दिल्ली में हुए छात्र आंदोलन के दौरान देश ने एक ऐसा दृश्य देखा, जिसने पत्रकारिता और लोकतंत्र—दोनों के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया। घटनास्थल पर मौजूद कई ग्राउंड रिपोर्टरों को नारेबाज़ी, विरोध और तीखी नाराज़गी का सामना करना पड़ा। कुछ स्थानों पर उनके लिए रिपोर्टिंग करना भी कठिन हो गया। यह केवल कुछ पत्रकारों की पीड़ा नहीं थी, बल्कि मीडिया और जनता के बीच बढ़ते अविश्वास का भी संकेत था।

इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है—आखिर ग्राउंड रिपोर्टर का कसूर क्या है?

पिछले कुछ वर्षों में टीवी पत्रकारिता पर लगातार सवाल उठे हैं। समाज के एक वर्ग का मानना है कि कुछ बड़े समाचार चैनलों के एंकर सत्ता से उतने तीखे सवाल नहीं पूछते, जितने विपक्ष या अन्य पक्षों से पूछते हैं। जनता के एक हिस्से को यह भी लगता है कि कुछ चर्चित टीवी एंकर सरकार से जवाबदेही तय करने की बजाय विपक्ष पर अधिक आक्रामक दिखाई देते हैं। कई लोगों की धारणा है कि कुछ टीवी बहसों में सरकार का पक्ष अधिक मुखर दिखाई देता है, जबकि विपक्ष से कहीं अधिक तीखे सवाल किए जाते हैं। इस धारणा से सभी सहमत हों, यह आवश्यक नहीं है, लेकिन इतना निश्चित है कि इससे मीडिया के एक हिस्से के प्रति जनता का विश्वास प्रभावित हुआ है।

दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इस अविश्वास और नाराज़गी का सामना स्टूडियो में बैठे एंकर नहीं करते। वातानुकूलित स्टूडियो में बैठकर बहस करने वाले चेहरे सुरक्षित रहते हैं, जबकि उसी चैनल का माइक लेकर मैदान में खड़ा ग्राउंड रिपोर्टर लोगों के गुस्से का पहला निशाना बन जाता है।

ज़रा सोचिए, जो पत्रकार धूप, बारिश और भीड़ के बीच खड़ा होकर घटनास्थल की वास्तविक तस्वीर देश के सामने रख रहा है, क्या वही तय करता है कि रात को टीवी स्टूडियो में कैसी बहस होगी? क्या वही यह निर्णय लेता है कि कौन-सा एंकर किस भाषा का प्रयोग करेगा? क्या वही चैनल की संपादकीय नीति बनाता है? उत्तर स्पष्ट है—नहीं।

ग्राउंड रिपोर्टर का काम केवल घटनास्थल से तथ्य जुटाकर उन्हें जनता तक पहुँचाना होता है। वह न चैनल की नीति तय करता है, न बहस की भाषा और न ही किसी राजनीतिक एजेंडे का निर्माण करता है। इसके बावजूद जब जनता का गुस्सा फूटता है, तो सबसे पहले उसी पत्रकार को उसका सामना करना पड़ता है।

यही सबसे बड़ी विडंबना है। न्यूज़रूम में बैठे लोग सुरक्षित रहते हैं, लेकिन मैदान में खड़ा रिपोर्टर भीड़ की नाराज़गी, अपमान और तानों को सहता है। उसका दोष केवल इतना होता है कि उसके हाथ में उस चैनल का माइक है।

दिल्ली के छात्र आंदोलन के दौरान सामने आए दृश्य यही बताते हैं कि जनता का गुस्सा अक्सर उस व्यक्ति पर निकलता है, जो सबसे कम जिम्मेदार होता है। एक ग्राउंड रिपोर्टर के हाथ में केवल माइक होता है, फैसले लेने का अधिकार नहीं। वह केवल आँखों देखी घटना लोगों तक पहुँचा रहा होता है। ऐसे में उसे अपमानित करना किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।

यह भी सच है कि पत्रकारिता केवल कैमरे के सामने बैठकर बहस करने का नाम नहीं है। असली पत्रकारिता सड़क पर, धूल में, धूप में, बारिश में और भीड़ के बीच होती है। जब कोई ग्राउंड रिपोर्टर अपनी सुरक्षा की चिंता किए बिना लोगों तक सही जानकारी पहुँचाने का प्रयास करता है, तब वह केवल अपने चैनल का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का भी दायित्व निभा रहा होता है।

यह घटना मीडिया संस्थानों के लिए भी आत्ममंथन का विषय है। न्यूज़रूम में बोले गए शब्द केवल प्रसारण तक सीमित नहीं रहते, उनकी गूँज समाज तक पहुँचती है। यदि बहसों में संयम की जगह शोर, तथ्यों की जगह आरोप और संवाद की जगह टकराव हावी होगा, तो उसकी कीमत मैदान में काम कर रहे पत्रकारों को भी चुकानी पड़ेगी।

पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास है। यह विश्वास निष्पक्षता, संयम और विश्वसनीयता से बनता है। यदि यह भरोसा कमजोर पड़ता है, तो उसकी सबसे बड़ी मार उन ग्राउंड रिपोर्टरों पर पड़ती है, जो हर परिस्थिति में अपना कर्तव्य निभा रहे होते हैं।

लोकतंत्र में विरोध करना हर नागरिक का अधिकार है और मीडिया की आलोचना भी लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन किसी ग्राउंड रिपोर्टर को केवल इसलिए अपमानित करना कि उसके हाथ में किसी चैनल का माइक है, उचित नहीं कहा जा सकता। यदि किसी चैनल की नीति या किसी एंकर की भाषा से असहमति है, तो सवाल वहीं उठने चाहिए जहाँ वे नीतियाँ तय होती हैं।

आज सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि न्यूज़रूम अपनी भाषा, अपने रवैये और अपनी जिम्मेदारी पर गंभीरता से विचार करें। साथ ही समाज भी यह समझे कि स्टूडियो में बैठा एंकर और मैदान में खड़ा ग्राउंड रिपोर्टर एक जैसी भूमिका नहीं निभाते। क्योंकि जब किसी और के शब्दों की सज़ा एक बेगुनाह रिपोर्टर को मिलने लगे, तो यह केवल पत्रकारिता की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की भी हार है।

आखिर में सवाल फिर वही है—क्या मैदान में खड़े उस पत्रकार का कसूर सिर्फ़ इतना है कि उसके हाथ में उस चैनल का माइक है? यदि जवाब ‘नहीं’ है, तो फिर सज़ा उसे क्यों?

लेखक : धर्मपाल चन्देल
(सम्पादक – जागो हुक्मरान समाचार पत्र)

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