्ध की रणनीति, खैरी का चक्रव्यूह, रानी अवंतीबाई ने अपनी सैन्य रणनीति से सिद्ध कर दिया कि वे एक कुशल सेनापति थीं। उन्होंने अंग्रेजों को रामगढ़ के खुले मैदानों में लड़ने का मौका नहीं दिया, जहां अंग्रेजों के तोपखाने और राइफलें भारी पड़तीं।
रानी ने अंग्रेजों को खैरी गांव के निकट घने जंगलों, संकरी घाटियों और नालों के बीच खींचने का जाल बिछाया।
रणभूमि का प्रत्यक्ष दृश्य
जैसे ही कैप्टन वडिंगटन की सेना खैरी की घाटी में घुसी, पहाड़ियों पर छिपे गोंड और बैगा सैनिकों ने तीरों, भालों और विशाल पत्थरों की भीषण वर्षा कर दी।
अंग्रेज संभल पाते, उससे पहले ही रानी अवंतीबाई अपने श्वेत अश्व पर सवार होकर, दोनों हाथों में नंगी तलवारें लिए, बिजली की गति से अंग्रेजी सेना के मध्य घुस गईं।
रानी के साथ उनकी वीरांगना साथी मुंदो बाई और लोधी सैनिकों ने ऐसा भयंकर प्रहार किया कि अंग्रेजों की पंक्ति-व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई।
अंग्रेजों के तोपची अपनी तोपों का मुंह घुमाने से पहले ही काट डाले गए।
परिणाम: खैरी का मैदान ब्रिटिश सैनिकों के शवों से पट गया।
कैप्टन वडिंगटन जान बचाकर भागा और उसने मंडला के किले में छिपकर अपनी जान बचाई।
इस ऐतिहासिक युद्ध में रानी की सेना ने ब्रिटिश सेना को करारी शिकस्त दी।
रानी ने रामगढ़ और आसपास के 40 से अधिक गांवों से ब्रिटिश थानों को उखाड़ फेंका और अपना स्वतंत्र शासन स्थापित किया।
1 देवहारगढ़ की पहाड़ियों में छापामार युद्ध, सामंती गद्दारी और सर्वोच्च बलिदान
खैरी की पराजय ने ब्रिटिश साम्राज्य के दंभ को गहरी चोट पहुंचाई।
कलकत्ता और नागपुर के ब्रिटिश मुख्यालयों में हड़कंप मच गया।
अंग्रेजों को यह आभास हो गया था,कि यदि अवंतीबाई को न रोका गया, तो पूरा मध्य भारत ब्रिटिश नियंत्रण से बाहर हो जाएगा।
अंग्रेजों की चौतरफा घेराबंदी
1858 के आरंभ में अंग्रेजों ने नागपुर, जबलपुर, सागर, दमोह और रीवा छावनियों से भारी कुमुक जुटाई।
जनरल क्लार्क और कैप्टन वडिंगटन के संयुक्त नेतृत्व में कई हजार सैनिकों, विशाल तोपखाने और घुड़सवार सेना ने रामगढ़ की ओर कूच किया।
प्रजा-रक्षा हेतु दुर्ग का त्याग
रानी अवंतीबाई जानती थीं कि, विशाल ब्रिटिश तोपखाने के सामने रामगढ़ का दुर्ग अधिक दिन नहीं टिकेगा और अंधाधुंध गोलाबारी में रामगढ़ की निर्दोष प्रजा, महिलाएं और बच्चे मारे जाएंगे।
एक सच्चे प्रजावत्सल शासक का परिचय देते हुए रानी ने दुर्ग खाली करने का निर्णय लिया।
उन्होंने नागरिकों को सुरक्षित पहाड़ी बस्तियों में भेज दिया और स्वयं अपनी चुनिंदा सैन्य टुकड़ी के साथ देवहारगढ़ की सघन, बीहड़ और दुर्गम पहाड़ियों में मोर्चा जमा लिया।
हफ्तों तक गुरिल्ला संघर्ष
देवहारगढ़ की पहाड़ियों से रानी ने अंग्रेजों के विरुद्ध अनवरत छापामार युद्ध लड़ा।
रानी के लड़ाके रात के अंधेरे में ब्रिटिश छावनियों पर हमला करते, उनकी रसद सामग्री लूटते और जंगलों में ओझल हो जाते।
हफ्तों तक चले इस संघर्ष ने ब्रिटिश सेना की कमर तोड़ दी।
सामंती विश्वासघात और देशद्रोह
जब अंग्रेज युद्ध के मैदान में रानी को परास्त नहीं कर सके, तो उन्होंने अपनी पुरानी कुटिल नीति, गद्दारी और रिश्वत का सहारा लिया
रीवा रियासत का विश्वासघात: रीवा के सामंतों ने अपनी जागीरें और पद बचाने के लिए अंग्रेजों का साथ दिया और अपनी सेना अंग्रेजों की मदद के लिए भेजी।
गुप्त मार्गों की मुखबिरी
कुछ स्थानीय देशद्रोहियों ने धन और जागीर के लालच में अंग्रेजों को देवहारगढ़ की पहाड़ियों के वे अत्यंत गोपनीय प्राकृतिक रास्ते और गुफाएं बता दीं, जहां रानी और उनके प्रमुख सैनिक स्थित थे।
20 मार्च 1858: अमर शहादत
की गाथा: ब्रिटिश सेना ने देवहारगढ़ की पहाड़ियों को चारों ओर से घेर लिया।
रानी अवंतीबाई, मुंदो बाई और उनके मुट्ठी भर वीर सैनिकों ने अंतिम सांस तक लोहा लिया।
युद्ध इतना भीषण था कि रानी के अधिकांश निष्ठावान सैनिक मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए।
अंततः रानी का गोला-बारूद समाप्त हो गया। अंग्रेजों ने रानी को चारों तरफ से घेर लिया और कैप्टन वडिंगटन ने रानी से आत्मसमर्पण करने को कहा।
रानी अवंतीबाई ने अंग्रेजों की ओर घृणा से देखा। उन्होंने अपनी सहचरी मुंदो बाई की ओर देखा और कहा,
“हमारी पूर्वज वीरांगना महारानी दुर्गावती ने अपने जीते जी कभी किसी विदेशी शत्रु को अपनी देह को छूने नहीं दिया था।
अवंतीबाई भी जीते जी फिरंगियों के हाथों में बेड़ियां नहीं डलवाएगी। हमारी स्वतंत्रता हमारा स्वाभिमान है।
इतना कहते ही रानी अवंतीबाई ने अपनी ही कटार अपनी छाती में घोंप ली। उनके पदचिन्हों पर चलते हुए उनकी निष्ठावान सहचरी मुंदो बाई ने भी अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया।
शहादत से पूर्व का ऐतिहासिक बयान मरणासन्न अवस्था में भी रानी अवंतीबाई ने अपनी प्रजा के प्रति अद्भुत उत्तरदायित्व निभाया।
उन्होंने अंग्रेज अफसरों के समक्ष यह अंतिम बयान दर्ज कराया
रामगढ़ की जनता, किसानों और मेरे सैनिकों ने जो कुछ भी किया, वह केवल मेरे आदेश पर किया।
वे पूरी तरह निर्दोष हैं। इस विद्रोह की संपूर्ण योजना, नेतृत्व और क्रियान्वयन केवल मेरा था।
इसलिए मेरे जाने के बाद मेरी प्रजा पर कोई अत्याचार न किया जाए।
20 मार्च 1858 को स्वाभिमान की यह देवी भारत के स्वाधीनता इतिहास के आकाश पर ध्रुव तारे की भांति सदा-सदा के लिए अमर हो गई।
ऐतिहासिक उपेक्षा बनाम वास्तविक बहुजन योगदान का यथार्थ
1857 में वास्तविक भूमिका
तथाकथित कहे जाने वाला उच्च वर्ग (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य): अनेक बड़ी रियासतों और राजाओं ने अंग्रेजों से पेंशन, संधियां और जागीरें बचाईं, रीवा, ग्वालियर आदि ने अंग्रेजों की सैन्य मदद की।
बहुजन समाज (अछूत, आदिवासी तथा कमेरा वर्ग): रानी अवंतीबाई (OBC), राजा शंकर शाह (ST), झलकारी बाई (SC), मुंदो बाई और लाखों किसानों-आदिवासियों ने निस्वार्थ शहादत दी।
इतिहास-लेखन में स्थान:
तथाकथित उच्च वर्ग
इतिहास के पन्नों, स्मारकों, महाकाव्यों और पाठ्यपुस्तकों में केंद्रीय और महिमामंडित स्थान दिया गया।
बहुजन समाज
जानबूझकर उपेक्षित किया गया, इतिहास की मुख्यधारा से बाहर रखा गया या ‘क्षेत्रीय विद्रोह’ कहकर सीमित किया गया।
महिला नेतृत्व का स्वरूप:
तथाकथित उच्च वर्ग: कुलीन महलों तक सीमित, जहां पर्दा-प्रथा और सामंती बंदिशें थीं; अधिकांश ने समझौते के रास्ते तलाशे।
बहुजन समाज: रानी अवंतीबाई और मुंदो बाई ने सीधे युद्ध के मैदान में सेना का नेतृत्व किया और आत्मबलिदान चुना।
बहुजन नारी शक्ति ने सामंती और औपनिवेशिक दोनों बेड़ियों को एक साथ तोड़ा।
सामाजिक आधार
तथाकथित उच्च वर्ग: दरबारी सामंतों, साहूकारों और पुरोहितों का संकीर्ण संजाल।
बहुजन समाज: किसान, पशुपालक, दस्तकार, शिल्पी, वनवासी और आदिवासियों का विशाल जन-आधार।
1857 की क्रांति वास्तव में बहुजन समाज की जनक्रांति थी।
समकालीन बहुजन समाज से आह्वान एवं कार्यदिशा
वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी का जीवन केवल अतीत के किसी स्मारक पर माल्यार्पण करने का नाम नहीं है; वह वर्तमान की वैचारिक जड़ता को तोड़ने वाली एक प्रखर मशाल है।
आज जब बहुजन समाज विभिन्न जातियों, उप-जातियों, संप्रदायों और स्वार्थों में बंटकर अपनी राजनीतिक और सामाजिक शक्ति को खो रहा है, तब रानी अवंतीबाई का जीवन हमें आत्म-मंथन करने और निम्नलिखित संकल्प लेने के लिए विवश करता है
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गुलामी से मुक्ति
जब तक कोई समाज अपने वास्तविक नायकों के इतिहास को नहीं जानता, तब तक वह वैचारिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो सकता।
प्रभुत्वशाली शक्तियों ने बहुजन समाज के इतिहास को विकृत किया है। हमारा कर्तव्य है कि हम रानी अवंतीबाई लोधी, माता सावित्रीबाई फुले, वीरांगना झलकारी बाई, रानी दुर्गावती, माता जीजाबाई और पेरियार ललई सिंह यादव जैसे पुरखों के वास्तविक इतिहास को घर-घर तक पहुंचाएं।
1 अछूत, आदिवासी और कमेरा वर्ग की अटूट एकता
अंग्रेज चले गए, किंतु उनकी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति आज भी नए-नए रूपों में जीवित है।
वर्चस्ववादी ताकतें आज भी बहुजन समाज को जातियों और उप-जातियों के संकीर्ण दायरों में बांटकर उनका शोषण कर रही हैं।
रानी अवंतीबाई ने जिस प्रकार कृषक (लोधी), शिल्पी (दस्तकार) और आदिवासी (गोंड-बैगा) समुदायों को एक मंच पर लाकर साम्राज्यवादी ताकत को चुनौती दी थी, उसी प्रकार आज संपूर्ण बहुजन समाज (दलित, आदिवासी, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक) को एकजुट होकर सामाजिक न्याय और आनुपातिक हिस्सेदारी की लड़ाई लड़नी होगी।
1 शिक्षा, ज्ञान और संविधान को आधुनिक अस्त्र बनाना
19वीं सदी का संघर्ष तलवार और ढाल से लड़ा गया था, किंतु 21वीं सदी का स्वाभिमान युद्ध शिक्षा, संविधान, ज्ञान, तकनीक और आर्थिक सुदृढ़ता के बल पर लड़ा जाएगा।
बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के अमर संदेश—”शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो” को आत्मसात करके ही हम रानी अवंतीबाई के सपनों का समतामूलक और शोषण-मुक्त समाज बना सकते हैं।
स्वाभिमान से कोई समझौता नहीं रानी अवंतीबाई ने अंग्रेजों की पेंशन और गुलामी की सुख-सुविधाओं को ठुकराकर जंगलों के कंटीले रास्तों और सर्वोच्च बलिदान को चुना।
उनका यह जीवन-दर्शन हमें सिखाता है कि सुविधाओं के लिए स्वाभिमान को गिरवी रखना जीवित शव होने के समान है। अन्याय, विषमता और शोषण के सामने सिर झुकाने के बजाय संघर्ष का मार्ग चुनना ही उस महान वीरांगना के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
प्रमुख ऐतिहासिक संदर्भ
इस आलेख में प्रस्तुत ऐतिहासिक तथ्य, तिथियां, प्रशासनिक अभिलेख एवं युद्ध-विवरण निम्नलिखित प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथों, गजेटियर्स और अभिलेखीय स्रोतों पर आधारित हैं
1 सेंट्रल प्रोविंसेज गजेटियर (मंडला एवं सिवनी जिला) ब्रिटिश कालीन आधिकारिक प्रशासनिक गजेटियर (1870-1908)।
2 1857 की क्रांति और मध्य प्रदेश’ – डॉ. भवानी लाल भारतीय एवं राज्य अभिलेखागार, भोपाल।
मध्य प्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी’ सूचना एवं प्रकाशन 0विभाग, मध्य प्रदेश शासन।
1 दि सेपॉय म्युटिनी एंड दि रिवोल्ट ऑफ1857 डॉ. आर. सी. मजूमदार।
1 गोंडवाना का इतिहास एवं स्वाधीनता आंदोलन,जनजातीय शोध एवं विकास संस्थान, मध्य प्रदेश।
1 भारत का मुक्ति संग्राम और 1857 की वीरांगनाएं,नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT), नई दिल्ली।
1 विद्रोही महाकौशल: 1857 का जनसंघर्ष, क्षेत्रीय इतिहास शोध संस्थान, जबलपुर।
वैधानिक डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)
यह आलेख ऐतिहासिक अभिलेखों, गजेटियर्स, जन-इतिहास तथा लोक-स्मृतियों के निष्पक्ष एवं आलोचनात्मक विश्लेषण पर आधारित है।
इसका उद्देश्य किसी वर्ग, समुदाय, जाति अथवा समूह की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में हाशिए पर धकेले गए वंचित, आदिवासी, कृषक एवं बहुजन नायकों-नायिकाओं के ऐतिहासिक योगदान, बलिदान और सामाजिक न्याय के यथार्थ को प्रमाणिकता के साथ समाज के समक्ष प्रस्तुत करना है।
इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार ऐतिहासिक पुनरावलोकन, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक चेतना के संवर्धन के उद्देश्य से संकलित एवं प्रस्तुत किए गए हैं।

लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक ब्यावर-94622-60179

